बच नहीं पाएगा कोई भी पापी-अपराधी

ईश्वर अपने प्रतीक रूप में सभी शक्तियों के साथ इंसान के रूप में जीवात्मा को धरती पर भेजता है और यह मानकर चलता है कि वह ईश्वरीय कार्य करता हुआ सृष्टि के किसी न किसी काम आएगा ही। और जब लौटेगा तब उसके खाते में कम से कम इतना कुछ तो होगा ही कि ईश्वर को अपनी बनाई प्रतिकृति पर गर्व हो।

ईश्वर तो हमें शुद्ध-बुद्ध और मेधा-प्रज्ञा से परिपूर्ण करके भेजता है लेकिन संसार की माया के बंधनों में फँसकर ईश्वर का अंश होने का हमारा शाश्वत भान समाप्त हो जाता है और हमें लगता है कि हम ही हैं और कोई कुछ नहीं। बाकी सारे या तो हमसे कमतर हैं, मूर्ख हैं अथवा हमारे अनुचर। यह स्थिति हमें शान्ति से जीने नहीं देती और मृत्यु होने तक हमें भ्रमित किए रहती है।

जो लोग अपनी आत्मस्थिति में होते हैं उनके लिए सांसारिक माया अनासक्त भोग से अधिक कुछ नहीं होती लेकिन बहुत सारे लोग ऎसे होते हैं जो अपनी संस्कृति, संस्कारों और ईश्वरीय तन्तुओं से पृथक होकर अपने आपको ही बहुत कुछ मान लिया करते हैं।

ऎसे लोगों का एक समय बाद ईश्वर या वंशानुगत संस्कारों, पुरातन काल से चली आ रही गौत्र, वंश या कुटुम्ब की मर्यादाओं आदि से नाता पूरी तरह टूट चुका होता है। इस अवस्था में पहुंच जाने के उपरान्त इंसान की स्थिति  ‘ न घर का – न घाट का’ वाली हो जाती है। 

इंसानों की अनियंत्रित, नाकारा और अनचाही विस्फोटक भीड़ में बहुत से लोग हैं जो अपने सिवा किसी और को कुछ समझते ही नहीं। अंधकार से परिपूर्ण आसुरी माया के पाश से बँधे इन लोगों के लिए सारा जहाँ उनका अपने लिए ही, अपनी सेवा-चाकरी के लिए ही बना हुआ दिखता है, इनकी यही अपेक्षा होती है कि दुनिया उनके पीछे-पीछे चलती रहे, उन्हें पालकियों में बिठा कर इच्छित स्थानों का भ्रमण कराती रहे और चूँ तक न करे।

वे जैसा कहें, वैसा होता रहे, वे जैसा करें वैसा ही दूसरे लोग भी अनुकरण करते रहें। इन लोगों के लिए स्वाभिमान, साँस्कृतिक परंपराओं, नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं का कोई मूल्य नहीं है। न इमें लेशमात्र भी इका कोई प्रभाव रहता है। इस दुर्भाग्यपूर्ण भ्रमित अवस्था तक आते-आते इनका जमीर जमींदोज हो जाता है, इंसानियत मर जाती है और खुद किसी गुब्बारे की तरह फूल कर आसमान की ऊँचाई पर हवाई सफर करने के लक्ष्य को लेकर इधर से उधर, जहाँ-तहाँ भटकते रहा करते हैं।

सामाजिक प्राणी कहे जाने के बावजूद इस प्रजाति के लोगों को किसी भी दृष्टि से इंसानी बाड़ों में रखकर नहीं देखा जा सकता। इसका मूल कारण यही है कि इनके भीतर अहंकार का समन्दर इस कदर हमेशा ज्वार वाली स्थिति में रहता है कि इन्हें अपने अलावा और कुछ दिखता ही नहीं। न इंसान दिखते हैं न परिवेश के अनुपम नज़ारे।

इंसानी बाड़ों से लेकर समाज और क्षेत्र भर मेें हर तरफ ऎसे लोगों की बहुत बड़ी संख्या है जो अपने इर्द-गिर्द अहंकारी आभामण्डल हमेशा बनाए रखते हैं और दिन-रात उसी में रमण करते हुए आसमान की ऊँचाइयों में होने का भ्रम पाले रहते हैं। इनके भाग्य से इनके जैसे लोगों का गिरोह भी अनायास इन्हें प्राप्त हो जाता है। ठीक उसी तरह जैसे कि एक जगह कचरा डाल दिए जाने के बाद जमाने भर के लोग कूड़ापात्र या डम्पिंग स्पॉट मानकर कूड़ा-करकट डालते रहा करते हैं।

