पशुओं से भी गए-बीते हैं हम

इंसान और जानवर में फर्क होना चाहिए लेकिन आज के जमाने में इंसान जिस तरह व्यवहार कर रहा है, जैसा उसका स्वभाव बनता जा रहा है, जिस तरह की हरकतें करने लगा है, उसे देखकर तो यही लगता है कि आजका इंसान पशुओं को मात दे रहा है।

यह कहा जाए कि इंसान पशुओं से भी गया-बीता होता जा रहा है तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।  पशुओं से हमें अलग करने के लिए आहार, निद्रा, भय, मैथुन आदि से भी अधिक गुणी और बुद्धिमान मानते हुए सर्वोपरि जानवर तथा सामाजिक प्राणी की संज्ञा दी गई है लेकिन हमारा आजकल व्यवहार जिस कदर होता जा रहा है, उसने हमें पशुओं से भी नीच और अधम बना डाला है।

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खूब सारे लोग हमारी तरह हैं जिन्हें मर्यादा, अनुशासन, आदर्शों और जीवन निर्वाह के सिद्धान्तों से कोई सरोकार नहीं है। केवल अपना पेट भरने, स्वाद पाने, इन्दि्रयों का सुख पाने, घर भरने, अपने-अपने पिटारों से लेकर बैंक लॉकर्स को भरे रखने तथा अपनी ही अपनी चवन्नियां चलाने से ही फुर्सत नहीं है।

इस मायने में हमसे बढ़कर न कोई पशु हो सकता है, और न ही कोई असुर।  परंपरा से हमें ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ का मूल मंत्र पढ़ाकर यह सिखाया जाता रहा है कि सभी प्राणियों को अपनी ही तरह मानकर उनसे वही व्यवहार करो, जो हम उनसे चाहते हैं।

लेकिन अब हम केवल अपनी ही अपनी बात करते हैं, अपने को ही सभी जगह देखना और लाभान्वित करना चाहते हैं। जहां लोभ-लालच, स्वार्थ और ऎषणाओं की पूर्ति की बात आती है, हमें दूसरे कोई स्वीकार ही नहीं।

जहाँ हमें बहुमत की जरूरत होती है, भीड़ जुटाने की आवश्यकता होती है, वहाँ हम दूसरों को लोभ-लालच, प्रलोभन देकर, दबाव से अथवा गुमराह करते हुए जमा कर लिया करते हैं। और जहाँ हमें लाभ दिखता है, कंचन-कामिनी या भोग-विलासी संसाधनों अथवा मुफत का माल उड़ाने का अवसर दिखता है, वहाँ सब कुछ अकेले ही अकेले कर गुजरते हैं और इस समय हमें अपने सिवा किसी की भी याद नहीं आती।

हमारी मानसिकता ही यह हो गई है हम अपना सब कुछ सहेज कर रखना चाहते हैं, और दूसरों का नुकसान होते देख हमें आत्मिक प्रसन्नता होती है। इस मामले में हमारा दोहरा-तिहरा चरित्र देखा जाता है, हमारी कथनी और करनी में रात-दिन का अन्तर होता है, हमारे चरित्र और परिवेशीय व्यवहार में जमीन-आसमान का अन्तर दिखाई देता है।

हम सभी की आत्मा इस तथ्य को स्वीकारती है कि हम जिस तरह के ढोंग और धूर्तताओं में रमे हुए हैं, वह इंसानी स्वभाव से किसी भी तरह मेल नहीं खाता लेकिन हमारे अहंकार, इन्दि्रय सुख और मुफत का माल उड़ाने की मानसिकता इतनी हावी होती है कि हमारा मन, मस्तिष्क और शरीर भटकाव के दौर में पहुंच जाता है और हम उच्छृंखल व उद्दण्ड होकर मर्यादा-लज्जाहीन और दुष्टताओं से भरी हरकतें करने लगते हैं और अपने निम्नस्तरीय मनोरंजन के लिए औरों को तंग करते रहते हैं।

हमारे सभी प्रकार के व्यवहार की तुलना जानवरों, जाहिलों, हिंसकों और राक्षसों से करना आरंभ कर दें और इसमें पूरी ईमानदारी बरतते हुए आत्म मूल्यांकन को अपना लें तो हमारी आत्मा खुद ब खुद यह कह उठेगी कि यह जिस्म परायों के खान-पान और हराम की माल-मलाई से इतना अधिक दुर्गन्धयुक्त और विजातीय हो चुका है कि अब शरीर से विलग होना ही अच्छा है।

जब हम अपनी आत्मा के स्तर पर यह अनुभव कर लिया करते हैं कि जो कुछ हम कर रहे हैं वह अमानवीय, पैशाचिक और पाशविक कृत्य ही हैं तथा ऎसा करना इंसान के गुणोें में नहीं आता है, तब हमें या तो आत्म सुधार और प्रायश्चित की ओर ध्यान देते हुए पश्चाताप की मुद्रा में आना चाहिए और अपने आपको बदलने का प्रयास करना चाहिए अथवा तहे दिल से यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि हम इंसान की खाल में जरूर हैं लेकिन इंसान नहीं।

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