हम सभी बने हैं जगत के लिए

जो जनता के बीच रहता है, जगत में जन्मा है वह हर जीव जनता और जगत के लिए है। उसका परम ध्येय यही है कि वह अपनी ओर से किसी न किसी माध्यम से आत्मनिर्भर बने, अपने जीवनयापन को निरापद और आसान बनाए, साथ ही उन लोगों के लिए जीने की कोशिश करे जिनके बीच रहता है, जिनसे उसका परोक्ष या अपरोक्ष लोकाचारी व्यवहार बना हुआ है।

‘‘ जिओ और जीने दो ’‘की यह अवधारणा इंसानों से लेकर इंसानी बस्तियों और मुुल्कों सभी के लिए आदर्श ध्येय वाक्य माना जा सकता है। पर आज की परिस्थितियों में यह ठीक उलटा होकर रह गया है।

लोगों को न खुद जीना आता है न औरों को ठीक-ठाक ढंग से जीने देते हैं। इन लोगों के लिए अपने पूरे जीवन का बोध वाक्य हो गया है – खुद जीते रहो, औरों को जीने तक न दो।

खुद तो ये लोग अतृप्त, उद्विग्न, असन्तोषी और लपका वृत्ति से ग्रस्त होते ही हैं, दूसरों को भी चैन से नहीं जीने देने का काम भी ये लोग जिन्दगी भर करते ही रहते हैं।

नीचे से लेकर ऊपर तक सभी प्रकार की व्यवस्थाएं और तंत्र जनता के लिए हैं, जगत की सेवा के लिए हैं। जो लोग अपने दायित्वों को जीव और जगत की सेवा का फर्ज मानकर करते हैं, वे धन्य हैं, उनकी जितनी अधिक तारीफ की जाए कम है। लेकिन ऎसा सभी लोग करें, यह संभव नहीं है।

बहुत सारे लोग हैं जो जीव और जगत की उपेक्षा और अपनी ही अपनी सेवा को महत्व देते हैं और इसलिए इन संवेदनहीन लोगों के लिए पूरी दुनिया अपनी पाँच-सात फीट की देहयष्टि के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है।

इन लोगों को न जीवों से कोई सरोकार है, न जगत से। हर क्षण और हर मामले में अपना ही अपना देखते हैं और अपनी ही अपनी चलाते रहते हैं। बंधी-बंधायी कमायी वाले बाड़ों, परिसरों और गलियारों में बहुत सारे लोग देखने को मिल जाते हैं जो मानते हैं कि जो कुछ मिला हुआ है वह उनके लिए ही है, इसलिए जितना अधिक से अधिक अपने कब्जे में कर सको, करते चले जाओ, कल किसने देखा है।

हालांकि इस प्रजाति के अधिकांश लोग जिन्दगी भर भिखारी की तरह याचनाएं कर करके इतना अधिक जमा कर लिया करते हैं कि इनकी मौत भी स्वाभाविक ढंग से नहीं हो पाती। कई सारे गंभीर कारण और अशोभनीय हालातों के बीच इन्हें घुट-घुट कर मरना पड़ता है। इन लोगों के लिए यह कहना भी अब बेमानी हो गया है कि कुत्ते की मौत मरेंगे क्याेंकि कुत्ते भी आजकल इनसे अच्छी मौत का वरण करने लगे हैं।

जो जहाँ हैं उसका कुछ नहीं है, वह केवल ट्रस्टी है और उसे ट्रस्टी के रूप में अपनी और अपने संस्थान या परिवार की साख बनाए रखना और इसमें अभिवृद्धि करना ही उसका लक्ष्य होना चाहिए।

दुर्भाग्य से बहुत सारे लोग अपने आपको स्वामी मानकर अधीश्वर की भूमिका को अपना लेते हैं। और जो एक बार अधीश्वर होने के भ्रम में जीने का आदी हो जाता है वह जिन्दगी भर वैसा ही बना रहता है, उसमें सुधार की कोई गुंजाईश शेष नहीं रहती क्योंकि अहंकार वह क्षरण मार्ग है जो ईश्वर बड़े ही प्रेम से हमें प्रदान कर देता है और हमें पता भी नहीं चलता कि भगवान ने कोई ऎसा छेद कर ही दिया है जिससे गुब्बारे से हवा खिसकनी शुरू हो ही गई है।

हर अहंकारी इंसान को खत्म करने के लिए भगवान इसी तरह के ऎसे द्वार खोल देता है जिससे कि अहंकारियों को पता भी नहीं चल पाता और रेत से भरा बोरा एक दिन इतना अधिक रीत जाता है कि बोरा कहीं का नहीं रहता।

अभिमान से भरे लोगों की कई पीढ़ियां खत्म हो गई इसी तरह। युगों से यही सब चलता आ रहा है। बावजूद इसके आज भी आदमी अपने-अपने अहंकारों में जी रहा है जैसे कि वह अमर फल खाकर आया हो। आदमी अपने ही अपने लिए जीने की कोशिश करता रहता है और वह भी मर-मर कर।

अपने स्वार्थ और ऎषणाओं की पूर्ति के लिए इंसान जिन्दगी भर ऎसे-ऎसे समझौते करता है, ऎसे-ऎसे लोगों से समीकरण और गठजोड़ करता है जो खुद नाकाबिल हैं या अच्छे इंसानों की श्रेणी में नहीं आते। खुदगर्ज लोगों की वंश-वेल आजकल लम्बी, बहुत अधिक लम्बी होती जा रही है और सारे के सारे न समाज के काम आ रहे हैं न देश के।

रोज अपने स्वाभिमान की निर्मम हत्या करते हैं, इंसान होने के गर्व और गौरव पर कुल्हाड़ी चलाते हैं और रोजाना कई-कई बार मर-मर कर जीते हुए अपने आपको जिन्दा रखने की कोशिश में सारी जिन्दादिली भुला डालते हैं।

जो समुदाय का नहीं, जनता और क्षेत्र का नहीं, जिससे देश का कोई भला नहीं हो पाता, उन मुर्दाल लोगों की संख्या दिन ब दिन बढ़ती जा रही है और यही आज के समाज और देश की सबसे बड़ी समस्या है। सभी अपने आपको अधीश्वर और स्वामी समझने-समझाने के फेर में भटकने लगे हैं और इस आपाधापी में कोई किसी का नहीं रहा। किसी को अपना नहीं कहा जा सकता।

चंद लोगों को राजी रखकर, इनकी जयगान और परिक्रमा कर जीने वाले लोगों से किसी को कोई अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए क्योंकि ये लोग अपने आपको गिरवी रख चुके हैं, सहर्ष गुलामी और आत्महीनता को अंगीकार कर चुके हैं। इन मरे हुए लोगों की सडान्ध से दूर रहकर जो कुछ कर सकते हैं वही असली पुरुषार्थ है। परमार्थ और परोपकार भाव से की गई सेवा ही सच्चा इंसान होने का संकेत है।