हम असुर हैं या असामाजिक

हम असुर हैं या असामाजिक

अपने आपको हम कितना ही समझदार, सामाजिक, प्रतिष्ठित और महान मानते-मनवाते रहें, दुनिया के दूसरे सारे प्राणियों में हम खुद को सर्वश्रेष्ठ और बुद्धिशाली मानते रहें। मानना या मनवाना हमारा पूर्वाग्रह-दूराग्रहजन्य अधिकार है और इस मामले में हम सारे लोग सिद्ध हैं।

लेकिन हम इंसानों की दिनचर्या, स्वभाव, व्यवहार और जीवन जीने का जो तरीका है उसे देख कहीं से यह नहीं लगता कि हम सामाजिक हैं या हो भी सकते हैं। हममें से अधिकांश लोग सामाजिक होने के मानदण्डों पर कभी खरे नहीं उतर पाते हैं और हम जैसे खूब सारे लोग हैं जिनके बारे में आम धारणा यही है कि ये असामाजिक हैं या होते जा रहे हैं।

यह बात सत्य भी है और स्वीकारने योग्य भी। जिस तरह के समाज और परिवेश के हालात हैं, एक-दूसरे को पछाड़ कर अपना कब्जा जमाने और कुछ न कुछ हासिल करते रहने की जो कुत्सित मनोवृत्ति हम पाले हुए हैं, उसे देख कर तो यही लगता है कि हम लोग जानवरों से भी गए-बीते हैं।

पशु-पक्षियों का भी जीवन मर्यादित है, समय पर उठना, खाना-पीना, सोना और व्यवहार करना सब कुछ अनुशासन और परंपराओं से बंधा हुआ है और सदियों से निर्बाध ढंग से वैसा ही चला आ रहा है। सूरज उगने के साथ इनका दिन शुरू होता है और अस्त होते ही दिन अस्त।

पहले कहा जाता था कि दिन अस्त, मजूर मस्त। लेकिन अब दिन अस्त होने के बाद भी हमारी जीवनचर्या थम नहीं पाती। खूब सारे हैं जिनका तो दिन में अंधेरे के साथ शुरू होता है।

खुद चाहे कितना ही यह सोच लें कि समय पर सोने के लिए चले जाएं, लेकिन हर तरफ निशाचरों और निशाचरियों का जबर्दस्त साम्राज्य इतना अधिक पसरा हुआ है कि कोई न कोई बला आ ही टपकती है, और समय पर शयन नहीं हो पाता।

न रात को जल्दी सो पा रहे हैं, न सवेरे जल्दी उठ पा रहे हैं। ऎसे में पंच तत्वों के पुनर्भरण का संकट पैदा हो गया है। जिन आँखों को सौर ऊर्जा चाहिए वे आँखे देर रात तक जगी रहती हैं और दिन उगने के काफी बाद तक बंद रहती हैं।

ऎसे में सूर्य की ऊर्जा से हम घण्टों वंचित रहते हैं और इस कारण नेत्रों की ज्योति सौर ऊर्जा से अपनी क्षतिपूर्ति नहीं कर पा रही है और आँखों के रोग बढ़ रहे हैं, बच्चों और युवाओं तक के लिए चश्मे के बगैर जीना दुश्वार हो गया है।

जो सूरज ओज-तेज और बुद्धि का देवता है उसके रहते हुए हम बुद्धि और ज्ञान का उपयोग करने की बजाय देर रात तक काम करते रहते हैं, पढ़ते रहते हैं और इस कारण से बुद्धिबल को भी सम्बल प्राप्त नहीं हो पा रहा है क्योंकि बुद्धि और तेज का देवता सूर्य ही है और जब हम सूर्य की अनुपस्थिति में कर्म करते हैं तब हमारे चेहरे का ओज और तेज भी समाप्त हो जाता है और बुद्धि भी बढ़ नहीं पाती।

यही कारण है कि हम बुद्धिहीन, दुर्बुद्धि और भौंदू होते जा रहे हैं। जिस समय बुद्धि की जरूरत होती है, उस समय सब कुछ भूल-भाल जाते हैं, प्रत्युत्पन्नमति प्रतिभा जवाब देती जा रही है और वाणी का ओज भी पलायन कर जाता है।

सत्, त्रेता और द्वापर से लेकर कलिकाल तक के तमाम असुरों और राक्षसियों से अपनी निरपेक्ष भाव से तुलना करें तो हम सभी को आश्चर्य होगा कि आज हम लोग इन राक्षसों और राक्षसियों से भी कई गुना आगे निकल चुके हैं। उनमें और हमारे भीतर ढेरों समानताएं देखी जा सकती हैं।

