किसे घास डालें ?

अपेक्षाओं का महासागर हर तरफ पूरे यौवन पर है। हर कोई महत्वाकांक्षी बना हुआ डोल रहा है या फिर उच्चाकांक्षी।  ज्ञान, अनुभव और हुनर वाले भी इच्छाओं की पूर्ति के लिए भटक रहे हैं और मूर्ख, अज्ञानी, नासमझ और नाकारा भी।

सबको वही सब चाहिए जो औरों को मिल रहा है। मेहनत करके पाने वालों की अपेक्षा अधिकांश वे हैं जो बिना मेहनत के ही सब कुछ अपनी झोली और आँगन में भर लेना चाहते हैं।

सब तरफ गलाकाट और पैर पछाड़ प्रतिस्पर्धाओं का बोलबाला है। सब चाहते हैं पाना ही पाना, देना कुछ नहीं। त्याग, तपस्या, समर्पण और सेवा को किनारे रखकर लूट-खसोट, छीना-झपटी और परिग्रही दुराचरण हावी हैं।

कुछ को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश इसी फिराक में हैं कि दुनिया का सारा भौतिक, मायावी और दैहिक सुख उन्हीं के पास जमा होता रहे, चाहे दूसरे लोग कितने ही अभावग्रस्त और विपन्न क्यों न बने रहें। पहले सत, रज और तम का अनुपात पर्याप्त हुआ करता था। आज तामसिकता का प्रभाव अधिक है।

इसी तामसिकता के कारण खान-पान और व्यवहार में काम, क्रोध, लोभ और मोह का ग्राफ निरन्तर उछाले मार रहा है। इंसान और इंसानियत के पैमाने निरन्तर बदलते जा रहे हैं। इंसान जंगलियों का व्यवहार करने लगा है और जंगल में रहने वालों की प्रजातियां लुप्त होने लगी हैं।

इंसान भरपेट खा रहा है, जो नहीं खाना चाहिए वह भी खा रहा है और जंगलों में रहने वाले भूख के मारे शहर की ओर रूख करते जा रहे हैं। इन्हें कुछ नसीब नहीं हो पा रहा है। इंसान जंगलों पर कब्जा करते हुए जंगल में घुसकर भी इन्हें खा रहा है और भूख-प्यास बुझाने बाहर आने पर भी इन्हीं वन्य जीवों को डकार रहा है।

इंसान सर्वत्र घुसपैठ कर चुका है और दूसरे प्राणी अपने जीवन को बचाने की जद्दोजहद में भी विफल होकर अपनी प्रजाति के अस्तित्व को अपनी आँखों के सामने मिटते देखने को विवश हो रहे हैं। बहुत से लोग हमेशा आत्मदुःखी रहा करते हैं।

इन्हें हर पल यही शिकायत रहती है कि लोग उन्हें नहीं पूछते। लोग भला पूछे भी क्यों? लोग उन्हीं को पूछते हैं जिनमें आदमी होने के लक्खण हों, और वो हमारे में अब रहे नहीं। कभी हम हिंसक जानवर की तरह पेश आते हैं, कभी पिशाचों की तरह।

हम इंसान की सारी पहचान भुला चुके हैं। हम पर अपने स्वार्थ और ऎषणाओं की चादर इतनी अधिक हावी रहने लगी है कि हमारे स्वभाव, व्यवहार और कर्म को देखकर कोई यह नहीं कह सकता कि हम इंसान हो भी सकते हैं।

हम सारे लोग साल भर में किसी दिन अपने बारे में निकालें और आत्मचिन्तन करें कि हम कितने फीसदी इंसान रह गए हैं तो हमें अपने आप पर शर्म भी आएगी, ग्लानि भी होगी और इतना अधिक दुःख भी हो सकता है कि हमें आत्महत्या करने के बारे में सोचना पड़े।

हम अपनी तुलना किसी दूसरे इंसान से नहीं करें बल्कि इंसान के गुण-धर्म, लक्षणों और विलक्षणताओं की कसौटी पर अपने आपको परखें। इसी से हमें यह अन्दाजा हो जाएगा कि इंसान के रूप में हमारा जन्म बेकार चला गया है और हमारे जैसे पाप कर्म, स्वार्थी और मक्कारीपूर्ण व्यवहार, लूट-खसोट, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और कमीशनखोरी, कर्मनिष्ठ और ईमानदार लोगों का शोषण, व्यभिचार आदि सब कुछ हैं उससे तो यही लगता है कि आने वाले हजार जन्म में भी भगवान हमें इंसानी खोल देने की भूल नहीं करने वाला।

धन, वैभव, जमीन-जायदाद और पद-प्रतिष्ठा पा जाने के बावजूद हमारी सुरसाई भूख कभी खत्म होती नहीं दिखती और हम पागलों की तरह भाग रहे हैं सब कुछ पा जाने के लिए। और जिसे पाने की तमन्ना करते रहे हैं वह हमारा है ही नहीं।

परायों के माल पर अधिकार जमाने की हमारी डकैत भाव वाली मनोवृत्ति तब तक रहती है जब तक कि हमारी देह निष्प्राण न हो जाए। हम एक बार यदि चोरी, बेईमानी और लूट-खसोट की प्रवृत्ति बना लें तो हम मरते दम तक बेईमानी और धूर्तता में रमे रहेंगे क्योंकि हराम के खान-पान और बेईमानी से अर्जित धन से बना हमारा रक्त, उत्तक, माँस, अस्थि, चर्म और पूरी की पूरी देह अपनी मौलिकता खोकर इतनी अधिक मिश्रित हो जाती है कि उसे कुछ भी अपनापन लगता ही नहीं, सब कुछ पराया ही पराया दिखता है और एक समय ऎसा आता है कि जब हम मृत्यु से पूर्व ही अपनी मौलिकता की हत्या कर डालते हैं।

खूब सारे लोगों को यह कहते हुुए सुना जाता है कि आजकल लोग उन्हें घास नहीं डालते। मित्र हों, परिचित या परिवार वाले। इन लोगों को कौन समझाए कि घास उन्हीं को डाली जाती है जो कि शाकाहारी यानि की सात्ति्वक हों।

लेकिन ये लोग सात्ति्वक रहे ही नहीं। इतने अधिक तामसिक हो गए हैं कि माँसाहारियों की तरह व्यवहार करने लगे हैं। ऎसे में भला कौन इन्हें घास डाले और क्यों डाले? माँसाहारियों को घास डालना मूर्खता है। जो लोग स्वभाव से क्रूर, हिंसक, शोषक और संवेदनहीन हो गए हैं उन लोगों को अपने से दूर ही रखें, घास न डालें।

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