भटक गए हैं हम सब

वर्तमान पीढ़ी के शारीरिक सौष्ठव को देख कर कहीं नहीं लगता कि हम स्वस्थ और मस्त हैं। अति दुर्बल या अति स्थूल होती जा रही इस पीढ़ी के भरोसे नौकरी-धंधों को तो पाया जा सकता है, धन-सम्पदा और जमीन-जायदाद के साथ दुनिया भर का वैभव और भोग-विलास पाया जा सकता है लेकिन इंसान के रूप में न तो सफलता पायी जा सकती है, और न ही परिपूर्णता का अहसास। सब कुछ होने के बावजूद हमारी संतति आज जिस दौर से गुजर रही है उसमें दुनिया की कोई सी जंग जीतने की कल्पना दिवास्वप्न ही है। यहाँ तक कि आजकल के बच्चे अपनी रक्षा तक कर पाने की ताकत खो चुके हैं। जब से हमने अपने बच्चों को पैसे कमाने, भोग-विलासिता पाने और रुतबा बढ़ाने की मशीनों में तब्दील कर दिया है तभी से हमारी आने वाली पीढ़ियों का रोबोटीकरण हो चला है। आज हर माँ-बाप की यही इच्छा होती है कि उनका बेटा या बेटी इतना पढ़ लिख जाए कि खूब पैसा कमाये, दुनिया भर में उपलब्ध भोग-विलासी संसाधनों का उपयोग कराए और करे, आलीशान फ्लैट्स हों, तथा समाज में इस बात का दबदबा बना रहे कि बहुत पैसे वाले हैं। इसके सिवा और कोई लक्ष्य अपने बच्चों को लेकर किसी के पास रह ही नहीं गया है। जो कुछ हो रहा है वह अपने लिए नहीं हो रहा है। बच्चे भी अपने बचपन का आनंद नहीं ले पा रहे हैं, हमने उन्हें शैशव से ही झोंक दिया है पढ़ाई में। कुली की तरह बच्चे रोजाना अपने वजन से ज्यादा बस्ते का भार उठा-उठाकर आने-जाने को विवश हैं। ज्यादा पैसों और बड़े पदों वाली नौकरी और काम-धंधों के लायक होने के लिए बच्चों के भाग्य में माँ-बाप के जीवित रहते हुए भी पढ़ने के लिए बाहर जाने की मजबूरी है ओर ऎसे में अनकहे ही माँ-बाप का साया बरसों तक उठा हुआ रहता है। फिर काम-धंधे पा जाने के बाद भी दूरियाँ।  और ये दूरिया केवल सांसारिक प्रपंचों में अपने आपको महान और सिद्ध दिखाने भर के लिए। हमारी भौतिक उन्नयन की मानसिकता और बच्चों को जल्द से जल्द बड़ा बना देने की फैशन का भूत, बच्चोें के साथ माता-पिता का प्यार-दुलार, स्नेह-वात्सल्य भरा सान्निध्य, घर-परिवार का माहौल और सब कुछ तो छीन चुका है। सिर्फ कहलाने और जमाने को दिखलाने भर के लिए हम संतानवान रह गए हैं बाकी हमारे पास संतति को सँवारने और स्नेह लुटाने के लिए क्या कुछ बचा रह गया है ? मस्तिष्क का अधिकाधिक प्रयोग, बच्चों को अच्छे नंबर लाने के लिए झोंक देने और कुछ बड़े बन जाने के लिए लगातार बना रहने वाला दबाव मानसिक प्रताड़ना से ज्यादा कुछ नहीं है। तभी तो कई बार बच्चे इस जिन्दगी से तंग आकर आत्महत्या का मार्ग अपना लेते हैं। हमारे अपने बच्चों का शैशव, बचपन और जवानी छीनकर उन्हें पैसे कमाने के रोबोट बनाकर हमें और समाज को क्या हासिल हो पा रहा है। हमारे बच्चों से तो वे ठेठ देहाती गाँवाई एवं अनपढ़ बच्चे अच्छे हैं जो कम से कम जीवन का पूरा आनंद तो ले रहे हैं। प्रकृति के बीच रमते हुए मौज-मस्ती में जी रहे हैं। हमारे बच्चे जो कुछ कर रहे हैं उनसे उनका आनंद दूर होता जा रहा है। कई बच्चे पढ़ाई और घर के दबावों में इतने दुर्बल होते जा रहे हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता। कई रईसजादों और समृद्धों के बच्चे विलासी होने के कारण अति स्थूलता प्राप्त करते जा रहे हैं। परिश्रम से दूर भाग