करमफूटों से कैसा प्रेम

प्रेम, सद्भाव, सौहार्द, समन्वय और सामन्जस्य की बातें उन लोगों के लिए ही होती हैं जो कि मनुष्य हैं।  इस मामले में संसार दो तरह के लोगों से भरा हुआ है। एक वे हैं जो समझदार हैं और दूसरे नासमझ।

समझदार लोगों को यह समझाने की आवश्यकता कभी नहीं पड़ती कि वे कैसे और किस तरह रहें, किस तरह एक-दूसरे के काम आएं, मददगार बनें और अपने जीवन लक्ष्यों को प्राप्त करें।

एक सामाजिक प्राणी के रूप में ये अपने कर्तव्य का निर्वाह अपने आप करते रहते हैं। इन्हें कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती बल्कि सब कुछ अपने आप होने लगता है। जबकि दूसरी ओर नासमझों की जबर्दस्त और विस्फोटक भीड़ सब तरफ पसरी हुई है जो अपने आपको दुनिया के बुद्धिमानों और रचनात्मक कर्मयोगियों के रूप मेंं पेश करने में माहिर है किन्तु इस भीड़ में शामिल भेड़ों के लोक व्यवहार को देखते हुए कोई भी इन्हें पूर्ण व्यक्ति के रूप में स्वीकार नहीं कर पाता।

केवल जिस्म से ये इंसान हुआ करते हैं इनके सारे कर्म दूसरी तरह के हुआ करते हैं। इन लोगों का प्रेम और आसक्ति सिर्फ पदार्थ और स्वार्थी व्यक्तियों से ही हुआ करती है इसलिए इनका मानवीय संवेदनाओं, स्व-कर्म और कर्तव्य से कोई रिश्ता नहीं बँध पाता।

इनका हर कर्म टुच्चे स्वार्थ से भरपूर होता है। जहाँ स्वार्थ होता है वहाँ न कोई मानवीय संवेदनाएं होती हैं और न कोई इंसानी संबंध। वहाँ सारे रिश्ते कारोबारी हैं और इस कारोबार में कोई राम धरम नहीं है, जो कुछ है उसमें हराम-धरम ज्यादा है और झूठ, फरेब तथा एक-दूसरे को भरमाने के सिवा और कुछ नहीं।

कलियुग में दुष्ट प्रजाति के लोगों की संख्या स्वाभाविक रूप से अधिक है और इन लोगों को मानवता या मानवीय मूल्यों से कुछ भी लेना-देना नहीं। इनका सीधा संबंध मुद्रा, पदार्थों, विलासिता और दैहिक सुखों से ही होता है और इन सभी को पाने के लिए ये लोग कुछ भी कर सकते हैं, कुछ भी करवा सकते हैं।

अपने मामूली लाभ के लिए ये सिद्धान्तों की बलि चढ़ा सकते हैं और किसी भी स्तर तक नीचे गिरते हुए अपने आपको इतना अधिक गिरा दिया करते हैं कि फिर दुनिया में इनसे अधिक नीच और गिरा हुआ और कोई दिख ही नहीं सकता।

इन लोगों के लिए उठाईगिरों की बजाय कोई नया ही शब्द गढ़ना पड़ेगा – निचाईगिरे।

हम सभी लोगों का यही अनुभव है कि बहुत सारे लोग हमारे साथ और आस-पास रहते रहे हैं और इन लोगों को हमसे भरपूर प्रेम मिलता रहा है, हमारी ओर से दी गई स्वतंत्रता को यह स्वच्छन्दता और उन्मादी अवस्था तक मेंं परिवर्तित करते हुए जो कुछ कारगुजारियां कर डालते हैं वे अक्षम्य होने के बावजूद हम सभी लोग दया और करुणावश इन नासमझों, मूर्खों और जाहिलों को बर्दाश्त करते रहते हैं।

इसी का फायदा उठाकर ये लोग हमारी शालीनता, उपेक्षा और बेपरवाही को ये कमजोरी समझते रहते हैं और धीरे-धीरे ऎसे सामने आने लगते  हैं जैसे कि पुराने जन्मों के शत्रु ही हों। सीधे सादे शब्दों में कहा जाए तो ये ही वे लोग हैं जो पुराने युगों में राक्षस रहे हैं। तभी तो इन लोगों की नापाक हरकतों को देख कर कहा जाता है कि इनसे तो पशु भी अच्छे हैं।

बहुत से लोगों की जिन्दगी में इस किस्म के नुगरों और नालायकों से सामना होता रहता है जिनके पास करने को कोई काम नहीं होता इसलिए इनका दिमाग शैतानी विचारों से भरा रहता है।

