हमसे बड़ा आवारा कौन ?

वो समय चला गया जब आदमी अपनी निर्धारित जगह पर बैठ कर अपने रोजमर्रा के दायित्वों को अच्छी तरह पूरा कर लिया करता था और जब वहाँ से उठता तब उसे इस बात का संतोष रहता था कि आज उसने जो काम किया है वह पूरा किया है।

इस काम करने का संतोष ही उसके लिए परितृप्ति और आत्म आनन्द का अहसास कराने के लिए काफी हुआ करता था। इस आत्म आनंद के आगे बाहरी प्रोत्साहन, पुरस्कार और सराहना के तमाम सम सामयिक चोंचलें और दिखावों का उसके लिए कोई मूल्य नहीं था।

रोजाना की कार्यपूर्णता का संतोष उसके चेहरे से भी साफ झलकता था और घर पहुँचने के बाद भी न उसे थकान का अहसास होता, न अपने आपको बोझिल ही मानता। दिन भर काम में मग्न रहने के बाद भी ताजगी उसके चेहरे से भाँपी जा सकती थी। यों भी जो लोग मनोयोेग और निरपेक्ष सेवा भाव से अपने काम करते रहते हैं उन्हें न थकान महसूस होती है, न किसी भी प्रकार का कोई आलस्य।

पहले काम खूब होता था और काम करने वाले गिने-चुने, फिर भी सारे के सारे काम अपने समय पर हो जाते थे और वह भी बिना किसी को कुछ कहे, उलाहना या प्रलोभन दिए। आजकल परिस्थितियां ठीक उलट हो गई हैं। काम करने वालों की भारी भीड़ यहाँ-वहाँ जमा है, कर्म में सहयोग और गति देने वाले कई सारे उपकरण और अत्याधुनिक तकनीकों की भरमार है, फिर भी अपेक्षित काम नहीं हो पा रहा है। पहले स्रष्टाओं का बाहुल्य था, अब लालची मूक द्रष्टाओं की भरमार है।

कई जगहों पर तो टाईमपास के सिवा कोई काम है ही नहीं। और कई जगह महीने में दो-चार दिन का ही काम रहता है बस। फिर भी वह समय पर पूरा नहीं होता। अब आदमी की रुचि काम करने की बजाय इधर-उधर की बातें करने और बेवजह घूम-फिर कर दिन गुजार देने तक सीमित होकर रह गई है।

खूब सारे लोग ऎसे मिल जाएंगे जो कहीं भी किसी एक जगह टिक कर बैठ नहीं सकते। इन्हें एक जगह कुछ घण्टे ही टिकाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। काम-धाम भी तब हो जब टिक कर बैठने की आदत डालें। इस मामले में पूरी दुनिया के इंसानों को मात्र दो श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है।

एक वे हैं जो टिक कर बैठते हैं और अपने कत्र्तव्य कर्मों का नियमित संपादन भी कर दिया करते हैं। दूसरी श्रेणी में वे लोग आते हैं जो अपने कत्र्तव्य कर्म के प्रति उदासीन हैं लेकिन इसके अलावा दुनिया के सारे काम इनसे करा लो, कभी मना नहीं। घूमने-फिरने और टाईमपास करने में ही इनकी दिलचस्पी बनी रहती है। एक काम करने वाले हैं और दूसरे काम छोड़कर बिना किसी कारण के  भागने-फिरने वाले। 

हर इंसान की जिन्दगी आजीविका निर्वाह पर टिकी हुई है और ऎसे में उसे अपने कत्र्तव्य कर्म यानि की ड्यूटी के प्रति वफादार होना ही चाहिए लेकिन इंसान की फितरत ही ऎसी होती जा रही है कि वह बाहरी चकाचौंध और संगी-साथियों के साथ टाईमपास करने को ही जिन्दगी समझ बैठा है और जिन आधारों पर वह टिका हुआ होता है उनकी निरन्तर उपेक्षा, अवहेलना और अनादर करता रहता है।

जो लोग अपने कर्म, समय और निष्ठा से जी चुराते हैं वे समाज और देश के सबसे बड़े शत्रु हैं।  इन लोगों की तुलना आवारा पशुओं के साथ किया जाना भी किसी तरह बेमानी नहीं होगा।  बड़ी ही ईमानदारी के साथ यह तुलना की जाए तो बहुत से लोगों का चरित्र हमारे सामने रील की तरह चलने लगेगा। इन आवाराओं से तो वे पशु लाख दर्जे अच्छे हैं।

