हम क्या कर रहे हैं हिन्दी के लिए?

आज हिन्दी दिवस है। हम सब हिन्दी के लिए ही आज चर्चाओं में व्यस्त हैं और हिन्दी के लिए समर्पित होने के वादों और दावों में रमे हुए अपने आपको इस तरह प्रदर्शित करेंगे कि जैसे हमसे बड़ा हिन्दी भाषी और हिन्दी सेवी कोई और हो ही नहीं।

हिन्दी का संबंध आम इंसान से है और हरेक आदमी को इस बारे में सोचने की आवश्यकता है कि हिन्दी को अपनाए, हिन्दी के लिए कुछ करे और हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आगे आए।

देखा यह गया है कि हिन्दी दिवस, सप्ताह और पखवाड़ा हो, इसका सीधा सा संबंध जोड़ दिया जाता है कि हिन्दी के शिक्षकों, प्रोफेसरों और स्कूलों से, हिन्दी के नवोदित और स्थापित साहित्यकारों से, जिनमें कवियों और लेखकों से लेकर सभी प्रकार के हिन्दी अनुरागी, हिन्दी सेवी, हिन्दी साहित्य से संबंधित संस्थाएं और इनके प्रबन्धन से जुड़े लोग। और अतिथियों में उनकी बहुतायत होती है जो अंग्रेजी के पैरोकार और दास हैं।

कई जगह तो हिन्दी के तमाम सालाना आयोजनोंं में अतिथियों से लेकर वक्ताओं, संभागियों और सम्मानितों के नाम बार-बार वही होते हैं जो पिछले बरसों में सामने आते रहे हैं।

हिन्दी को लेकर जितना शोरगुल मचाया जाता रहा है, जितने आयोजन हर साल होते हैं, जितने सप्ताह और पखवाड़े चलते रहते हैं, उन सभी के पिछले रिकार्ड को देखा जाए तो हजारों लोग हिन्दी के नाम पर सम्मानित-अभिनंदित और पुरस्कृत हो चुके हैं, सैकड़ों वक्ताओं को लोग सुन चुके हैं, हजारों लोग भागीदारी अदा कर चुके हैं बावजूद इसके हिन्दी आज उतनी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर पायी है जितनी होनी चाहिए।

हिन्दी के विकास और विस्तार के लिए जो लोग जिम्मेदार हैं, जो हर साल हिन्दी दिवस पर हिन्दी के प्रचार-प्रसार की बातें करते हैं, हिन्दी की उपेक्षा का रोना रोते रहते हैं, उन सभी महानुभावों की हिन्दी सेवा के यथार्थ को देखा जाए तो हालात दयनीय, शर्मनाक और अजीबोगरीब ही होंगे।

हिन्दी सेवा और प्रचार-प्रसार का अर्थ यही नहीं है कि हम सजे-सजाये मंचों का उपयोग करने की चतुराई भरी क्षमता पा लें, अपने आपको क्षेत्र का सबसे बड़ा, वयोवृद्ध और विद्वान हिन्दी सेवा मानकर अहंकार में भर फूले न समाएं, हर बार अध्यक्षता, विशिष्ट और मुख्य आतिथ्य या फिर मुख्य वक्ता की दौड़ में लगे रहें, हमेशा यही चाहें कि जब तक हम जिन्दा रहेंं तब तक हिन्दी के नाम पर जो कुछ आयोजन हो उसमें हमें ही प्रतिष्ठा, सम्मान, पुरस्कार और अभिनंदन से नवाजा जाता रहे।

हिन्दी के नाम पर जो कुछ हो उसमें हमें ही महत्व प्राप्त होता रहे। इसी स्पीडब्रेकरी मानसिकता ने हिन्दी जगत का कबाड़ा करके रख दिया है।  हिन्दी साहित्य और भाषा की जो परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है उसे आगे बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि हिन्दी भाषा और साहित्य की विभिन्न विधाओं में जो नए लोग यानि कि नवोदित आगे आते हैं उनके सृजन को समुचित प्रोत्साहन, सम्मान और सम्बल दें, उनके सृजन को परिमार्जित करने और प्रकाशन के अवसर दें और हमेशा दूसरी पीढ़ी को आगे आने के लायक माहौल दें।

पर ऎसा नहीं हो पा रहा है। इसी का परिणाम है कि आज हिन्दी साहित्य और हिन्दी जगत चंद लोगों के नाम से जाना जा रहा है, नई पीढ़ी को अब अरुचि होने लगी है।

