दमखम है तो लिखें अपने मौलिक विचार, चुरा-चुरा कर क्या लिखना

किसी भी अच्छी, सच्ची और जनहित-राष्ट्रहित की बात पर कुछ कहना-लिखना अपने आप में शौर्य-पराक्रम से कम नहीं।

सत्य के उद्घाटन और यथार्थ प्रतिक्रिया देना बड़े साहस का काम है।

आधे-अधूरे या आंशिक स्त्री-पुरुष ऎसा कभी नहीं कर सकते।

जो कुछ नहीं कर सकते, वे केवल सस्ते मनोरंजन के सहारे पूरी जिंदगी गुजारने को विवश रहते हैं।

सत्य संभाषण-लेखन और प्रतिक्रिया वे ही कर सकते हैं जो कि पूर्ण पुरुष या पूर्ण स्त्री हों।

ऎसे साहस की उम्मीद पौरुषहीन या स्त्रैण तत्व से वंचित लोगों से करना भी हमारी मूर्खता है।

फिर उन लोगों की क्रिया-प्रतिक्रिया का कोई अर्थ नहीं है जो बिकाऊ, झूठन चाटने वाले झूठे और अपने स्वार्थों के लिए हर कहीं सहर्ष पसर जाने की आदत पाल लेते हैं।

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