पुराने जमाने से माना जाता रहा है कि जिन लोगों की बैठक सिद्ध होती है अर्थात जो एक जगह टिक कर काम करने की आदत पाल लेते हैं वे जीवन में कभी निराश या दुःखी नहीं होते मगर जो लोग टिक कर बैठ तक नहीं सकते, वे न अपना काम ढंग से कर पाते हैं, न औरों के किसी काम ही आ सकते हैं।

ऎसे लोगों का पूरा का पूरा जीवन समस्याओं और दुःखों से घिरा रहता है। इन लोगों को मृत्यु आने तक अस्पतालों के चक्कर काटने और जाँचें करवाने की विवशता बनी रहती है। ड्यूटी टाईम में बेवजह घूमना और अपने कामों से जी चुराना अपने आप में इंसान की वह अमर्यादित आदत और दुराचरण  है जिसके रहते हुए कोई भी इंसान कभी बरकत नहीं पा सकता।

जो औरों को बेवजह घूमाता और चक्कर देता है उसे ईश्वर भी चक्करघिन्नी बना कर ही छोड़ता है। सब जगह हम चिल्लाते हैं कि लोग काम नहीं करते, कोई काम करना चाहता ही नहीं, सभी जगह निकम्मे भरे पड़े हैं आदि-आदि।

आजकल सर्वत्र यही सब सुना जा रहा है लेकिन कोई इस बात पर गौर नहीं करता कि आखिर आदमी को ऎसा कौनसा असाध्य रोग या वायरस  लग गया है कि वह काम करना नहीं चाहता। उसे बिना किसी काम धाम के बाहर घूमना (स्थानीय भाषा में रवड़ना और रखड़ना) क्यों रास आ गया है। सब जगह यही एक शिकायत सामने क्यों आती है।

इतना तो मानना ही पड़ेगा कि जिन लोगों की मनोवृत्ति एक बार संगी-साथियों के साथ गपियाने, टाईमपास करने, चाय-काफी की चुस्कियों, चाट-पकौड़ों, समोसे-कचोड़ियों का स्वाद लेने और बेवजह घूमते फिरने में लग जाया करती है उन लोगों को जानकार लोग नाकारा और आवाराओं  की श्रेणी में शामिल करते हैं और यह मान बैठते हैं कि ऎसे लोग न समाज के हैं, न संस्थान या अपने।

यह अलग बात है कि कोई इन्हें इनकी औकात बताना नहीं चाहता। कारण यह कि कोई भी आदमी नालायकों और दुर्जनों के मुँह लगना नहीं चाहता, उनसे दूरी ही बनाए रखता है। इन लोगों को घूमने-फिरने दो, दुनिया जहान की चर्चाएं करने दो और चाहे जिस तरह भी हो टाईमपास करने दो।

समझदार इंसान ऎसे लोगों से किसी भी प्रकार की कोई उम्मीद कभी नहीं रखते। दोष किसी और का नहीं, हम सभी जिम्मेदार हैं। जो पालतु या फालतु घूम रहे हैं वे भी, और जो इन्हें फालतू का घूमने देने की आजादी दे रहे हैं वे भी।

आज ऎसे उन्मुक्तों और निरंकुश लोगों पर लगाम नहीं कसी गई तो आने वाला न समाज के लिए अच्छा है, न देश के लिए। बहुत जरूरी हो चला है कि अब ऎसे लोगों पर नकेल कसें और इनकी ऊर्जाओं और क्षमताओं को देश के किसी काम में लगाने के लिए चौतरफा प्रयास करें।

समझाईश से बात न बने तो आर्थिक, सामाजिक और संस्थागत दण्ड दें। फिर भी न मानें तो मुख्य धारा से धकिया कर बाहर करें। इनके जाने से कोई फरक नहीं पड़ने वाला। कर्मठ, ऊर्जस्वी और निष्ठावान युवाओं की बहुत बड़ी फौज को हमसे बहुत निष्ठाएं हैं, इन युवाओं के हाथों में काम सौंपे, फिर देखें नया पानी किस शिद्दत और समर्पण से काम करने लगता है।

बहुत बड़ी संख्या में ओजस्वी और हमसे भी कई गुना सक्षम युवाओं का कारवाँ हमारी तरफ आशाओं भरी निगाहों से देख रहा है। फिर देर किस बात की, अंधेरों और निराशाओं के भँवर से बाहर निकलने के लिए बदलाव हमें ही लाना है, प्रतिस्थापन हमें ही करना है। हम सब कमर कसें और कुछ कर दिखाएं, यही युग की मांग है।

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