जिन्दगी भर हाय-हाय

जिन्दगी भर हाय-हाय

इंसान अपने लाभ और स्वार्थ की पूर्ति के लिए कुछ भी कर सकने को न केवल स्वतंत्र बल्कि पूर्ण स्वच्छन्द है। इंसान की तासीर ही यही है कि वह कभी भी कुछ भी कर सकता है। वह अच्छा भी कर सकता है और बुरा भी।  अपने आपको इंसान बनाए रख सकता है, दैवत्व और दिव्यत्व की प्राप्ति के लिए प्रयत्न कर सकता है और राक्षसी स्वभाव और व्यवहार भी अपना सकता है।

अब आदमी का कोई भरोसा नहीं रहा। ऎसे भी आदमी देखने में आ रहे हैं कि जो देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार चौले-चौगे और मुखौटे बदल-बदल कर अपने उल्लू सीधे करते रहते हैं। जब से इंसान का जमीर खत्म होने लगा है, वह बिकने लगा है, तभी से वह शैतान होने लगा है।

उसे सामाजिक भले कहा जाए लेकिन खूब सारे लोगों को देखकर लगता है कि इनके आगे ‘अ’  अक्षर लगा दिया जाए तो अधिक सटीक, सत्य और शाश्वत हो सकता है।

जिन लोगों के पास खाने-पीने, आवास और सामान्य जीवनयापन की कोई कमी है, जो लोग समस्याओं से परेशान हैं, अभावों में जीने को विवश हैं, जिनके परिवारों के लिए दो वक्त की रोटी नसीब नहीं हो पाती, पहनने को कपड़े नहीं मिल पाते, पढ़ाई-लिखाई, बीमारी में दवा-दारू और  आम जिन्दगी के कामों के लिए पैसे का संकट बना रहता है, विपन्नता और अभाव जिनके लिए अभिशाप बने हुए हैं, उन लोगों के लिए यह बहुत जरूरी और अनिवार्य है कि वे सामान्य जिन्दगी के लिए मेहनत करें, पैसों का जुगाड़ करें और अपने अभावों को कुछ हद तक कम करते हुए जिन्दगी की गाड़ी को हाँकते हुए आगे से आगे ले जाएँ और स्वाभिमान के जीने का अभ्यास बनाएं।

मानवीय  मूल्य, संवेदनाओं और मानव धर्म का तो तकाजा यही है कि हम अपने आस-पास रहने वाले ऎसे अभावग्रस्तों की जिन्दगी के प्रति संवेदनशील बनें और उन्हें अपनी ओर से हरसंभव मदद दें ताकि भगवान ने धरती पर भेजकर हमें जो पुण्य कमाने का मौका दिया है उसे अच्छी तरह पूरा कर सकें और जब वापस ऊपर जाएं तब गर्व के साथ यह कह सकें कि जिस उद्देश्य से धरती पर इंसान के रूप में पैदा किया था वह फर्ज अच्छी तरह निभाकर लौटे हैं।

पर इस मामले में परत सत्य और यथार्थ यह है कि मरने के बाद ऊपर जाने वाली अधिकांश जीवात्माओं के पास न तो कोई पुण्य संचित रहता है और न अपने बारे में कहने लायक कोई अच्छी बात।

यही कारण है कि आजकल जो लोग ऊपर जा रहे हैं उनमें अधिकांश या तो अतृप्त रह जाने की वजह से भूत-प्रेत, पिशाच आदि बन रहे हैं या फिर उन्हें सीधे ही नरक का रास्ता दिखाया जा रहा है। हम भले ही किसी की मौत के बाद स्वर्गीय या स्वर्गवासी शब्द लगा दें, पर मृतात्मा कितना स्वर्ग लायक था, इस बारे में खुद मृतात्मा भी जानता है और घर वालों से लेकर सभी तरह के परिचितों तक को भी अच्छी तरह पता होता है।

कलिकाल में इंसानों की एक प्रजाति का निरन्तर प्रसार होता जा रहा है जिसके कारण से सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्थाएं डोलने लगी हैं। पूंजीपतियों और गरीबों की बीच की खाइयां निरन्तर बढ़ती जा रही हैं और मानवीय मूल्यों पर घातक प्रभाव पड़ता जा रहा है।

खूब सारे लोग हर इलाके में देखे जाते हैं जिनके पास धन की कोई कमी नहीं होती। अच्छी-खासी सरकारी या गैर सरकारी नौकरी में लगे रहकर मेहनत से कई गुना अधिक माल भी उड़ा रहे हैं और तनख्वाह भी पा रहे हैंं। इन लोगों के पास वह सब कुछ होता है जिसे एक इंसान अपनी जिन्दगी में भोग-विलास और आनंद के लिए पाना चाहता है। धन-सम्पत्ति, आलीशान घर, वाहन और पद-प्रतिष्ठा व प्रभाव से लेकर सब कुछ। फिर भी ऎसे लोग पैसों के पीछे ऎसे भागते हैं कि जैसे जलेबियों के पीछे श्वानों का कुनबा।

