जो पहल करेगा, वही आगे बढ़ेगा

आगे वही बढ़ेगा जो कर्म करेगा। जो हाथ पर हाथ धरे बैठा रहेगा, वह हाथ मलता ही रहेगा। दुनिया में आगे बढ़ने और कर्मयोग को आकार देने के लिए अपार संभावनाएं हैं। और ये अवसर हमें अपने पास बुलाते रहते हैं। हम पास न जाएं तो दूसरे लोग हथिया लेते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।

पहल हम ही को करनी पड़ेगी। इसके लिए दृढ़ संकल्प, अपने ज्ञान, अनुभव और हुनर पर भरोसा तथा चरम आत्मविश्वास की बुनियाद मजबूत होनी चाहिए। दुनियावी झंझावातों में वही अपने लक्ष्यों को पा सकता है जो कि हर समस्या, अभाव और अवरोध को चुनौती के रूप में लेकर स्वीकारे और उस पर चढ़ाई करता हुआ विजयश्री का वरण कर ले। सच तो यही यही है कि जो इन परिवेशीय चुनौतियों की छाती पर चढ़कर सफलता का झण्डा गाड़ देता है वहीं सच्चा इंसान है, शेष तो केवल टाईमपास और कामचलाऊ।

इंसान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह अपनी बुद्धि का पूरा-पूरा उपयोग करते हुए हर अच्छे कार्य में पहल करे। आत्मीय जुड़ाव रखे और ऎसे श्रेष्ठ कार्यों में भागीदार बने। जो अच्छे हैं उनमें मददगार बनें और जो बुरे हैं, उन कार्यों से परे रहें और ऎसे कार्यों को हतोत्साहित करें। इंसानियत से भरे-पूरे एक अच्छे आदमी की यही ख़ासियत है।

       अपने स्वार्थ से कोई अच्छे काम या अच्छे आदमी को बुरा बताये अथवा बुरे काम या बुरे आदमी को अच्छा बताये, यह अलग बात है।     आमतौर पर हर इंसान यह समझता जरूर है कि दुनिया में क्या सही, क्या गलत है। क्या स्वीकार्य व क्या तिरस्कार योग्य है।

लेकिन जहाँ उसके कोई से छोटे-मोटे स्वार्थ, खुदगर्जी और नाजायज काम सामने आ जाते हैं, वहां इंसानियत को ताक में रखकर वह सब कुछ भूलकर भेड़ों की मानिन्द उधर बढ़ चलता है जहाँ से उसे कुछ मिलने की उम्मीद होती है।

       यह उम्मीद न हो तो आदमी एक कदम भी आगे न बढ़े। आजकल इंसानाें के मामले में भी बहुत सी विभिन्नताएं देखी जा रही हैं। आदमी के भीतर वह सब कुछ खत्म होता जा रहा है जिसके लिए कहा जाता था कि इंसान में वो ताकत है कि जहाँ ठोकर मारेगा वहीं पानी निकाल देता है। अब या तो ठोकर मारने जितना दम-खम रहा ही नहीं अथवा उसे विश्वास ही नहीं है कि उसके भीतर इतनी शक्ति समाहित है कि कुछ भी परिवर्तन ला सकता है।

       अब आदमी में उतनी जीवनी शक्ति नहीं है, वह जीवट नहीं रहा, जिजीविषा नहीं रहीं और इन सबका स्थान पा लिया है दरिद्रता, आलस्य, कामचोरी व हरामखोरी ने। सकारात्मक चिन्तन और कल्याणकारी श्रेष्ठ कर्मों को करने के लिए वह भले ही आत्महीन बना रहे किन्तु नकारात्मक कर्म और दुष्टता भरी हरकतों को आकार देने के लिए उसे सोचना तक नहीं पड़ता। वह कर गुजरता है।

समाज और क्षेत्र का यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि लोग खोटे और खराब कर्मों को बिना सोचे-समझे कर डालते हैं किन्तु अच्छे काम करने में उन्हें मौत आती है।

       आदमी एटीएम मशीन की तरह हो गया है जो तभी  हरकत में आता है जब उसके तार किसी न किसी लाभ के मौके से जुड़े हों। लाभ न हो तो वो आदमी अधमरा या बेसुध पड़ा रहेगा। जगाये नहीं जगता। ऎसा अभिनय करता है जैसे बरसों से टीबी का मरीज हो और कुपोषण ही उसके जीवन की नियति बन गई हो।

इस मामले में आदमी व्यवसाय होता जा रहा है। वह जो भी कुछ करता है, तभी जब उसे कुछ मिल जाने की आस हो या पहले से ही अनुबंध हो चुका हो। अन्यथा वह एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाता, करवट तक नहीं बदलता, और सीधे मुँह बात नहीं करता।

