जो प्रोत्साहित करे वही अपना,  बाकी सब पराये

जो प्रोत्साहित करे वही अपना, बाकी सब पराये

हर इंसान के भीतर पूर्ण रूप में सभी क्षमताएं विद्यमान हैं जिनका ज्ञान पाकर वह इनका समुचित उपयोग करते हुए अपने आपको संसार भर में किसी न किसी विधा में प्रतिष्ठित कर सकता है और अन्यतम पहचान बना सकता है।

यह इंसान पर निर्भर है कि अपने भीतर समाहित अपार क्षमताओं और अनन्त संभावनाओं को वह किस प्रकार विवेक बुद्धि से देख कर  उनका अपने व्यक्तित्व विकास तथा जगत कल्याण में उपयोग कर पाता है।

भगवान ने किसी में कोई कमी नहीं रख छोड़ी है चाहे किसी भी जात-पात का हो, रंग-रूप का हो या फिर किसी भी भौागोलिक क्षेत्र अथवा कुटुम्ब का क्याें न हो।

सांसारिकता के प्रपंचों के बीच रमने के कारण हम भौतिक सम्पदा और जमीन-जायदाद के लोभियों और कबाड़ियों की तरह रुपया-पैसा और भोग-विलासी संसाधनों का संग्रहण करने वाले तथा अपने-अपने निर्धारित सीमित दायरों वाले मैदानों में घोड़ों की तरह चक्कर काटते रहने वालों को ही अपना रोल मॉडल मानकर चलते रहते हैं।

और इसका नतीजा यह होता है कि हम बड़े लक्ष्यों को भूलकर उन लोगाेंं का अनुकरण करना आरंभ कर दिया करते हैं जो लोग हमारी दृष्टि में पैसे, प्रभुत्व और प्रभाव वाले हैं। चाहे ये स्वयंभू और स्वनामधन्य लोग मलीन मार्गों और नाजायज गलियों से होकर ही क्यों न आगे बढ़े हों।

इस भौतिक चकाचौंध के फेर में घनचक्कर हुए हम लोग हीन और नीच कर्म को ही लक्ष्य मानकर बड़े और शुभ्र लक्ष्यों को भुला देते हैं और जिन्दगी भर दूसरों की देखादेखी परिग्रही जिन्दगी जीते हुए खुद को महान एवं वैभवशाली समझते हुए आत्ममुग्ध होकर जीते रहते हैं और अहंकारों के जाने कितने सिंहासनों पर उछलकूद करते हुए सातवें आसमान  तक की टोह लेते दिखाई देते हैं।

अधिकांश लोगों की स्थिति यह होती है कि उन्हें अपनी क्षमताओं और शक्तियों के बारे में कुछ भी पता नहीं होता है इसलिए वे जिन्दगी भर दूसरों के भरोसे जीने की आदत पाल लिया करते हैं और परायों के पालतु की तरह जीवनयापन करते रहते हैं।

सर्वाधिक संख्या उन लोगों की हुआ करती है जो कि अज्ञानता के कारण स्वयं भी आत्महीनता के दौर में रहा करते हैं और अपने आस-पास वाले लोगों को भी हीनता का बोध कराते रहते हैं।

यही कारण है दुनिया में अधिकांश लोग छोटी-छोटी असफलताओं, अभावों और समस्याओं के सामने आ जाने पर दीन-हीन की तरह व्यवहार करने लगते हैं। कोई अपने आप को दास मानता है, कोई कहता है हम गरीब हैं, कोई अपने आपको निरीह मानता है और इस तरह के सारे के सारे लोग आत्महीनता के भँवर में ऎसे फँस जाते हैं कि मृत्यु होने तक भी बाहर नहीं निकल पाते।

समाज की स्थिति भी कोई अच्छी नहीं कही जा सकती। सभी लोग अपने-अपने इलाके में गरीबों, अभावग्रस्तों और विपन्नों के होने की बात तो स्वीकारते हैं, ऊपर से संवेदना और सहानुभूति के बोल प्रकट कर अपने कत्र्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं लेकिन इन जरूरतमन्दों को किस तरह विकास की मुख्य धारा में लाया जाए, इस बारे में ये कुछ नहीं करते।

मूकद्रष्टा, नाकारा और तटस्थ होकर जीते रहते हैं। द्रष्टा भाव को अपनाने वाले इन उदासीन लोगों की समाज के नवनिर्माण में कोई भूमिका नहीं होती, सिवाय फालतू का शोर मचाने के।

सामाजिक और परिवेशीय जीवन में यदि इंसान को उसके भीतर समाहित ऊर्जा और शक्तियों का बोध कराया जाए तो कोई कारण नहीं कि भीतरी ताकत जागृत न हो।  कोई भी इंसान नाकारा नहीं होता। जिसे भगवान ने धरती पर भेजा है उसमें कोई न कोई गुण तो है ही। लेकिन प्रोत्साहन के अभाव में इस गुण और शक्ति का जागरण नहीं हो पाता।

किसी भी इंसान को आत्महीनता की नज़रबन्दी से मुक्त करा दिया जाए तो वह अपने आप प्रगति के सोपान तय करने लगेगा। लेकिन हमारे समुदाय की स्थिति बड़ी ही विचित्र है।  हमारे आस-पास और परिवेश में तथा हमसे संबंध रखने वाले अधिकांश लोग खुद प्रतिभाशून्य हुआ करते हैं और इस कारण से ये लोग चमचागिरी और चापलुसी करते हुए या कि किसी न किसी को सभी प्रकार का आनंद प्रदान करने की विलक्षण क्षमताओं का उपयोग कर कोई न कोई मुकाम पा लेते हैं।

और इस वजह से इन लोगों में दूसरों के मूल्यांकन, दक्षता परीक्षण आदि की दृष्टि समाप्त हो जाती है। फिर जो लोग एक बार किसी न किसी न किसी मुख्य धारा का शहद चाटने-चटवाने का पता पा जाते हैं वे औरों को हीनता की दृष्टि से देखते रहते हैं और इनका हमेशा यही प्रयास रहता है कि दूसरे लोग इस मुख्य धारा से दूर ही रहें और दूर रहकर ही सब कुछ देखते रहें व अपने आपको हीन तथा सामने वालों को महान अनुभव करते रहें।

ये ही लोग प्रतिभाओं और रचनात्मक कर्मयोग के सबसे बड़े और क्रूर हत्यारों के रूप में अपनी कारगुजारियां करते रहते हैं। ये लोग हमेशा प्रतिभाओं का दमन करते हैं और अच्छे काम करने वालों को हतोत्साहित एवं प्रताड़ित करते रहते हैं।

इस कारण से अच्छे-सच्चे और सज्जन लोग अपने कर्मयोग को सुनहरा आकार नहीं दे पाते और पलायन कर जाते हैं। इससे समाज और देश को भी नुकसान उठाना पड़ता है और वह भी उन लोगों के कारण से जो कि अपने आप में नाकारा, नपुंसक और धूर्त-मक्कार हैं।

हम सभी लोग दुनिया में क्रान्ति और नवनिर्माण में सक्षम हैं लेकिन इसके लिए हमें अपने आपको जगाने की जरूरत है। इस दृष्टि से हमारे आस-पास वाले और मित्र, घरवाले तथा सभी प्रकार के परिचितों में उन्हीं को अपना मानना चाहिए जो कि हमें प्रोत्साहन कर आगे बढ़ाते रहें।

जो प्रोत्साहित करता है वही हमारा सच्चा शुभचिन्तक होता है क्योंकि उसके द्वारा प्राप्त प्रोत्साहन से हमें अपनी शक्तियों का अहसास होता है और इन शक्तियों का जागरण हमें लक्ष्य तक पहुँचाता है।

इसके विपरीत वे सारे लोग हमारे नम्बर एक के शत्रु हैं जो कि हमें हतोत्साहित करते हैं, आत्महीनता के गहरे कूए में धकेलते हैं और किसी न किसी बहाने प्रताड़ित करते रहते हैं।

जो हतोत्साहित करते हैं उनका साथ छोड़े बिना हमारा भला नहीं हो सकता। इतना ही काफी नहीं है, ऎसे लोगों को ठिकाने लगाने के लिए सभी संभव उपायों को समय पर करने की आवश्यकता है क्योंकि समाज और देश के यही सबसे बड़े और छिपे हुए शत्रु हुआ करते हैं।

बाहरी शत्रुओं और आतंकियों से भी पहले इनका खात्मा करना वर्तमान युग की सर्वोपरि प्राथमिकता हो गई है। अपने आस-पास और साथ में ही ऎसे खूब सारे लोग हैं जो गद्दार राष्ट्रभक्षी के रूप में अपनी काली और घातक करतूतोंको अंजाम दे रहे हैं।

यही लोग हैं जिनके कारण से भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और अन्याय-शोषण पसरता जा रहा है। एक बार जो भ्रष्ट हो गया, वह कोई सा अपराध कर सकता है, उसका बस चले तो देश का भी सौदा कर डाले।

उन्हीं लोगों को साथ रखें, उन्हीं के साथ रहें, जो पग-पग पर प्रोत्साहन देते रहते हैं। उन्हें तिलांजलि देकर उनके नाम का तर्पण कर डालें जो लोग किसी न किसी बहाने हतोत्साहित कर हमारे व्यक्तित्व और कर्मयोग का क्षरण करने का षड़यंत्र करते रहते हैं।

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