इसके लिए हम लोग जिम्मेदार हैं जो बीच में अड़े हुए न तो खुद आगे बढ़ना चाहते हैं न औरों को कोई मौका देना चाहते हैं। बात प्रकाशन, प्रतिष्ठा, सम्मान, अभिनंदन और पुरस्कारों की हो या फिर दूरदर्शन और आकाशवाणी पर पारिश्रमिक पाने अवसर देने की, कुछ लोगों की मानसिकता ही यह हो गई है कि जहां कहीं कोई पुरस्कार या पारिश्रमिक अथवा कोई दूसरा लाभ का मौका हो, उसे चुपचाप खुद लूट लो, और जहां भीड़ जुटानी हो, कोई से अनुदानित साहित्यिक आयोजन के लिए संभागियों का टोंटा पड़ जाए, तो बेचारे उन लोगों को पकड़ लो जिन्हें हिन्दी साहित्य और हिन्दी सेवा में रुचि है और साथ में महत्वाकांक्षा और उच्चाकांक्षा भी।

जितने भी हिन्दी सेवी हैं उन सभी को इस बात पर चिन्तन करना चाहिए कि पराये मंचों और अवसरों के प्रति जितने उत्सुक रहते हैं उतने हिन्दी के उन आयोजनों के प्रति क्यों नहीं रह सकते जहां कुछ लाभ न दिखता हो।

समाज के सामने हिन्दी की बात चलती है तब मुखर होकर लोग इस प्रश्न को उछालने में कोई शर्म नहीं करते कि जिन लोगों को हिन्दी के नाम पर जाना जाता है उसमें से कितने फीसदी लोग हैं जो हिन्दी भाषा और साहित्य के नाम पर अपनी ओर से एक पाई भी खर्च करते हैं, खुद पहल करके कोई आयोजन भी करते हैं अथवा हिन्दी के नाम पर साल भर में कोई गतिविधि भी करते हैं अथवा हिन्दी क्षेत्र में नवागंतुक प्रतिभाओं के प्रोत्साहन और सम्बलन के लिए कुछ करते भी हैं।

जवाब देने की स्थिति में हम नहीं हैं क्योंकि हमने हिन्दी को अपनी वैयक्तिक संकीर्ण प्रतिष्ठा से इतना अधिक जोड़ दिया है कि हम ही हम सब जगह हमेशा बने रहना और फबना चाहते हैं, हम औरों को बर्दाश्त नहीं कर पाते।

और यही कारण है कि हमने हिन्दी के सहारे साहित्य और लाभ दिलाने वाली परंपराओं में अव्वल रहने के लिए अपने-अपने कई सारे समूह बना लिए हैं, उन्हीं समूहों में रहकर एक-दूसरे को उपकृत करना और लाभ पाना हमने अपना धंधा बना लिया है। इन समूहों की हकीकत को समझने वाले लोग इन्हें गिरोह से कमतर नहीं आँकते।

अपने इन समूहों में हमने प्रतिभा, ज्ञान या विलक्षणताओं की बजाय इसी बात को तवज्जो दे रखी है कि कौन कितना अधिक लाभान्वित कर सकता है। हिन्दी के नाम पर आज जो कुछ हम कर रहे हैं वह हिन्दी जगत के लिए घातक है और यही कारण है कि हिन्दी को अपेक्षित सम्मान नहीं मिल पा रहा है। लेकिन उससे हमें कोई सरोकार नहीं है क्योंकि हमें हिन्दी की बजाय अपनी प्रतिष्ठा की पड़ी है, हम चाहते हैं कि हमें धेला भी खर्च नहीं करना पड़े, और लोग हिन्दी सेवी के नाम पर हमें तब तक पूजते रहें जब तक हमारा प्राणान्त न हो जाए।

हमारी दिली इच्छा तो यह भी रहती ही है कि हमारे मरने के बाद भी हमारा नाम चलता रहे, हमारी मूर्तियां लगें और लोग साल भर नहीं तो कम से कम एक दिन हिन्दी दिवस पर तो माला चढ़ाकर फोटो खिंचवाएं हीं।

हिन्दी जगत से जुड़े हम सभी लोगों का दायित्व है कि सरकार या भामाशाहों, अतिथि बनने के लोभ में सहयोग करने वालों अथवा किसी भी प्रकार के प्रायोजकों की तलाश में न रहकर खुद के पैसों से ऎसा कुछ करें कि साल भर हिन्दी की सेवा होती रहे।

इसके साथ ही हिन्दी के लिए घातक विषयों पर चुप रहकर तमाशा देखने की बजाय मुखर होने की जरूरत भी है। हिन्दी के लिए पराश्रित बने हुए लोगों से हिन्दी के विकास की उम्मीद करना मूर्खता है। नौटंकियों का वक्त चला गया। लोग समझदार हो गए हैं।  खुद कुछ करें, हिन्दी को यथोचित सम्मान दिलाएं या दूसरे लोगों को आगे आने दें।

हिन्दी दिवस की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ …।