भिखारी मुक्त हो भारत

यों तो अपने यहाँ भिखारियों की अनगिनत किस्में हैं जो यत्र-तत्र-सर्वत्र विद्यमान भी हैं और विचरणरत भी हैं लेकिन मूल रूप से दो तरह के भिखारी हैं।

एक वे हैं जिनका स्वभाव, मन-मस्तिष्क, व्यवहार और तमाम प्रकार के आचरण भिखारी परंपरा को धन्य कर रहे हैं लेकिन ये भिखारी न तो अपने आपको भिखारी मानते हैं न भिखारी कहने देते हैं, और न ही ऊपर से भिखारी जैसे दिखते हैं।

लेकिन होते हैं ये सारे सुपर भिखारी। इनके पास खूब सारा माल-असबाब, और जमा पूंजी का अपार भण्डार भले हो, पर भिखारीपन कभी नहीं जाता। जो भीख में मिल जाए, वह अपना। न मिल पाए तो भीख पाने के तमाम हुनरों का इन्हें पता होता है। आसानी से भीख न मिल पाए तो जोर-जबरदस्ती भी ले लेंगे। इसी हुनर को दूसरे शब्दों में भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी भी कहा जाता है।

इन भिखारियों के सम्पर्क में आने के बाद ही हमें पता चलता है कि ये भिखारियों से भी गए बीते भिखारी हैं। दूसरी किस्म में वे भिखारी होते हैं जो अपने आपको भिखारी दर्शा कर भीख माँगने और जमा करने के तमाम जायज-नाजायज हथकण्डों में माहिर होते हैं और इस कारण से इन सभी को लगता है कि भीख माँगना इनका अपना जन्मसिद्ध अधिकार है। इस किस्म में छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं है। बड़े से बड़ा आदमी भी भिखारी हो सकता है और छोटे से छोटा भी।

गरीब होना अभिशाप है और इस वजह से अभावग्रस्त लोग भीख मांगकर जैसे-तैसे गुजारा करें, यह बात समझ में आती है लेकिन बिना परिश्रम किए औरों के पैसों पर मौज उड़ाना, मानवीय संवेदनशीलता और इंसानियत का दुरुपयोग करते हुए लोगों से पैसे लेना भिक्षावृत्ति के साथ ही हरामखोरी भी है।

जब से लोगों को यह लग गया है कि बिना परिश्रम के भी धर्मान्ध मूर्खों और अंधविश्वासियों से बहुत कुछ पाया जा सकता है तभी से पूरी दुनिया में भिखारियों की बाढ़ सी आ गई है।

कोई गली-रास्ता, चौराहा, चौपाटियां, होटलें, रेस्तरां, सर्कल या सार्वजनिक स्थल ऎसा नहीं बचा है जहाँ भिखारियों का जमघट न हो। बड़े सवेरे से लेकर देर रात तक ये भिखारी मांगते ही नज़र आएंगे।

बेशर्म और बदतमीज इतने कि जो कोई दिखा,उससे पैसे मांगना शुरू कर देते हैं। देशी-विदेशी सैलानी हों या फिर स्थानीय लोग, इन भिखारियों के लिए कोई  मर्यादा नहीं है, खुद को दीन-हीन, बीमार, कई दिनों से भूखे-प्यासे, अधमरे, अशक्त और असहाय बताने के स्वाँग रचते हुए मंगतों की भारी भीड़ पीछा करती रहती है।

रास्ते भर अजीबोगरीब किस्मों के भिखारियों से हर किसी का सामना होता रहता है। धार्मिक स्थलों के बाहर तथा इनके रास्तों पर, पर्यटन स्थलों पर भिखारियों का जमघट इस कदर लगा रहता है जैसे कि ये स्थल भिखारियों के लिए भीख प्राप्ति के प्रतिष्ठान ही हों।

चाय-नाश्ता या खाने-पीने की होटल हो या दुकान, भिखारी खान-पान की मांग करते ऎसे नज़र आते हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता।

इन भिखारियों के कारण से अपने क्षेत्र की प्रतिष्ठा खाक हो रही है। जो लोग बाहर से आते हैं वे देशी-विदेशी सैलानी हमारे क्षेत्र को भिखारियों का अभयारण्य मानते हैं और इस वजह से भारतवर्ष की विदेशों में भारी बदनामी हो रही है।

ऎसा नहीं है कि ये सारे बेशर्म और बदतमीज मंगते दीन-हीन हों, जरूरतमन्द हों। इनमें से अधिकांश के पास अनाप-शनाप सम्पत्ति होती है जिसे वे ब्याज पर चलाते हैं, औरों को फाईनेंस करते हैं।

