खर-दूषणी खरपतवार

खर-दूषणी खरपतवार

संसार ढेरों विचित्रताओं से भरा है। अपने आप में यह संसार वह बहुत बड़ा कड़ाह है जिसमें दुःख, विषाद, तनाव, रोग, समस्याएं, अभाव और विपदाएं हैं और कोई प्राणी ऎसा नहीं है जो कि इन कारकों से प्रभावित न हो।

अभावों और समस्याओं से भी ज्यादा लोग बेवजह पैदा हो जाने वाली शत्रुओं की फसलों से दुःखी है। यह फसलें घातक और विषाक्त खरपतवार की तरह ही हैं जो दुनिया में कहीं भी किसी भी क्षेत्र में पनप और पसर सकती हैं।

और सबसे बड़ी खासियत ये कि इस खरपतवार का हमारे जीवन के लिए भले ही कोई महत्व या उपयोग न हो, ये अपने आँगन तक किसी न किसी तरीके से पहुंच ही जाती है। दुनिया के अधिकांश लोग अभावों और समस्याओं से जितने परेशान नहीं हैं उतने त्रस्त उन लोगों से हैं जो कि बेवजह और बेवक्त शत्रुता पाल लिया करते हैं और पीछे पड़ जाते हैं।

जिनके स्वार्थ, ऎषणाएं और जायज-नाजायज काम हमसे न हो पाएं, वे हमसे शत्रुता करें तो वर्तमान की स्वार्थजन्य शत्रुता होती है। इसमें दोष द्विपक्षीय होता है लेकिन अधिकांशतया जो शत्रुता हमारे सामने आती है उसमें न तो हमारी लिप्तता होती है, न हमारा कोई दोष।

और इससे भी विचित्र बात यह है कि ऎसे-ऎसे लोग हमारे शत्रु हो जाते हैं जो न हमारे स्तर या श्रेणी के होते हैं और न हमारा उनसे कोई संबंध। न केवल हमें बल्कि हमसे जुड़े हुए और हमें जानने-पहचानने वाले सभी लोगों को यह लगता है कि यह अनायासी और अकारण शत्रुता आखिर क्यों होती है।

लोग बिना किसी लाभ या संबंधों के शत्रुता का सहारा क्यों ले लिया करते हैं। खासकर अच्छे और सज्जन लोगों के लिए तो जीवन भर में सबसे अधिक दुःख इन्हीं खरपतवारी शत्रुओं से होता है जिनका न कोई लेना-देना होता है और न उन्हें कोई लाभ होता है।

खूब सारे लोग तो लगता है कि पैदा ही इसलिए हुए हैं कि जिन्दगी भर किसी न किसी से शत्रुता करते रहें और शत्रुताई तमाशा देखकर अपने कुटिल और क्षुद्र अहंकारों को परिपुष्ट करते रहें।  शत्रुता के मामले में यह स्पष्ट है कि अधिकांश शत्रु और मित्र पूर्व जन्म की लेन-देन के संबंधों पर आधारित होते हैं।

भगवान का कोई सा अवतार हो या सामान्य से सामान्य जीवात्माएं। ये जब धरती पर आती हैं तो इनके साथ ही दूसरी सभी वे जीवात्माएँ भी पैदा होती हैं जिनका कोई न कोई लेन-देन बाकी होता है। ये सभी प्रकार की लेन-देन संबंधित जीवात्माएं पैदा होने के उपरान्त जीवन में किसी न किसी मोड पर चाहे-अनचाहे मिल ही जाती हैं।

ईश्वर और प्रकृति इनका संयोग कराते रहते हैं और लेन-देन पूर्ण हो जाने के उपरान्त सहर्ष या बेमन से वियोग भी करा देते हैं। यह प्रक्रिया हर जीवात्मा के साथ शाश्वत रूप से चलती रहती है।

जो लोग इस ईश्वरीय विधान को समझ जाते हैं वे मस्ती के साथ जीवन जीते हुए आनंद पाते रहते हैं और जो लोग इस गणित को समझ नहीं पाते या कि समझने की कोशिश नहीं करते,  वे लोग तो जिन्दगी भर कुढ़ना, रोना और कलपना किया ही करते हैं।

सज्जनों के साथ तो जिन्दगी भर यह समस्या लगी ही रहती है। इनकी सबसे बड़ी समस्या उन शत्रुओं से पाला पड़ते रहने की है जो लोग भंगेड़ी, गंजेड़ी, दारूड़िये, कामचोर, विघ्नसंतोषी, शिकायती स्वभाव वाले, ब्लेकमेलर, पापी, झगड़ालू, कामी, क्रोधी, लोभी-लालची, हराम का खान-पान और सुख चाहने वाले, मुफतिया आनंद पाने को तरसते, लूट-खसोट और भ्रष्टाचार से समृद्धि का अहसास करने वाले, शोषक, अन्यायी, औरों को तंग करके खुश होने वाले, दुष्टों से सांठ-गांठ करने, रिश्वत ले दे कर अपने काम बनाने और दूसरों के काम बिगाड़ने वाले, अशान्ति, असन्तोष और मंगताई फैलाने वाले तथा हर तरह से राक्षसों और राक्षसियों से भी गए-बीते होते हैं। वर्तमान समाज और देश के दुर्भाग्य से ऎसे लोग सभी जगह आसानी से मिल भी जाते हैं और ऎसे लोगों के संगठित गिरोह भी बन जाया करते हैं।

यही नहीं तो दुष्टों के लिए दुनिया में संरक्षकों और मार्गदर्शकों की भी कोई कमी नहीं है क्योंकि समान स्वभाव वाले लोग दुनिया में कहीं भी हों, मिल ही जाते हैं। यह प्रजाति आजकल गाजर घास, बेशर्मी और जहरीली खरपतवार की तरह पनपती-पसरती जा रही है और लगभग आधी दुनिया इनसे त्रस्त है।

जहाँ पापियों और व्यभिचारियों का संख्या बल होता है वहाँ के हालात तो और भी अधिक घातक हुआ करते हैं। इन विषम हालातों में जहां तक हो सके पूर्वजन्म के शत्रुओं को अपनी शत्रुता का व्यवहार करने दें, रोके नहीं ताकि एकतरफा शत्रुता अपने आप में समाप्त हो जाए और जन्म जन्मान्तर के वैर भाव से हम सदा-सदा के लिए मुक्ति पा लें।

इन शत्रुओं के प्रति मन में वैरभाव न रखें लेकिन जहाँ आवश्यक हो वहाँ राजधर्म का कठोरता से पालन करें और कराएं, लेकिन दुराग्रहों और पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर निष्प्रपंची भाव से।