बड़े बेशर्म हैं हम झूठ बोलने में

हम सभी लोग सच बोलने में विश्वास करते हैं किन्तु पूरी बेशर्मी से झूठ बोलते हैं। और झूठ भी इतना कि इसका न हमें कभी कोई पछतावा होता है और न आत्मग्लानि का अनुभव। हो भी कैसे, जब हमने झूठ बोलने को ही युगीन संस्कार के रूप में स्वीकार कर लिया है।

और फिर झूठ बोलने के मामले में हम अकेले ही बेशर्म थोड़े ही हैं, हर कोई किसी न किसी परिमाण में झूठ बोलकर ही जो अपने दिन काट रहा है। कोई कम तो कोई अधिक, झूठ सब बोल रहे हैं और सभी को बोलना ही पड़ रहा है।

बिना झूठ बोले हमारी जिन्दगी का कोई अर्थ नहीं। एकाध फीसदी पुराने जमाने के लोग बचे होंगे जो कि सत्यवादी हरिशचन्द्र की परंपरा को जैसे-तैसे बचाए हुए रख रहे होंगे, अन्यथा हम सार के सारे झूठे हो गए हैं। हममें से एक भी माई का लाल ऎसा

हमारी जिन्दगी का शायद ही कोई सा दिन ऎसा बीता होगा कि हमारे मुँह से झूठ न निकला होगा, अन्यथा हम तो रातों में अपने सपनों में भी झूठ का इस्तेमार कर चुकने से नहीं डरते।

झूठ के मामले में हर तरफ नवाचारों और लच्छेदारी का युग है। कोई सीधा-सपाट झूठ बोल देता है, कोई सफेद झूठ, और कई सारे लोग ऎसे हैं जो इस चालाकी के साथ झूठ बोलते हैं कि जिसकी असलियत का पता बहुत समय बाद जाकर चल पाता है।

कुल मिलाकर सब तरफ झूठ ही झूठ का माहौल पसरता जा रहा है।  झूठ के मामले में वे लोग सबसे आगे होते हैं जो झूठन खाने और खुरचन चाटने के आदी होते हैं। ये लोग एक झूठ को छिपाने के लिए सौ झूठों का सहारा लेते हैं और इस तरह इन लोगों की पूरी जिन्दगी के खाते में झूठ की संख्या हजारों-लाखों और अरबों से लेकर अनगिनत तक पहुंच जाती है।

जब से हमने झूठ का दामन थाम लिया है तभी से सच्चाई हमसे दूर भाग गई है और हमारी वाणी सच साबित नहीं हो पा रही है। हम सभी झूठों का नाता भी उनसे ही है जो खुद झूठे हैं या झूठों के बादशाह कहे जाते हैं।

झूठ, झूठों और झूठन का सनातन रिश्ता हर जगह पूरे यौवन पर दिखता है। कोई घर-परिवार, दुकान, संस्थान, संस्था, बाड़ा या परिसर, प्रतिष्ठान ऎसा नहीं बचा है जहाँ की हवाओं में झूठ पसरा हुआ न हो।

हम अपने काम निकालने या निकलवाने, दूसरों को गुमराह कर प्रभावित करने, अपनी श्रेष्ठता और वैभव सम्पन्नता को साबित करने तथा वर्चस्व दर्शाने के लिए झूठ का सहारा लेते हैं।

अधिकांश बार हम दूसरों को खुश करने और जिन्दगी भर खुश बनाए रखने के फेर में झूठ पर झूठ बोलते जाते हैं और उन लोगोें को भरमाए रहते हैं जिनसे हमारे कोई उल्लू या गधे सीधे हो सकते हैं।

झूठ बोलने में हमने दुनिया भर में अव्वल स्थान हासिल कर रखा है। श्वानों को हिरण, गधों को हाथी, उल्लुओं को मशालची, सूअरों को घोड़े, बिल्ले-बिल्लिओं को भालू का दर्जा देने और इसी तरह हर किसी न किसी दुष्ट और अपात्र की महिमा मण्डन करने में हम हर मामले में पूरी उदारता के साथ झूठ का इस्तेमाल करते रहते हैं।

सर्वाधिक झूठ का प्रयोग हम रिटायरमेंटोत्सव और शोकसभाओं में करते हैं।  दीर्घकालीन सेवाओं के बाद जब रिटायर होने वाले के सम्मान में विदाई समारोह होता है उसे यदि झूठ गायन का महा महोत्सव कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं।

इस अवसर पर कोई सच नहीं बोलता। सभी लोग तारीफों के झूठे पुल बाँधते हैं। निकम्मे, कामचोर, भ्रष्ट, रिश्वतखोर, अपने सहकर्मियों तक से काम निकालने के लिए बेशर्म भिखारी बनकर पैसे निकलवा लेने वाले,  कानाफूसी कर लड़ाई-झगड़े करने-कराने और दफ्तरी माहौल बिगाड़ने, हराम की तनख्वाह, टीए-डीए, मेडिकल भत्ते उठाने वाले, रोजाना किसी न किसी मुर्गे को फंसा कर खान-पान और दारू से लेकर कंचन-कामिनी तक का इंतजाम करने वाले, पान-गुटखों की पीक से दीवारों और परिसरों को गंदा कर देने वाला, रिश्वत नहीं देने वाले मातहतों को तंग करते हुए चार्जशीट और इंक्रीमेंट रोक देने, पूरी नौकरी में कभी समय की पाबंदी नहीं अपनाने, अनुशासनहीन, बेईमान, आदतन शराबी, भंगेडी-गंजेड़ी, दुव्र्यसनी, आकाओं की चापलुसी करने और उनके घरेलू नौकरों या सुरक्षाकर्मियों की तरह काम करने, उनके लिए पैसे, सुविधाएँ और संसाधन जुटाने में मददगार बने रहने, प्रभावशाली लोगों के नाम पर बंदर-भालुओं की तरह उछलकूद और धींगामस्ती करने वाले लोगों को उनके असली चरित्र और औकात के बारे में कोई कुछ नहीं बोलता, सच कहने की हिम्मत किसी में नहीं होती।

