व्हाट्सअपिया गरुड़ पुराण ….

व्हाट्सअप ने क्या से क्या कर डाला, जीवनशैली में आया आमूलचूल बदलाव,

हम उनके आभारी हैं जो व्हाट्सअप पर ब्रह्माण्ड भर का ज्ञान, चित्र और भविष्यवाणियों तथा नवीनतम प्रयोगों एवं नवाचारों से रूबरू कराते रहे हैं।

जब से गुड मॉर्निंग के ढेरों संदेश आने लगे हैं तभी से जागरण का इतना अधिक ग्राफ बढ़ गया है कि रात हो जाने पर भी नींद नहीं आती। जब-जब भी सोने की कोशिश करते हैं मस्तिष्क में गुड मॉर्निंग उभर कर आ जाता है और हमेशा यही भ्रम रहता है कि अभी-अभी दिन उग गया है।

जब से गुड नाईट के संदेशों की बौछार होने लगी है तभी से इतनी अधिक नींद भी आने लगी है कि सवेरे जैसे ही उठने का जतन करते हैं, दिमाग में कौंधने लगते हैं वे सारे संदेश, जिनमें गुड नाईट लिखा होता है।

जिस दिन गुड मॉर्निंग के संदेशों का बाहुल्य रहता है उस दिन नींद गायब हो जाती है और रात को भी दिन का माहौल नज़र आता है या भ्रम बना रहता है कि अभी रात नहीं हुई।

और जिस दिन गुड नाईट वाले संदेशों की संख्या बढ़ जाती है उस दिन नींद खुलती ही नहीं, सूरज उगने के बाद भी लगता है कि अभी रात बाकी है, सूरज शायद गलती से निकल आया है।

गुड मॉर्निंग और गुड नाईट के संदेशों में बहुमत का गणित कभी दिन की लम्बाई बढ़ा कर नींद छीन लेता है, और कभी रात की लम्बाई बढ़ा कर जगने से रोक देता है।

इन संदेशों के साथ  जात-जात के पुष्पों के चित्र आते हैं तो इनकी सुगन्ध के कतरे दिन भर इतने अधिक पसरे रहते हैं कि इसके आगे डियो और विदेशों से आयातित इत्र-फुलैल और स्प्रे तक फीके पड़ गए हैं। पता ही नहीं चल पाता कि आखिर खुशबू गुलाब की है या चम्पा, मोगरा, चमेली या किसी और की।  यहां तक कि भगवान के सामने जलायी जाने वाली धूप बत्ती और अगरबत्ती तक की सुगंध का पता ही नहीं चल पाता।

फिर रोजाना इतने सारे भगवानों के फोटो और स्तुतियों, मंत्रों और भजनों की बारिश करने वाले मैसेज आते रहते हैं तब लगता है कि चौतरफा धर्म का ज्वार आ धमका है।

पूजा और ध्यान करने बैठते हैं तब लगता है कि अद्वैत और वेदान्त को अपनाएं, ज्ञान या भक्ति को अपनाएं, एकेश्वरवाद की प्रतिष्ठा करें या बहु ईश्वरवाद की।

कभी-कभार तो इन संदेशों के साथ इतने अधिक भगवानों का जमघट लग जाता है कि लगता है देवी-देवताओं के चित्रों, कैसेट्स और कैलेण्डर्स की दुकान चला रहे हों और सारे भगवान संघर्ष की मुद्रा में कभी हंसते हैं, कभी हम पर रोते हैं और कभी कुछ और सोचते रहते हैं।

इनसे छुटकारा मिल ही नहीं पाता कि खूब सारे बाबाओं के प्रवचन, उपदेश और दुनिया भर की इतनी अधिक अनचाही सामग्री का ढेर लग जाता है कि जैसे हमने कबाड़ियों का कोई मॉल या मल्टीप्लेक्स या कि सुपर बाजार ही खोल दिया हो जहाँ वो हर सामग्री उपलब्ध है जिसे कबाड़ कहा जा सकता है।

व्हाट्सअप संसार के बेताज बादशाह बनने के फेर में खूब सारे लोगों को यकायक लीडरशिप की याद आ जाती है और वे ग्रुप बनाकर स्वयंभू एडमिन बनकर उन सभी को जोड़ दिया करते हैं जो परिचित, रिश्तेदार और जानकार होते हैं जैसे कि हम पर कृपा, अनुकंपा और दया करते हुए शेष दुनिया से जोड़ कर हमें वैश्विक पहचान दे रहे हों। बने रहो तब भी आफत, लेफ्ट हो जाओ तब भी आफत।

जिसे देखो वो व्हाट्सअप के नेटवर्क से जुड़ कर सबसे पहले उन्हीं को हैरान-परेशान करने लगता है जो सम्पर्कित हों।  करे भी क्यों नहीं, जब सारा कुछ मुफ्त में आवागमन, आयात-निर्यात हो रहा हो।

सामाजिक समरसता, मानव-मानव में एकत्व और समानता तथा समभाव का इससे और अधिक कोई दूसरा जीवन्त मंच हो ही नहीं सकता जहाँ बचपन से लेकर पचपन तक और इससे भी अधिक पार आयु वाले सारे विद्वान और विदुषियां मिलकर दुनिया की सेवा में जुटे हुए हैं।

