गधों से भी गए-बीते हैं हम …

वर्तमान युग में खच्चर अपने आपको घोड़े मान रहे हैं और घोड़े खुद को हाथियों से कम नहीं समझ रहे। ऊपर से मरियल टट्टूओं और बीमारू हाथियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। चील-चमगादड़ों को लगता है कि आसमान उनके बाप का है और रहेगा। गलियों के कुत्ते अपनी हर गली को साम्राज्य मानकर विस्तार करने को आतुर हैं। निकम्मों और आलसियों की जबर्दस्त विस्फोट पाती संख्या चिल्लपों मचा रही है।

ये न कुछ करना चाहते हैं, न किसी को कुछ करने देना चाहते हैं। ये चाहते हैं कि स्वयं कुछ न करें, पड़े-पड़े, बैठे-बैठे हराम का खाते-पीते रहें और दूसरे लोग उनके नाम से व उनके लिए जी जान लगाकर काम करते रहें और श्रेय भी न मिले दूसरों को। जो कुछ श्रेय, लाभ या प्राप्ति है, वह इन्हीं थके-हारे मरियलों और मुर्दालों को ही मिलते रहें।

हर क्षेत्र में तलाश है गधों की। सब चाहते हैं कि वे जहाँ कहीं रहें वहाँ गधा छाप लोग मिलते रहें ताकि उनके सारे के सारे बोझ ये गधे ढोते रहें। गधे समझते हैं चलो कुछ दिन कर लेते हैं, समय है, निकल जाएगा। मगर ऎसा होता नहीं।

गधे पूरी जिन्दगी इसी सोच में निकाल देते हैं। उधर गधों पर हुकूमत करने वालों की कहाँ कोई कमी है। एक जाता है, दूसरा आ धमकता है। हर किसी को पता रहता है कि कौन से गधे किस काम में माहिर हैं। इन शोषक लीडरों की संख्या बढ़ती ही जा रही है।

कोई गधों को धमका कर, डण्डा दिखा कर काम लेता रहता है, कोई गधों को लोभ-लालच देकर या पुचकार कर, प्रेम और श्रद्धा का दिखावा कर या गधों की थोड़ी सी तारीफ करके।

एक बार किसी पर गधा ब्राण्ड होने का ठप्पा लग जाए तो फिर ताजिन्दगी चलता रहता है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि कोई आए, कोई जाए। आवश्यकता से अधिक भारवाहक गधों की गन्ध सब तरफ इतनी फैली होती है कि कोई सा डण्डे वाला आ जाए, उनका पूरा-पूरा उपयोग करने में कभी पीछे नहीं रहता।

फिर डण्डे वाले भी कहाँ कम शातिर हैं, एक से दूसरे के कान में मंत्र फूंकते चले जाते हैं कि कौनसा गधा किस काम में माहिर है, कैसे नकेल कसी जाए या कैसे पुचकारा जाकर उपयोग किया जाए।

गधे बेचारे भोली किस्म के होते हैं, इन्हें बहला-फुसला कर या थोड़ा सा गुर्रा कर कोई भी कुछ भी काम ले सकता है, कभी भी उपयोग कर सकता है। गधों के लिए क्या समय की पाबंदी, क्या दिन और क्या रात।

सब तरफ अब एक ही मिथक हवाओं में घुलने लगा है – जब तक गधे जिन्दा हैं किसी को परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है। चाहे सुस्त हाथी हो, मरियल घोड़ा हो, वर्णसंकर खच्चर हो या फिर कोई सा उल्लू, श्वान या सूअर। केवल और केवल गधों की मेहनत और समर्पण की खातिर सारे के सारे मदमस्त होेकर माल-मलाई और मिश्री-मेवा उड़ा रहे हैं।

बेचारे गधे केवल इसी नारे से खुश हैं कि आखिर कभी तो गधों को गुलाबजामुन खाने को मिलेंगे। सदियां गुजर गई, तभी से लेकर आज तक गधों की पूरी की पूरी प्रजाति इसी मुगालते में जी रही है। न गुलाबजामुन के दर्शन नसीब हो पाए हैं, न चाशनी की बूँद तक।