ऎसे लोगों के बारे में यह कहा जाए कि केवल दिमाग ही नहीं  दिल से लेकर पूरे ही जिस्म में तरह-तरह के शैतानों का  साया बना रहता है। इनके आभामण्डल के चारों ओर की परिधि में भी शैतानी साये परिभ्रमण करते रहते हैं इस कारण ये लोग जहाँ रहते हैं वहाँ भी माहौल शैतानी कर देने में इनका अहम् योगदान रहता है।

बहुत से लोगों के बारे में आम धारणा होती है कि ये लोग जहाँ होंगे वहाँ सदैव नकारात्मक माहौल बना रहता है। इनकी गैर मौजूदगी में सब कुछ अपने आप सामान्य और शांतिपूर्ण ढंग से चलता रहता है किन्तु जैसे ही इनकी उपस्थिति आकार ले लिया करती है वैसे ही हवाएं तक बदचलन हो जाया करती हैं, शेष के बारे में तो कहना ही क्या।

आजकल लगभग हर परिसर में ऎसे दो-चार लोग दिख ही जाते हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि ये नाकारा और अपशकुनी लोग जब तक बने रहेंगे तब तक माहौल खराब ही बना रहेगा। जहां इन एक तरह के लोगों का गिरोह या गैंग आकार लेती है वहाँ की स्थिति नरक हो जाती है।

कई स्थानों पर ऎसे खूब सारे लोग बरसों से जमें रहा करते हैं, और कई लोग तो ऎसे हैं जो कि एक ही जगह पर जिन्दगी का पूरा कर्मकाल निकाल दिया करते हैं।  न जाने किसके दुर्भाग्य और पाप से धरा पर ऎसे निष्ठुर, नाकारा और संवेदनहीन लोगों का जमावड़ा हो चला है।

इन लोगों से चाहे कितना प्रेमपूर्वक बर्ताव कोई क्यों न करे, ये किसी के नहीं हो सकते। कारण कि जिन लोगों की जिन्दगी में पुरुषार्थहीनता हावी होती है उनके लिए स्वार्थ की अंधी गलियां ही सफलता के शोर्टकट के रूप में इस्तेमाल होती रहती हैं।

यही वे लोग हैं जो मूर्ख और दुर्बुद्धि होने के बावजूद अहंकारों को पाले हुए हैं,  बुरे और नकारात्मक विचारों और कुकर्मो के बूते अपने बूतों को पूजवाने में लगे हुए हैं। इन लोगों के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करना मानवता के साथ धोखा और प्रेम का अपमान है।

इस प्रजाति के लोगों के लिए क्रूर दण्डात्मक विधान को अपनाना ही एकमेव उपाय है। समाज और क्षेत्र से लेकर देश-दुनिया तक में अच्छे लोगों की कोई कमी नहीं है किन्तु बुरे लोगों के प्रभाव में होने का यही कारण है कि हम बुरों तथा बुराई को बर्दाश्त करते रहे हैं और इस कारण से उनके पंख और अधिक फड़फड़ाते रहते हैं।

अच्छों को भले ही पुरस्कार न मिले, कोई उनके कामों को न सराहे। किन्तु जो बुरे और नाकारा हैं उनके लिए कठोर दण्ड और सार्वजनीन सामूहिक तिरस्कार करने की परंपरा कायम होनी चाहिए तभी सामाजिक परिवेश से इन नुगरों की असामाजिकताओं का अंत होना संभव है।

जो दुष्ट, बुरे, पाखण्डी और नालायक हैं, बिना परिश्रम के खा-पी रहे हैं उन सभी के लिए प्रेम की भाषा का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए बल्कि इनके लिए उस क्रूर और दण्डनीय भाषा में समझाने की आवश्यकता है जिसमें यह समझ पाएं।

इन्हें ठिकाने लगाने के दूसरे भी खूब सारे उपाय हैं जिनमें समय कम लगता है किन्तु याद कई दिनों, महीनों और सालों तक ही नहीं बल्कि मरते दम तक बनी रहती है। किसने रोका है इन उपायों को काम में लाने से। किसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं हम लोग।

उठो, जागो और पड़ जाओ इन सारे निकम्मों, चोर-बेईमानों और भ्रष्ट-रिश्वतखोरों के पीछे।  इनके समूल नाश के लिए किसी भी प्रकार का रास्ता इस्तेमाल करना बुरा नहीं है। फिर देर किस बात की? अपूर्व और ऎतिहासिक सबक ऎसा मिलना चाहिए कि इनके पुरखे भी याद करें और हमारी आने वाली पीढ़ियाँ भी।

1 thought on “करमफूटों से कैसा प्रेम

  1. Sahi hai parntu jab ese dushto ko pata chale ki esane Meri sikayat ki to phir us dust settles kaise nipatenge.
    Jai ho

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