पढ़े-लिखें हों या अनपढ़, लट्ठमार हों या पहलवान, ज्ञानी-विज्ञानी हों या कितने ही मेधावी। इस घाट पर आकर सारे एक साथ पानी पीते हैं, एक साथ हघते-मूतते और बेशर्म होकर नहाते-धोते हैं और एक साथ तर्क-वितर्क-कुतर्क के साथ आत्म प्रशंसा के गीत गाने लगते हैं।

इस अजायबघर या अभ्यारण्य में कोई ऊँच-नीच और छोटा-बड़ा नहीं है। सारे के सारे के बराबरी के हकदार हैं और सब कुछ सोचने, करने के लिए स्वच्छन्द हैं।

अब कोई कभी बोर नहीं होता। न किसी और की जरूरत पड़ती है। इंसानों की बस्ती में रहते हुए एकान्त का मजा और वह भी अपने मनमाफिक। जब इंसानियत ही नहीं रही, तब हमें इंसानों की क्या आवश्यकता। जब हम सारे के सारे असामाजिक होते जा रहे हैं, खुदगर्ज हो गए हैं तब क्या जरूरत है समाज की। गधे-घोड़े, बन्दर-भालुओं, सूअर और उल्लु-चमगादड़ों का कौनसा कोई समाज है।

घर-परिवार, समाज, क्षेत्र और देश के लिए कोई काम बता दें, किसी प्रकार की सेवा का काम सामने आ जाए, तो हम यह कहकर साफ छूट पड़ते हैं कि मरने तक की फुरसत नहीं है, लेकिन व्हाट्सअप की दुनिया में रोजाना घुसे रहकर घण्टों तक मानसिक यायावरी करने में न तो हमें थकान का अनुभव होता है और न ही कोई पछतावा। बल्कि मौज-मस्ती और आनंद का ही अनुभव होता है और वह भी मुफतिया। और ऎसा आनंद हमें न तो माता-पिता और बुजुर्गों या अपने सहधर्मियों-सहकर्मियों, कुटुम्बियों के साथ आता है और न ही अपने बंधुओं और भगिनियों के साथ।

इस काम के लिए तो हमारे पास घण्टों की फुरसत रहा करती है। बात जो हमारे व्यक्तित्व विकास, ज्ञान और लोकप्रियता की है। हमारा सारा ज्ञान, हुनर और समय अब इसी में खर्च हो रहा है। हमारी वैश्विक पहचान बन रही है, दुनिया के लोगों से नेटवर्क स्थापित हो रहा है। यह कोई कम बात है?

आज हम विश्व भर में संचरित नेटवर्क का हिस्सा हो गए हैं, यही हमारे लिए परम गौरव और गर्व का विषय है।  यह कितनी अच्छी बात है कि हमारे पुरखे जो नहीं कर पाए, वो काम हम रोजाना करने लगे हैं।

आज हम अपने बारे में भले न जा पाएं, अपने घर-परिवार और क्षेत्र के बारे में न जान पाएं लेकिन पूरी दुनिया के बारे में हमारा अतुलनीय, अनन्त, अथाह और अपार ज्ञान इस बात को सिद्ध करता है कि हमारे जैसे लोग सदियों में पैदा होते हैं जिनका सामान्य ज्ञान ही नहीं अपितु असामान्य ज्ञान भी बीते युगों के हमारे पूर्वजों से कई हजार गुना अधिक है।

हमारी यह यात्रा इसी तरह बरकरार रही तो आने वाला कल हमारा ही होगा। हमारे सामने न कोई समस्या होगी, न हम अभावों का परंपरागत रोना रोएंगे। न हमें पुरुषार्थ करना पड़ेगा। क्योंकि इन सभी का अन्ततोगत्वा अंतिम लक्ष्य आनंद पाना ही है और वो काम हम अभी कर रहे हैं।

आईये अपने आपको और अधिक ज्ञानवान, हुनरमन्द बनाएं और किसी एक कोने में सदा शोक सन्तप्तों की तरह मरे-अधमरे पड़े रहकर स्थितप्रज्ञता या समाधि अवस्था के साथ वैश्विक पहचान बनाते हुए आत्ममुग्ध अवस्था में रमे रहकर उस दिन की प्रतीक्षा करें जब संसार से इतना सारा ज्ञान पाकर ऊपर वाले के बुलावा आ जाए।

हमने यह सिद्ध कर दिया है कि ऊपर वाले ने जिस मंशा से धरा पर भेजा था उसकी अपेक्षाओं पर लाख गुना अधिक खरे उतर कर हम वो सब कुछ लेकर ऊपर जाएंगे, जो हमारे पुरखे लाख जतन करके भी नहीं ले जा पाए।  यही हमारी तरक्की और उपलब्धि है।

आईये हम सब मिलकर इस दिशा में और अधिक आगे बढ़ें, हमारे पास इसके सिवा और क्या रह गया है। न जीवन का कोई लक्ष्य बचा है, न कोई ध्येय।

सभी व्हाट्सअपियों के प्रति विनम्र श्रद्धान्जलि के साथ।

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