इनके अहंकार का गुब्बारा दिन-ब-दिन फूलता ही चला जाता है जो इनको आसमानी ऊँचाइयों में होने का भरम पैदा करने के लिए काफी है। ये गुब्बारे रंग-बिरंगे भी हो सकते हैं और रंगहीन या बदरंग भी। इनका अपना कोई वजूद नहीं होता। ये जो कुछ करते है। वह सब परायों के भरोसे।

जो लोग जमीन से जुड़े हुए हैं उन लोगों को अहंकार छू तक नहीं पाता है लेकिन जो लोग हवा में उड़ने के आदी हो गए हैं उनके लिए अहंकार हाइड्रोजन गैस का काम करता है जिसकी वजह से इनके गुब्बारे बिना किसी सामथ्र्य के ऊपर की ओर छलांग मारते हुए बढ़ते चले जाते हैं।

ईश्वर को सबसे ज्यादा नफरत उन लोगों से होती है जो अहंकारी होकर उसे भी भूल जाते हैं और उसके कर्म को भी। इंसान के अहंकार को परिपुष्ट करने में तमाम प्रकार की बुराइयों का बहुत बड़ा योगदान रहता है।

ये बुराइयां उसके भीतर इंसानियत के संतुलन को बिगाड़ कर आसुरी बना डालती हैं। साफ तौर पर  देखा जाए तो अहंकार एक ओर जहाँ आसुरी व्यक्तित्व का सुस्पष्ट प्रतीक है वहीं दूसरी ओर यह उन तमाम द्वारों को खोल देता है जो इंसान के पराभव और निरन्तर क्षरण के लिए बने हुए होते हैं।

एक बार किसी को अहंकार ने पाश ने जकड़ लिया तो उसके बाद उसके बचने की कहीं कोई गुंजाइश नहीं होती। वह हमेशा के लिए आसुरी मार्ग को थाम लेता है। और इस हाईवे पर अहंकार अकेला कभी नहीं चलता। उसके साथ दुराग्रह, पाप कर्म, कुकर्म, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि तमाम प्रकार के शत्रुओं का घेरा बन जाता है।

अहंकारी और हरामी लोग जिन्दगी भर यही समझते रहते हैं कि ये सारे दुर्गुण और दुराग्रही विषाणु उसके लिए कवच की तरह बने रहकर संरक्षण देने वाले बने रहते हैं। पर सच यह है कि इन्हीं बुराइयों और दुष्टताओं के तंतुओं में मकड़ी की जाल की तरह वह ऎसा घिर जाता है कि कोई उबारने या बचाने वाला नहीं होता। पाप कर्मों का यह मकड़जाल अजगरी पाश से भी अधिक भयंकर जकड़न वाला हो जाता है। बावजूद इसके दम तोड़ने तक वह इस सत्य को स्वीकार नहीं करता कि आखिर उसकी दुर्गति का मूल कारण है क्या।

अहंकार होने का अर्थ ही यही है कि ईश्वर की नाराजगी। भगवान जिस किसी इंसान पर कुपित और रुष्ट हो जाता है उसके अहंकार का शमन करना बंद कर देता है। अन्यथा भगवान की कृपा जब तक बनी रहती है तब तक संसार की माया और अहंकार को वह नियंत्रित रखता है, विस्तार नहीं होने देता।

लेकिन जब मनुष्य ईश्वरीय भावों, मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं को भुला बैठता है उस स्थिति में ईश्वर उसे मझधार में छोड़ देता है जहाँ अहंकार धीरे-धीरे ऑक्टोपस की तरह इंसान को अजगरी पाशों में बाँधने लगता है और एक स्थिति ऎसी आती है जब वह नितान्त अकेला रह जाता है। न वह किसी के भरोसे पर खरा उतरने के काबिल होता है, न वह किसी और पर भरोसा कर पाने की स्थिति में होता है।