देखा यह गया है कि ये भिखारी समूहों और गिरोहों में रहकर आपराधिक गतिविधियों और असामाजिक हरकतों में भी लिप्त रहते हैं, चोरी-डकैती भी करते हैं और झगड़े-फसाद भी।

कई जगह देखा गया है कि ये भिखारी दिन में भीख मांगते हैं और रात को गाँव या शहर के बीच मैदानों, खुली जगहों या बाहर अपने डेरों में रोजाना रात को दारू-माँस की पार्टियां उड़ाते रहते हैं।

इनकी पार्टियों से निकला धूंआ हम सभी समझदार लोगों को चिढ़ाता प्रतीत होता है कि तुम मूर्ख लोग हमारे लिए दिन-रात मेहनत करो-कमाओ, और हम तुम्हारे पैसों पर इसी तरह ऎश करते रहेंगे।

तभी तो कहा गया है कि जब तक हम जैसे वज्रमूर्खों का वजूद कायम रहेगा तब तक कामचोरों और भिखारियों की मौज उड़ती रहेगी।

इन भिखारियों के कारण भारतीय समाज, अपने क्षेत्र, प्रदेश और देश की बदनामी हो रही है। क्यों न एक बार इन सभी भिखारियों को सख्ती से खदेड़ा जाए और सूचीबद्ध कर इनके बारे में गहन जाँच-पड़ताल की जाए और जो वाकई विपन्न लोग हैं उन्हें स्थायी रूप से पुनर्वास से जोड़ा जाए।

भिखारियों की इतनी बड़ी संख्या हमारे देश में हर तरफ बिना मेहनत के फालतू पड़ी है। इनसे जनहित में कोई न कोई काम लिया जाए और इसके बदले खाने-पीने का इंतजाम किया जाए ताकि इनकी हरामखोरी और कामचोरी की प्रवृत्ति पर अंकुश भी लगे और समाज, क्षेत्र एवं देश के लिए उपयोगी संरचनाओं, संसाधनों का निर्माण भी हो सके।

धरम और पुण्य कमाने के नाम पर इन भिखारियों को जो दान देता है वह नरक में जाता है क्योंकि इन निर्लज्ज भिखारियों को दान देकर हम शराबियों, माँसाहारियों, व्यभिचारियों, असामाजिक तत्वों और आपराधिक तत्वों को ही बढ़ावा दे रहे हैं और यह हमारे लिए आत्मघाती कदम तो है ही, हमारी भारतमाता के लिए भी कलंक है क्योंकि इन भिखारियों की वजह से देश बदनाम हो रहा है।

सरकारें भी आम इंसान के लिए ढेरों योजनाएं और कार्यक्रम चला रही हैं और किसी भी कल्याणकारी राज्य के लिए यह संदेश ठीक नहीं है कि इतनी सारी योजनाओं के बावजूद लोग भीख मांग कर जीने को विवश हैं।

स्वच्छ भारत मिशन की तरह देश भर में भिखारियों के खात्मे के लिए भी अभियान चलना चाहिए ताकि हम भिखारी मुक्त भारत का निर्माण कर सकें। इस कार्य में हमारी आत्मीय भागीदारी से ही बहुत बड़ा परिवर्तन आ सकेगा।

और कोई समझें या नहीं, हम आज ही यह संकल्प लें कि किसी भिखारी को भीख नहीं देंगे, भिखारियों और उन्हें प्रश्रय देने वालों को हतोत्साहित करेंगे, तो वह दिन दूर नहीं जब भिखारियों के कारण हम पर लगा बदनामी का अभिशाप दूर हो जाएगा।

भिखारियों को भीख देने से कहीं ज्यादा अच्छा है अपने समाज, आस-पड़ोस, क्षेत्र और समीपवर्ती इलाकों में रह रहे वास्तविक जरूरतमन्दों को सहयोग करें, उनके जीवन को आसान बनाने में मददगार सिद्ध हों। वे दुआएं भी देंगे और हमें असली पुण्य भी प्राप्त होगा।

हम कितने मूर्ख हैं कि हमारे आस-पास के लोगों की पीड़ाओं और अभावों को नज़रअन्दाज कर देते हैं और छद्म तथा बेशर्म, कामचोर और आपराधिक भिखारियों को भीख के नाम पर दान करने में आगे रहते हैं।

यह कैसा दान और कैसा धरम। खुद समझें, औरों को भी समझाएँ। जो भिखारियों को प्रश्रय देता है वह भी एक न एक दिन भिखारी या दिवालिया हो ही जाता है।