इधर बचाओगे,  उधर निकल जाएगा

इधर बचाओगे, उधर निकल जाएगा

पुरुषार्थ में रमे हुए लोगों की सफलता का मूल आधार यही है कि वे अवैध रूप से पैसे या संसाधन बचाने की कोई कोशिश नहीं करते बल्कि जहां जितना पैसा देना निर्धारित होता है उतना अपनी कमाई से निकाल कर दे ही डालते हैं।

सामने वाला चाहे किसी संबंध या प्रभावों के आभामण्डल में आकर ना नुकर क्यों न कर, वे इस राशि को अपने पास कभी नहीं रखते। इसी प्रकार ये पुरुषार्थी लोग किसी और से किसी भी प्रकार के काम की एवज में उतनी ही कीमत या मेहनताना प्राप्त करते हैं जितना कि नियमों के अनुकूल निर्धारित होता है। न ज्यादा और न ही कम।

हमारे भाग्य में जो कुछ लिखा हुआ है उसे कोई छीन नहीं सकता, और जो हमारे भाग्य में है नहीं, उसे कोई हमें नहीं दे सकता चाहे इसके लिए हम हजारों लोगों के चरणस्पर्श क्यों न करते रहें, लाखों लोगों को नमस्कार ही क्यों न करते रहें।

सैकड़ों लोगों का प्रशस्तिगान क्यों न करते रहें। इसका कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। जीवन में प्राप्ति और विसर्जन के सारे समीकरण पूर्व निर्धारित होते हैं लेकिन सामान्य इंसान इस ईश्वरीय विधान को समझ नहीं पाता और वह जिन्दगी भर किसी न किसी प्रकार के घनचक्कर में पड़ा रहता है।

और जीवन भर ऊहापोह से घिरे रहकर उद्विग्नता, अशांति और अतृप्ति  के व्यामोह में पड़ा रहकर कभी खुद को कोसता रहता है, कभी भगवान को, और कभी पूरी की पूरी दुनिया को।

बहुत से लोग हैं जो एक-एक पैसा बचाते रहते हैं और हर क्षण यही प्रयास करते रहते हैं कि उनका एक धेला भर खर्च नहीं हो, जो कुछ हो वह दूसरे लोग खर्च करें। यहाँ तक कि कई सारे लोग ऎसे भी देखने को मिलते हैं जो कि चाय-नाश्ता और खाना खाने में भी दूसरे लेागों पर निर्भर रहते हैं।

कुछ लोग ऎसे भी देखे जा सकते हैं जो कि सवेरे उठते ही किसी न किसी मुर्गे की तलाश आरंभ कर देते हैं और दिन भर इसी जुगाड़ में लगे रहते हैं कि कोई ऎसा मिले कि जो उनका सारा खर्च वहन कर ले।

बहुत सारे लोगों की यह आदत ही हो गई है कि वे हमेशा दूसरों पर निर्भर रहा करते हैं और उनकी जिन्दगी में खान-पान, कपड़े-लत्ते, ऎशोआराम और दूसरे सारे कामों का सारा खर्चा पानी निकालते रहें। यह बात नहीं है कि इस प्रकार की सोच भिखारियों और दरिद्रियों अथवा निम्न लोगों में ही हो, बल्कि बड़े-बड़े प्रभावशाली, धनाढ्य और वैभवशाली लोगों में भी यह मानसिकता देखी जाती है कि वे अपना खुद का पैसा बचाने के लिए जितने जतन करते हैं उन्हें देख कर आश्चर्य भी होता है और दुःख भी।

पैसे बचाने के लिए लोग तरह-तरह के करतब और हुनर आजमाते हैं और जीवन के हर कर्म में वे मुफतिया भोग-विलास और आनंद तलाशते रहते हैं। चाहे रेल, बस का सफर हो, खान-पान का मामला हो या फिर और कुछ।

हर जगह इनकी तमन्ना किसी न किसी प्रकार से पैसा बचाने की होती है। यहां तक कि ये अपने कर्मस्थलों, विहार स्थलों और सम्पर्कितों के परिसरों को भी नहीं छोड़ते। हर काम और व्यवहार में पैसा बचाने वाले भले ही अपने आपको होशियार, चतुर और चालाक समझते रहें, इस बात का संतोष मानते रहें कि उनके पास पैसा बच रहा है।

लेकिन इन लोगों को यह नहीं मालूम है कि संसार ऋणानुबन्ध का वह मेला है जहाँ हर जीवात्मा अपने पूर्व जन्म के ऋणों को चुकाने या पाने के लिए पैदा होता है और जब तक ऋण का पूरा का पूरा चुकारा नहीं हो जाता तब तक उसे मुक्ति प्राप्त नहीं हो पाएगी। इस जन्म में पूरा नहीं चुका दिया जाए तो फिर-फिर जन्म लेने को तैयार रहने की स्थितियां बनती रहेंगी।

पैसा बचाते और अपने नाम संग्रह करते हुए इन लोगों को सुकून और आनंद का अहसास भले होता रहता है लेकिन इनका अनधिकृत रूप से जमा हुआ पैसा किसी न किसी रास्ते को तलाश कर अपने आप बाहर की ओर रिसना आरंभ हो जाता है चाहे वह गंभीर बीमारी के रूप में डॉक्टरों और ईलाज पर खर्च होता रहे, या चोर ले उड़ें अथवा किसी अनहोनी घटना की श्रृंखला बनी रहे और सारा का सारा पैसा बाहर निकल जाता रहे।

जीवन भर कमाई और गंवाई का निश्चित परिमाण हमेशा निर्धारित रहता है। बहुत से लोग पैसे बचाने और जमा करने के लिए रोजाना इतने सारे पाप करते रहते हैं कि जिनका कोई हिसाब ही नहीं लगाया जा सकता है। ऎसे लोग जिन्दगी भर हजारों-लाखों पाप कर्म में रमे रहते हैं और इच्छा यह रखते हैं कि उन्हें आनंद प्राप्त होता रहे और भगवान की कृपा भी।

कोई सा कर्म हो, उसका निर्धारित शुल्क चुकाएं वरना जो पैसा हम बचाए रखते हैं वह किसी न किसी रूप में बाहर निकल ही जाता है। इधर से आएगा तो उधर से बाहर निकल ही जाएगा। निकलना तय है चाहे कितना ही संभाल के रखो। पैसा बचाने के लिए गलत रास्तों का सहारा लेकर पाप भी करते रहो और बाद में वो संचित पैसा भी अपना न रहे, यह सब किस काम का। मुगालते में न रहें, इधर से बचाओगे, उधर से निकल ही जाएगा।