विश्वासहीनता और अहंकार के चरम माहौल में दुर्गति और पराभव के सिवा मनुष्य को कुछ भी हाथ नहीं लगता। हमारे आस-पास भी बहुत सारे लोग ऎसे रहते हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि वे घोर दंभी हैं जिनसे न कोई बात करना पसंद करता है, न अहंकार भरे ये लोग संसार से संवाद रख पाते हैं। इनके लिए चन्द हाथी और उनके महावत, कुछ श्वानपालक और कुछ चाटने-चटवाने वाले ही आत्मीय संबंधी, कुटुम्बी और पालनहार हो जाते हैं, जिनके भरोसे ये जैसे-तैसे जिन्दगी निकाल दिया करते हैं।

जगतपिता को नहीं मानने वाले ये लोग हर बार अलग-अलग गॉड फादर के सहारे किसी भी मैदान में छलांग लगाने से लेकर बन्दर-भालुओं की तरह करतब दिखाने, कुत्तों की तरह बेवजह भौंकने, लपकने और काट खाने से लेकर वो सब कुछ कर सकते हैं जो इनके सह अस्तित्व को बनाए रखने के लिए जरूरी होता है। इस मामले में इनके पास कोई दया-करुणा, मैत्री भाव और धर्म-सत्य का अंश होता ही नहीं। अपने मामूली लाभ के लिए जी भर कर झूठ बोल सकते हैं, किसी को भी चोट पहुँचा सकते हैं और किसी भी स्तर तक नीचे गिर सकते हैं।

आत्म अहंकारी लोगों का सबसे बड़ा भ्रम यही होता है कि वे दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हैं और उनके मुकाबले कोई इंसान हो ही नहीं सकता। अहंकार अपने आप में ऎसा एकमात्र सटीक पैमाना है जो यह स्पष्ट संकेत करने के लिए काफी है कि किस पर भगवान मेहरबान है। 

जिस पर ईश्वर प्रसन्न रहता है वह इंसान सभी प्रकार के अहंकारों से मुक्त रहता है, भगवान की कृपा से कोई से अहंकार उसे छू तक नहीं पाते। इसके विपरीत भगवान जिस पर से अपनी कृपा हटा लेता है उसके भीतर विद्यमान किन्तु सुप्त पड़े अहंकार के बीज अंकुरित होना शुरू हो जाते हैं और धीरे-धीरे पूरे आभामण्डल को अपनी कालिख से ढंक लिया करते हैं।

यह अहंकार अपने आप में यह संकेत है कि अहंकारी इंसान का मानसिक और शारीरिक क्षरण आरंभ हो चुका है और उसके अधःपतन के सारे रास्ते अपने आप खुलते चले जा रहे हैं।  इस दुर्भाग्य को गति देने के लिए इन्हीं की किस्म के दूसरे अहंकारी, चाटुखोर, हमरामखोर, जीभ लपलपा कर मुफत का माल और मलाई चाटने वाले, दोहरे चरित्र वाले और पाखण्डी लोग भी इनके साथ जुड़ जाते हैं जो इनके ताबूत में कील ठोंकने के लिए काफी होते हैं।

इसलिए जहाँ जो लोग किसी न किसी अहंकार के मारे फूल कर कुप्पा हुए जा रहे हैं, उन्हें अपने अहंकारों के साथ जीने दें। ऎसे अहंकारी लोगों के सान्निध्य व सामीप्य तथा इनके साथ किसी भी प्रकार का व्यवहार तक भी अपने पुण्यों को क्षीण करने वाला होता है।

अहंकारी मनुष्यों के साथ रहने वालों, उनका जयगान करने वालों और उनकी पूछ करने वालों से भी भगवान नाराज रहता है। अधिकांश सज्जनों और अच्छे लोगों की बहुत सारी समस्याओं का एक कारण यह भी है कि लुच्चे-लफंगे और टुच्चे लोगों से अपने स्वार्थ पूरे होने या करने-कराने की उम्मीद मेंं ये दुर्बुद्धि या बुूद्धिपिशाच सामाजिक और संस्थागत शुचिता को खण्ड-खण्ड करते हुए कुकर्मों का ऎसा इतिहास रच जाते हैं कि पूरे मानव समुदाय और क्षेत्र को बरसों तक इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है।

अहंकारियों से दूर रहें, ये समाज के कूड़ेदान हैं, इनसे जितनी दूरी होगी, उतना हमारा व्यक्तित्व सुनहरा, दिव्य और सुगंधित बना रहेगा। आज का सबसे बड़ा युगधर्म यही है कि इन अहंकारियों और हरामखोरों के समूलोच्छेदन के लिए हर स्तर पर प्रयास करें।