ऎसे में सारे के सारे फूलमालाओं से लादकर ऎसे सम्मान दर्शाते हैं कि जैसे उनके मुकाबले दूसरा कोई महान व्यक्ति संसार मेंं अब पैदा ही नहीं होने वाला। हास्यास्पद स्थिति तो तब हो जाती है कि जब ऎसे हरामखोर, भ्रष्ट और निकम्मे लोगों की सेवाओं की मिथ्या सराहना करते हुए इनके जीवन को अनुकरणीय मानने की सीख के भाषण दिए जाते हैं।

वक्ताओं में एक भी ऎसा नहीं होता, जो कि सच बोलने का माद्दा रखते हुए खरी-खरी बात कह डाले। सारे ही झूठ  पर झूठ बोले जाते हैं और झूठ भी ऎसा कि सभी जानते हैं कि पूरा और पक्का वाला सफेद झूठ है, मन ही मन हँसते भी रहते हैं लेकिन कोई यह नहीं कह पाता कि जो कुछ बोला जा रहा है वह झूठ का पुलिन्दा है। कई बार तो रिटायर होने वाला इंसान भी अपनी झूठी तारीफों को सुनकर शर्म के मारे सर झुका लेता है।

जिसके बारे में बोला जाता है वह इन शब्दों या तारीफ के लायक नहीं है बल्कि उसे उसकी असली औकात से परिचित कराया जाना चाहिए। वह भी इसलिए कि अब वह सीमित दायरों को छोड़कर संसार की सेवा के लिए प्रस्थान कर रहा है।

हम सभी लोग पूरी ईमानदारी से चिन्तन करें तो हमें साफ-साफ पता चलेगा कि रिटायरमेंट के विदाई समारोह का झूठ और अधर्म हमें नरक में भी जगह नहीं देने वाला।

यही स्थिति शोक सभाओं की है। कितना ही बड़ा बेईमान, दुष्ट, अमानवीय, अत्याचारी, शराबी, भ्रष्ट, जमीन-जायदाद हड़पने वाला और व्यभिचारी मर जाए, वहाँ जमा सारे उसकी प्रशस्ति में ऎसा महिमामण्डित गायन करते रहेंगे, जैसे कि उसके मर जाने से दुनिया भर से सिद्धान्त, आदर्श, ईमानदारी, सेवा, परोपकार और लोक कल्याण के सारे मूल्यों की भी हमेशा-हमेशा के लिए मौत हो गई है।

पता नहीं हम इतने कायर, खुदगर्ज, झूठे और मक्कार क्यों होते जा रहे हैं। सच को सच तथा झूठ को झूठ कहने की हमारी हिम्मत नहीं रही। हमारी जिन्दगी झूठ, झूठन और झूठों के बीच रहकर इतनी अधिक उच्छिष्ट हो चुकी है कि एक समय ऎसा आएगा जब खूंखार हिंसक जानवर भी हमारी गंध पाकर हमसे दूर भागते नज़र आएंगे।  खुद ही आत्मचिन्तन करें कि हम कितने झूठे हैं।

2 thoughts on “बड़े बेशर्म हैं हम झूठ बोलने में

  1. सत्य का आश्रय ग्रहण कर लिए जाने पर झूठे लोग अपने आप दूर होते चले जाएंगे और उनकी बजाय वे लोग हमारे सम्पर्क में आने लगेंगे जो हमारे लिए हितकर हैं। जो इंसान झूठा है, झूठ बोलता है, वह किसी का नहीं हो सकता। वह कुछ भी कर सकता है। इसलिए किसी को कष्ट हो या प्रसन्नता, कोई हमसे खुश रहे या नाराज हो जाए, उसकी परवाह किए बगैर सत्य का मार्ग अपना लिया जाए तो कहीं कोई परेशानी संभव नहीं है। संसार के पदार्थ और झूठे व्यक्ति जितने हमसे दूर होते जाते हैं उतना ही हम ईश्वर के अधिक करीब पहुंचते जाते हैं और उस अवस्था में भगवान हमारे कल्याण के लिए ऎसे दो-चार लोगों को पर््रेरित कर भेज देता है जो हमारे हजारों झूठे मित्रों के मुकाबले श्रेष्ठतम होते हैं।

  2. सत्य की अपनी जबर्दस्त ताकत होती है। हमेशा सच बोलें। जहाँ सत्य है वहाँ नारायण होते हैं और अपने भीतर सत्यनारायण की शक्ति होने का अनुभव होता है। सत्याश्रयी हो जाने पर अपनी वाणी सिद्धि को सम्बल प्राप्त होता है।

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