ऎसे लोग अपने आप से या अपने काम-काज और प्रभामण्डल से जरा भी प्रसन्न नहीं होते। इनकी जिन्दगी का हर क्षण कुछ न कुछ पाने की दौड़ में ही लगा रहता है। लगता है कि जैसे ये लोग नंगे-भूखे, प्यासे और अतृप्त ही पैदा हुए हैं और मरते दम तक अतृप्त ही रहने वाले हैं।

इन लोगों का एक ही लक्ष्य रहता है और वह यह कि पैसा कहाँ से निकाला या कबाड़ा जाए,  इसके लिए ये सारे संभव हथकण्डे अपनाते रहते हैं।  फिर आजकल ऎसे असन्तुष्ट और अतृप्त लोगों की संख्या दिनों दिन इतनी बढ़ती जा रही है कि हर क्षेत्र में कुछ-कुछ लोगों के छोटे-छोटे समूह बन ही जाते हैं जो ऎसा व्यवहार करते रहते हैं कि जैसे कुंभकर्ण के सम्प्रदाय को धन्य करने वाले ये लोग सदियों से भूखे हों।

जहाँ मौका मिला, वहाँ झपट्टा मार लिया। आसानी से माल पर हाथ डालना नहीं सध पाए तो अपने पद और प्रभाव का भरपूर इस्तेमाल करते हुए डाका डालने जैसी हरकतें करते रहते हैं। खूब सारे लूटेरे और लम्पट ऎसे हैं जिनके पास पैतृक सम्पत्ति का कोई अभाव नहीं है, यहाँ तक कि ससुराल और परिजनों का माल भी पाए या हथियाये हुए हैं और कहीं कोई कमी नहीं है।

फिर भी ऎसे लोग समाज-जीवन के हर क्षेत्र में हाथ डालने और हाथ मारने के लिए लालायित रहते हुए अपनी ऎसी पहचान बना दिया करते हैं कि इनका सहयोग पाने वाले खुद भी समृद्धि पा जाते हैं और दूसरों को भी मालामाल कर सकते हैं।

दिन-रात इनकी पूरी जिन्दगी हाय-हाय करते हुए ही गुजर जाती है। इन हाय-हाय वालों की वजह से सबसे ज्यादा नुकसान उन गरीबों और जरूरतमन्दों को होता है जो हुनरमन्द तो होते हैं लेकिन इन बिचौलियों और कबाड़ियों की वजह से उन्हें अपने लायक काम नहीं मिल पाता है और इस वजह से इन विपन्न लोगों की जिन्दगी हमेशा समस्याओं और अभावों से दो-चार होती रहती है। और वास्तविक प्रतिभाओं का दमन होता है वो अलग।

लेकिन इन हाय-हाय करने वालों पर कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि सब तरफ से समीकरण बिठाने और समझौते कर डालने में माहिर ये लोग किसी प्रतिभाशाली या जरूरतमन्द को आगे आने ही नहीं देते।

इस मामले में इन सैटिंगबाजों का इतना बड़ा तगड़ा नेटवर्क होता है कि चाहे कोई सी टकसाल या रेवड़ी की दुकान हो, उसका रास्ता इन्हीं की तरफ खुलता और निहाल करता हुआ आगे बढ़ता रहता है।

पैसों के पीछे भागने वाले अपने दिमागी घोड़े दौड़ाते हुए शातिर मनोवृत्ति और षड़यंत्रों की बदौलत मेहनतकश लोगों को हमेशा पीछे छोड़ दिया करते हैं और सारे के सारे जायज-नाजायज लाभ खुद ही बटोर लिया करते हैं।

इन हाय-हाय वालों के लिए कोई पराया नहीं होता। जो इन्हें देता है वह दाता और माई-बाप, दादा-दादी और नना-नानी हो जाता है और जिससे कुछ भी पाने की उम्मीद नहीं होती वह नाकारा।

अपने आस-पास देखें तो खूब सारे हैं जो जिन्दगी भर हाय-हाय करते रहते हैं और श्वानों की तरह दौड़-भाग करते हुए दूसरों के निवाले को भी जाने कहां हजम कर लेते हैं और डकार भी नहीं लेते।

ऎसे लोगों की जिन्दगी का हर पल हाय-हाय में ही बीत जाता है। समाज में सभी का ख्याल रखे वही इंसान सामाजिक है, शेष को असामाजिक ही मानना चाहिए। और पैसों के पीछे पगलाये हुए हाय-हाय करने वाले सारे लोग समाज और देश के दुश्मन ही हैं। ये ही लोग हैं जो सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को दीमक की तरह चाट रहे हैं।