इसके लिए यह भी जरूरी है कि उन लोगों का साथ भी छोड़ें, जो स्वार्थ और नाजायज कुकर्मों में लिप्त होकर इनके साथ लगे हुए हैं। दुष्टों का साथ निभाना, साथ रहना और साथ देना गंभीर सामाजिक अपराध है जिसकी सजा कभी न कभी तो मिलेगी।

पाप के घड़े मजबूत हुआ करते हैं, इनमें कभी भी छेद नहीं हो सकता। इनका भरना तय है। आज नहीं तो कल पाप का घड़ा भरता ही है। और जब भरकर छलकने लगता है या फूट जाता है, तब जो कुछ होता है, होना है, उसके बारे में किसी को कुछ भी बताने की आवश्यकता नहीं है। बहुत सारे पिशाचों की जिन्दगी के उत्तरार्ध की दुर्दशा अपने आप सब कुछ बयाँ करने के लिए काफी है।

1 thought on “बच नहीं पाएगा कोई भी पापी-अपराधी

  1. लाख छिपाए छिप न सकेगा, पाप ये तेरा-मेरा,
    भर जाएगा घड़ा पाप का, लाख घूमे ऎरा-गैरा

    अपने हर कर्म का फल इंसान को भोगना पड़ता है। इस जन्म में नहीं तो आने वाले जन्मों भी चुकारा करना ही पड़ेगा। पता नहीं हम इस शाश्वत सत्य की उपेक्षा क्यों करते रहते हैं।
    पाप का घड़ा भरता रहता है तब तक हमें इस बात का अहसास नहीं होता कि हम इंसानियत को खोकर किस तरह चोरी-चकारी, लूट-खसोट और डकैती कर रहे हैं, किस तरह भ्रष्टाचार और कमीशनबाजी के फेर में कारोबारी होते जा रहे हैं, ईमानदार, मेहनतकश और सज्जन लोगों के साथ शोषण और अन्याय ढा रहे हैं, कायदे-कानूनों से ऊपर उठकर किस तरह औरों के दम पर उछलकूद, धींगामस्ती और ऊधम कर रहे हैं।
    यह सब कुछ तभी तक अच्छा लगेगा जब तक यह घड़ा भर नहीं जाता। पाप के घड़े में कभी छेद नहीं हो सकता। पूरा भर जाता है तब अपने आप विस्फोट के साथ फूट जाता है, शांत, मस्त और विलासी जिदगी में ज्वालामुखी, ज्वार या भूकम्प ला देता है।
    कर्मफल के सिद्धान्त और मनुष्य जन्म के मर्म को समझने से बचते रहने वालों की दुर्गति होना तय है। अपन सभी के घड़े भर रहे हैं, समय आने पर फूटना ही उनकी नियति है। इसलिए यह हम पर है कि पाप के घड़ों को भरते रहने दें अथवा पुण्य की जड़ को पाताल तक स्थापित करने में निष्ठा से जुटे रहें।
    हमें आत्मीय भाव से अपना, कर्मयोगी, महान, लोकप्रिय और सर्वश्रेष्ठ बताते रहने वाले खुदगर्ज और धूर्त-मक्कार लोगों का साथ, आश्रय और संरक्षण किसी काम का नहीं, वे सारे मतलब के यार हैं। अपने आपको ऎरावत समझने वाले ये सफेद हाथी न किसी काम के हैं, और न महान लोगों कइी पालकियाँ तोकने वाले ये स्वाभिमानशून्य भिखारीछाप कहार। ये हमारे पापों को शेयर तक नहीं कर सकते। अपनी करनी तो आप को ही भोगनी पड़ती है।
    हम सभी लोग आजकल किसी न किसी स्वार्थ, पद-प्रतिष्ठा, पैसा, भोगी-विलासी आरामतलबी जिन्दगी और मुफतिया पराये आनंद को पाने के लिए अन्याय, अत्याचार और शोषण का सहारा लेकर नॉन स्टॉप पाप पर पाप किए जा रहे हैं। ऎसे में कोई बच नहीं पाएगा। हम हों या और कोई भी। हिसाब तो होगा ही, हर एक कर्म का, चाहे सूक्ष्म हो या विराट।

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