कोई औचित्य नहीं है मन्दिरों में स्वर्ण शिखर चढ़ाने का ….

मन्दिरों में स्वर्ण शिखर चढ़ाने का कोई विधान नहीं है। यह पाप कर्म है। मन्दिरों में पहले से प्रतिष्ठित पाषाण शिखर को हटाकर भगवान का शिरोच्छेदन कर डालते हैं। आज भी जिन मन्दिरों पर स्वर्ण शिखर चढ़े हैं उनके मूल पाषाणी शिखर आस-पास धूल खा रहे दिख जाते हैं।

दूसरा स्वर्ण शिखरों के नाम पर सोने का पानी चढ़ा होता है न कि पूर्ण सोना। यही कारण है कि मन्दिरों स्वर्ण शिखर कुछ वर्ष बाद अपनी चमक-दमक खो दिया करते हैं। यह भगवान को गुमराह करने का धंघा लम्बे अर्से से चला आ रहा है। पूरा मन्दिर जिसका बना है उसी का शिखर होना चाहिए। कोई पूरा का पूरा मन्दिर यदि सोने का बना है तब तो स्वर्ण शिखर हो सकता है अन्यथा कदापि नहीं।

धर्म के नाम पर गौ सेवा, गरीबों और जरूरतमन्दों की सेवा और सहयोग की बजाय हमने दान-दक्षिणा और धार्मिक उत्सवों को अपनी सम्पन्नता का द्वार मान लिया है। यही हमारी सामाजिक विषमता का मूल कारण है।

1 thought on “कोई औचित्य नहीं है मन्दिरों में स्वर्ण शिखर चढ़ाने का ….

  1. आपके विचार, श्रेष्ठ है ,मानवीय मूल्यों के पालक ओर विचारणीय है ।किंतु, आडम्बरो के कारण ओर तथा कतिथ ठेकेदारों के चलते ,हम नास्तिक, ओर आस्तिकके माया जाल में उलझकर रह जाते हैं।

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