इस मामले में इस किस्म के आदमी भिखारियों से भी गए-बीते होते हैं। भिखारी कम से कम यह तो कहता ही है कि जो दे उसका भला, न दे उसका भला। और वह मांगता भी है तो भगवान के नाम पर। भिखारियों से भी नीच किस्म के ये इंसान कुछ मिले तभी काम करते हैं और न मिले तो काम बिगाड़ने में भी देर नहीं करते। एक तरह से यह ब्लेकमेलरों के भी दादा हैं।

       एक भूखा और प्यासा आदमी जिस तरह टुकर-टुकर कर देखता है, कुछ पाने के लिए जीभ लपलपाता है। किसी हिंसक जानकार की तरह माँस के लोथडे़ पर लपक कर टूट पड़ता है। उसी तरह आदमी पैसों की खनक सुनते ही जागकर उधर भाग उठता है जिधर कोई रसभरी मिठाई चाशनी से लबालब जलेबी या कोई सुनहरे पैकेट में बँधा हुआ गिफ्ट सामने हो।

और कुछ नहीं तो देह को क्षणिक आनंद से भर देने वाली जिस्म सामने हो, और उन्मुक्त भोग-विलास के एकान्तिक अवसर। कुछ खाने वाले हैं, कुछ पीने वाले हैं, कुछ देहिक आनंद पाने वाले हैं, और खूब सारे ऎसे हैं जो कि सब कुछ करने वाले हुआ करते हैं। हराम का पैसा, जमीन-जायदाद और मुफ्त की मौज मस्ती के पीछे सारे के सारे भिखारी दीवाने हो चले हैं।

       आदमी के बारे में न कोई सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है और न ही आदमी के चेहरे को देखकर उसके दिल व दिमाग में उभरते विचारों को पढ़ा जा सकता है। इसलिए अब परफेक्शन के लिए चिंतित न हो, किसी को भला-बुरा न कहे। जो जैसे हैं उन्हें स्वीकारें।

       कोई जरूरी नहीं कि जिसे हम स्वीकार कर रहे हैं वह जर्सी गाय की तरह दूध देने वाला ही हो, गाय दूध भी देती है और लातें भी मारती है। इस स्थिति में अपेक्षाओं से मुक्त होकर जीना ही आज का सबसे बड़ा युगधर्म है।

       वह जमाना अब चला गया जब लोग समुदाय या अपने बाडे़ का काम स्वेच्छा से कर लिया करते थे। अब आदमी इतना निष्ठुर, निर्लज्ज व नाकारा हो गया है कि वह अपनी ओर से कभी पहल नहीं करता। वह उन्हीं कामों को करने का आदी हो गया है जो काम उसे किसी प्रलोभन या दबाव से सौंपे जाते है। पहल करना अब आदमी के स्वभाव से पूरी तरह गायब हो चुका है।

       इंसान के मामले में अब यह कहा जा सकता है जो अपनी ओर से पहल करते हुए आगे आता है, अच्छे कार्यों को खुद करने का ज़ज़्बा दिखाकर पूरी आत्मीयता से करता है और बेहद सफल परिणाम देता है।

       इस दृष्टि से जो लोग पहल करते हैं वे इंसानियत के सच्चे रखवारे और कर्मयोगी कहे जा सकते हैं। दूसरों के बारे में भगवान भी नहीं बता सकता कि ये इंसान कैसे बन गये। इंसान जग में कुछ पाना चाहे, अपनी प्रतिष्ठा बनाना चाहे तो कर्मयोग से दूर नहीं भागे, खुद पहल करते हुए आगे आएं और अपने आप को पक्के इंसान के रूप में प्रतिष्ठित करें। जो दीनता दिखाता है, पलायन करता है वह अपने पूर्वजन्मों की जड़ता और पशुता पाले रखता है।

1 thought on “जो पहल करेगा, वही आगे बढ़ेगा

  1. कुछ नया करें, अच्छा करें ..
    पहल करना इंसान का स्वभाव है और जड़बुद्धि होकर पड़े रहना नाकारा पशुओं, दरिद्रियों, आलसियों और पराये धन से खान-पान करने वाले विलासियों का।
    जो जैसा चल रहा है, वैसे ही चलने देने में विश्वास करने वाला इंसान धरती पर अनचाहा और अस्वीकार्य बोझ से अधिक नहीं।
    हर क्षण सकारात्मक बदलाव और ऊँचाइयों को पाने के लिए अपनी ओर से जो पहल करता है वही जीवन में सफल होता है। बाकी सभी की जिन्दगी तो बेकार ही है।
    ऎसे नाकारा और अर्थहीन लोग समाज, क्षेत्र और देश के लिए ऎसा घातक कचरा हैं जिनकी डम्पिंग में दशकों लगते हैं। और मरते दम तक ये खर-दूषण समाज व परिवेश में प्रदूषण फैलाते रहते हैं।

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