रहे बच्चों की सेहत आजकल तरस खाने लायक हो गई है। हमने उन्हें मोबाइल, बाईक और वे सारी चीजें दे डाली हैं जिनमें शरीर के किसी अंग को परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। इससे कुछ समय बाद ये अंग नाकारा हो जाते हैं और पूरा शरीर बीमारियाेंं का घर बनता जा रहा है। अधिकांश बच्चों की आँखों के नंबर साल दर साल बढ़ने लगते हैं, कई सारी बीमारियां घर कर लेती हैं, थकान की समस्या बनी रहती है, ऊपर से स्कूल के बाद भी चार-पाँच ट्यूशनों का नज़रबंद जीवन। इंसान जो कुछ करता है वह आत्म आनंद पाने के लिए करता है। इसी फेर में खूब सारे लोग महत्त्वाकांक्षी, उच्चाकांक्षी और फैशनपरस्त या सनकी हो उठे हैं। जो लोग बड़ी-बड़ी नौकरियों में हैं, अरबपति हैं, बड़े-बड़े पदों पर फब रहे हैं, उद्योग-धंधों के मालिक हैं, धन्ना सेठ हैं, उन सभी की हालत यह है कि वे आम इंसान की तरह जी नहीं पा रहे हैं। कुछ संयमी तथा जमीन से जुड़े हुए बिरले लोगों को छोड़ दिया जाए तो ये लोग दाल-रोटी की बजाय दवाइयों का भोजन ही ले रहे हैं, दिन-रात तनावों में जी रहे हैं और उनका शरीर ढेरों बीमारियों का घर बन कर रह गया है। ऎसे में इनके जीवन में आनंद कहाँ? जिस आनंद की कल्पना इनके माँ-बाप ने की थी, जिस मौज-मस्ती को पाने के स्वप्न इन्होंने देखे थे….. सब हवा हो जाता है। हम जो कुछ कर रहे हैं वह दूसरों को दिखाने के लिए। औरों के चक्कर में हम अपनी जिन्दगी का आनंद भुला चुके हैं। अपने नौनिहालों को भी इस भेड़चाल में शामिल करने लगे हैं। सब तरफ इंसानों की बजाय लोभ-लालच और स्वार्थ पूरे करने की अंधी दौड़ में एक के बाद एक रेवड़ें चली जा रही हैं आगे से आगे। किसी को पता नहीं है कि आखिर इस मायावी मुद्रा सागर का ओर-छोर कहाँ दिख पाएगा। हम इस सत्य से नावाकिफ हैं कि जिन लोगों को दिखाने के लिए हम अपने आनंद की बलि चढ़ा रहे हैं, वे तमाशबीन लोग हर युग में रहे हैं, और रहेंगे। ये न किसी के हुए हैं, न होंगे। जीवन की असली मस्ती चाहें तो बच्चों का इस्तेमाल रोबोट की तरह न करें, वरना औरों की निगाह में तो वैभवशाली दिख सकते हैं लेकिन बच्चों की जिन्दगी अभिशप्त ही हो जाती है। अपने बच्चे इस प्रकार सेहत गँवाते रहेंगे तो फिर इनकी आने वाली पीढ़ियाँ कैसा शरीर और आनंद पाएंगी, इसकी कल्पना आसानी से की जा सकती है। फिर जो संकेत सामने आ रहे हैं उससे तो यही लगता है कि आने वाला समय और भी अधिक संघर्षों से भरा होगा, जहाँ हम सभी को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए झोंकने को विवश होना पड़ेगा। उस स्थिति में हमारा यह सारा वैभव किस काम आएगा, यदि हम खुद को ही नहीं बचा पाएंगे, अपने लोगों और कुनबे को ही अपनी आँखों के सामने स्वाहा होते देखते रहेंगे। बहुत बड़ी संख्या में ऎसे लोग पनपते जा रहे हैं जिन्हें औरों की कमाई पर मौज उड़ाने की आदत पड़ गई है और ऎसे लोगों को मेहनत की बजाय छीना-झपटी व स्वेच्छाचारों से परिपूर्ण धींगामस्ती में भी जीने का आनंद आता है। अब भी वक्त शेष है, रोबोट कल्चर से बाहर निकल कर वास्तविक जीवन और यथार्थ को जानें और कुछ करें, हमारे अपने लिए, अपनी संतति के लिए, और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए।

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