उतना ही बोझ अपने ऊपर लें जितना सहन कर चल सकते हैं अन्यथा दिमाग में तनावों का बोझ रहेगा और पीठ पर पीड़ादायी भार का।

गधों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे सावन में दुबले हो जाते हैं और जेठ में मोटे। सावन में सब तरफ हरियाली का मंजर देखकर इस चिन्ता में दुबले हो जाते हैं कि आखिर इतनी घास वे कैसे खा पाएंगे। और आषाढ़-जेठ में इस आत्म मुग्धता में जीते हैं कि सारी घास उदरस्थ कर लेने की अपार क्षमता के स्वामी हो गए हैं।

हालात सब जगह यही हो गए हैं कि सब कुछ गधों के भरोसे चल रहा है। ये गधे न हों तो दुनिया की रफ्तार ही थम जाए। गधों के साथ सबसे बड़ा रोना यह भी है कि वे आखिर किसके आगे रोएं, कोई ऎसा नहीं है जिसके आगे रोया जाए। हर तरफ संवेदनहीन, मोटी चमड़ी वाले पट्ठों की भरमार है।

हम सभी को चाहिए कि जीवन में यथार्थ को अपनाएं। गधे ही बने रहेंंगे या इंसान भी बनने की कोशिश करेंगे। समय जा रहा है, कुछ सोचें और चिन्तन करें। कभी तसल्ली से सोचें कि हमने इंसान बनकर क्या तोड़ लिया, कब तक गधों की तरह शोषित होकर अधमरे पड़े रहेंगे। ऊपर भी जाएंगे तो भगवान को कैसे मुँह दिखा पाएंगे, जिसने बड़ी कृपा करके इंसान बनाकर भेजा है।

दुनिया के सारे गधों एक हो जाओ, अपने हकों के लिए संघर्ष करो और आगे बढ़ो। एक बार झण्डा हाथ में थाम कर आगे बढ़ो। फिर दुनिया भी हमारे बारे में सोचने को मजबूर होगी और आसमान में गुंजने लगेंगे नारे – गधों तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं।

1 thought on “गधों से भी गए-बीते हैं हम …

  1. अपने आप पर गर्व करें, हम भी माने जाते हैं गधे…

    हमें गर्व है कि संसार भर में इंसानी प्रजाति में शुमार गधामजूरों और गधों में हमारी भी गिनती भी होती है। होनी भी चाहिए। हमारी भी स्थिति गधों से कोई कम नहीं है। हर कोई चाहता है हमारे जैसे निष्ठावान, कर्मयोगी, सहिष्णु और सहनशील गधे मिलें, ताकि जैसा चाहें वैसा मनमाना उपयोग कर सकें और अपने नम्बर बढ़ाते चले जाएं।
    खूब सारे रंग-बदरंग गद्दीनशीन और पालकी सवार आए-गए, जात-जात की बत्तियों के नीचे इतराए बैठे किसम-किसम के खास और किसी न किसी के खासमख़ास आए और अपनी चवन्नियां चला कर चलते बने।
    हम गधे वहीं के वहीं ठहरे हुए वे ही काम कर रहे हैं जो बरसों पहले भी किया करते थे। हर आने और रहने वाला पूछ करता है मगर जाने के बाद ऎसे भुला देता है जैसे गधे के सिर पर सिंग।
    पता नहीं हम गधों का भाग्य कब पलटा खाएगा। सदियों से हमारे पुरखों पर गर्व है, हमारे मालिकों पर नाज है। कल गोरी चमड़ी वाले थे, आज काले दिल और काली चमड़ी वाले। लगता है कि एक स्वाधीनता संग्राम हम सारे गधों को ही मिलकर करना होगा।
    आईये कुछ करें हम सभी गधों के लिए।

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