दोषी हम ही हैं जमाना नहीं

हम खुद कुछ करना या कहना नहीं चाहते, इस भरोसे रहते हैं कि कोई दूसरा हमारे मन की बात अपने मुँह से कह डाले, हमारी समस्याओं और पीड़ाओं भरे मन की थाह पाकर दूसरा ही कोई हमें राहत पहुंचाने के लिए प्रयास करें।

हम अपनी छवि साफ-सुथरी, स्वाभिमानी और शहंशाही बनाए रखने के फेर में तटस्थता ओढ़ लिया करते हैं। और यह तटस्थता किसी एक-दो मामलों के लिए नहीं, हमारी आदत ही बन गई है कि पूरी जिन्दगी का अधिकांश हिस्सा तटस्थता में ही गुजरता रहे और अपने सोचे मनमाने और मनचाहे काम औरों के भरोसे होते रहें।

बन्दूक भी दागनी पड़े तो औरों के कंधों के भरोसे रहकर हम प्रतीक्षा करते रहते हैं कि कब कोई कंधा मिले और बन्दूक रखकर लक्ष्य भेदन कर डालें।

हम जिन्दगी भर औरों के कोसते रहते हैं कि वे ऎसे हैं, वैसे हैं, किसी काम नहीं, खुदगर्ज, धूर्त, मक्कार, पैसाखाऊ, हरामखोर, भ्रष्ट, व्यभिचारी, लम्पट, बातें बनाने वाले, गुमराह करने वाले और हर किस्म के ढोंगी हैं, आदि-आदि।

जो दूसरों को कोसता है वह अपने आप में आत्महीन, भयभीत और कमजोर होता है। बहुत से लोग हैं जो इन विषम हालातों का प्रतिकार करते भी हैं लेकिन उनका विरोध इसलिए कोई मायने नहीं रखता क्योंकि वे स्वयं भी नाकारा और नालायक हुआ करते हैं।

सर्वमान्य सिद्धान्त है कि जो इंसान खुद कमजोरियों से भरा, भ्रष्ट और बेईमान है उसे किसी ओर के बारे में कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है। बुरे आदमी को बुरा कहने का अधिकार उसी इंसान को है जो कि सच्चा और सज्जन है।

जो स्वयं चोर-उचक्का, भ्रष्ट-बेईमान और कामचोर है उसे दूसरों को खराब या भ्रष्ट कहने का कोई अधिकार नहीं हो सकता। दुनिया जहान की बड़ी-बड़ी लड़ाइयां इंसान इसीलिए हार जाते हैं क्योंकि वे जिनके खिलाफ उठ खड़े होते हैं उनके सारे या आंशिक दुर्गुणों से स्वयं भी त्रस्त रहा करते हैं।

और ऎसे में इनका प्रतिरोध केवल दिखाऊ औपचारिकता से अधिक कुछ नहीं होता। समझदार लोगाें को लगता है कि यह सब नाटक एक-दूसरे को दबाने या पिछले दरवाजे से कुछ न कुछ पाने की नौटंकी से अधिक कुछ नहीं है।

दूसरी बात यह है कि हम लोग सज्जनों की निन्दा करने में आगे-पीछे कुछ भी नहीं देखते, उन्हें जी भर कर कोसा करते हैं, उन्हें बुरा-भला सुना दिया करते हैं, उन्हें असहयोग करते हैं, नुकसान करने के लिए हमेशा उद्यत रहते हैं, उनके खिलाफ शिकायतें करते हैं, हमेशा इस प्रयास में रहते हैं कि किस तरह औरों को बरबाद कर दें।

कारण साफ है कि हमें सज्जनों से किसी प्रकार का नुकसान नहीं है क्योंकि जो सज्जन होते हैं वे दूसरों का अहित करने की सोच भी नहीं सकते। सज्जनों की इसी उदारता और सज्जनता का फायदा उठाते हुए हम लोग हमेशा सज्जनों और ईमानदारों के पीछे पड़े रहते हैं, यह न केवल हमारा अपना बल्कि समाज और देश का भी शर्मनाक दुर्भाग्य है कि सज्जनों को दुःखी होना पड़ता है और वह भी उन लोगों से जो स्वयं नाकारा और बुरे हैं।

बुरे लोगों को कुछ कहने या खरी-खरी सुनाने की हमारी हिम्मत नहीं है क्योंकि वे दुष्ट हैं और कभी भी कुछ भी कर सकते हैं, इस बात का भय हमेशा बना रहता है। फिर जो दुष्ट और नालायक हैं वे नगे-भूखे और बदहवास, बेशर्म हैं और उनके पास खोने को कुछ नहीं है। न साख है और न दूसरा कुछ।

इसलिए भी अच्छे लोग इनसे सायास दूरी बनाए रखते हैं। यही वजह है कि बुरे लोग हावी होने की स्थिति मेंं आ जाते हैं और बेचारे अच्छे, सच्चे और सज्जन हमेशा दूसरे दर्जे के नागरिकों की तरह पीछे-पीछे रहते हैं। अच्छों और बुरों से जुड़ी इन विषमताओं के कारण ही माहौल प्रदूषित होता है।

जो अच्छे हैं उनकी खुलकर तारीफ की जानी चाहिए और जो बुरे हैं उनकी खुलकर बुराई की जानी जरूरी है। और यह सब कुछ छिपकर नहीं बल्कि सभी के सामने सार्वजनिक तौर पर होना चाहिए, तभी समाज के सामने दूध का दूध और पानी का पानी हो सकता है।

अच्छे लोगों को हर कहीं सम्बल, प्रोत्साहन और आदर-सम्मान मिलना चाहिए, यह हम सभी का फर्ज है। साथ ही जो नालायक, नुगरे और बेईमान हैं उन्हें सार्वजनिक तौर पर हतोत्साहित और तिरस्कृत करने की जरूरत है।

यदि अकेले नहीं कर सकें तो समूहों के रूप में संगठित होकर यह कार्य होना चाहिए। ऎसा होने पर ही समाज और देश के हित में बदलाव ला पाना संभव है। जो कुछ अभिव्यक्ति हो, वह सही, सटीक और नीर-क्षीर विवेक सम्मत होनी चाहिए।

यह भी नहीं कर सकें तो कभी न कहें कि जमाना खराब है क्योंकि जमाने को खराब करने के लिए हम ही दोषी हैं और कोई नहीं।