हमारी वाणी, कर्म, स्वभाव और व्यवहार सब कुछ इनसे मेल खाता है। केवल सिंग और पूँछ का अभाव देखा जा रहा है लेकिन अब सिंग और पूँछ की भावनाएँ बाहर न होकर भीतर घर कर गई हैं इसलिए ऊपर से हम चाहे कितने अधिक भोले-भाले, सज्जन और चरित्रवान क्यों न दिखते रहें, हम खुद ही जानते हैं कि हम कितने खराब और खूंखार हैं।

हमारा सब कुछ दोहरे-तिहरे चरित्र की भेंट चढ़ चुका है। अपनी सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों से भटक जाने के बाद हम कहीं के नहीं रहे। न हमारा कौटुम्बिक प्रेम भाव रहा है, न किसी से आत्मीयता। हम खुदगर्ज और स्वार्थी इतने अधिक हो गए हैं कि वे ही काम करते हैं जहाँ हमारा स्वार्थ सिद्ध होता है।

उन्हीं आयोजनों में भाग लेते हैं जहाँ हमारा सम्मान-अभिनंदन और पुरस्कार नियत हो, लजीज पकवानों से भरा आमिष या निरामिष खान-पान और एयरकण्डीशण्ड आवास व तमाम प्रकार की भोग-विलायी आवभगत मुफतिया उपलब्ध हो, और हमें वीआईपी या वीवीआईपी मेहमान का दर्जा प्राप्त होता रहे। यही वजह है कि आजकल मन्दिर खाली-खाली रहने लगे हैं और वहाँ भगवान को गुमराह करने के लिए ढोल-नगाड़े आदि सब कुछ के लिए यंत्रों की व्यवस्था है।

अकेला पुजारी ही आरती कर रहा हो तब भगवान को भ्रमित किया जाता है कि खूब सारे भक्त जमा हैं। और कुछ नहीं तो माईक या स्पीकर से मंत्रों, स्तुतियों और भजनों का दौर ही चलता रहेगा।

हमारे सामाजिक आयोजनों, मरण-परण आदि में हर घर से लोग शामिल होकर सुख-दुःख में हाथ बंटाते थे। अब तो पड़ोसी भी मर जाए तो हम अपने घर में हँसी-ठ्ठ्ठा करते हुए पकौड़ियां खाने में कोई परहेज नहीं रखते।

अपने निकट के संबंधियों के शादी-ब्याहों और सभी प्रकार के शुभाशुभ प्रसंगों में ऎन वक्त पर ऎसे जाते हैं जैसे कि बड़ी दूर के मेहमान आए हों। हम ऎसे मौकों पर न तो परिश्रम करने के लायक हैं और न ही परिश्रम कर सकते हैं।

सब तरफ कामचोरी और आरामतलबी इतनी हावी है कि इस भीड़ को देख कर यही लगता है कि जैस भगवान ने हमें मेहमान के रूप में पैदा किया है और यह सौगंध देकर भेजा है कि किसी के यहां और कोई सा काम नहीं करना है, अतिथियों के रूप में आवभगत स्वीकार करते रहो और जैसे-तैसे दिन-महिने और साल गुजार कर लौट आओ।

ईमानदारी से अपना आकलन करें तो हम यह पाएंगे कि हमारी आदतों और हरकतों, करतूतों और करामातों को देख हमें कोई सामाजिक प्राणी मानने को तैयार नहीं होगा। लोग साफ-साफ कह नहीं पाएं या कहना नहीं चाहें वो अलग बात है लेकिन हमारे बारे में अधिकांश लोगों की धारणा यही है कि हम सब असामाजिक हैं और समाज तथा देश के किसी काम नहीं आने वाले।

हम चिल्ला सकते हैं, बकवास कर सकते हैं, गप्पे हाँक सकते हैं, एक-दूसरे को नीचा दिखाने और चरित्र हनन के लिए सारे संभव प्रयास कर सकते हैं लेकिन समाज और देश के लिए, अपनी भगिनियों-बंधुओं और माता-पिता, बुजुर्गों और गुरुओं के लिए कुछ नहीं कर सकते। सच्चे मन से स्वीकार कर ही लें कि हम सब असामाजिक हैं।

2 comments

  1. सही आकलन है।