हम सब चाहते हैं वीआईपी आतिथ्य सत्कार

कुछ मामलों में अब ज्यादातर लोग असामान्य और अजीब होते जा रहे हैं। जिस अनुपात में हम भौतिक विलासिता, धन वैभव और चकाचौंध आदि सब कुछ पाते जा रहे हैं उसी अनुपात में हमारे भीतर से सादगी, सरलता, सहजता, धैर्य, माधुर्य और मानवीय स्वभाव पलायन करता जा रहा है।

पहले स्व पराक्रम, मेहनत और पुरुषार्थ हमारी जिन्दगी के मूलाधार हुआ करते थे। और इन्हीं की मजबूत बुनियाद पर सुन्दर और अनुकरणीय जीवन की सुगंध के कतरे ताजिन्दगी पसरे रहा करते थे।

 अब हम हर मामले में पराश्रित होते जा रहे हैं। दूसरों पर आश्रित हो जाने के स्वभाव की वजह से हम अब अपनी सामान्य जिन्दगी भी आसानी से नहीं जी पाने की स्थिति में आ गए हैं।

एक जमाने में राजा-महराजा और दरबारी, अभिजात्य वर्ग और वैभवशाली लोग ही अपने हर काम के लिए किसी न किसी नौकर-चाकर और दास के भरोसे रहा करते थे। बेगारी से मौज उड़ाते थे और मरते दम तक यही पक्का विश्वास बनाए रखते थे कि हम ही हैं जो दरबारी आनंद और मजमा लगाने के लिए पैदा हुए हैं। आज भी यह स्थिति बरकरार है। अब हम सभी को हर पल दरकार रहती है अपनी सेवा-चाकरी करने वाले मातहतों और दासों की।

हर जगह हम अपने आपको वीआईपी और मेहमानों की तरह देखना और उसी तरह का व्यवहार पाना चाहते हैं। पहले यह बीमारी बड़े-बड़े लोगों और अधीशों-अधीश्वरों को ही हुआ करती थी लेकिन अब सभी प्रकार के लोगों में घर कर गई है। चाहे अनुचर, अंधानुचर हो या फिर बड़े लोगों के परिवारों में से।

सब तरफ लूट और मुफतिया स्वागत – सत्कार और आतिथ्य पाने की हौड़ सी मची हुई है और मजे की बात ये कि जो यह सब पाना चाहते हैं वे यह मानते हैं कि यह उनका जन्मसिद्ध ही नहीं बल्कि कई जन्मों से लेकर जन्म-जन्मान्तरों तक का अधिकार है और इसे लेकर, भोग कर ही रहेंगे। इस परंपरागत अधिकार से उन्हें कोई वंचित नहीं कर सकता।

मेजबानी या सेवा करना कोई नहीं चाहता, सारे के सारे मेहमानों की तरह रहना चाहते हैं। सबकी यही इच्छा रहती है कि जहाँ भी जाएं, रहें या परिभ्रमण करें, वहाँ उन्हें हर तरह की राजसी सुख-सुविधा और ऎश्वर्य का आनंद प्राप्त होता रहे, सब कुछ मुफत में मिलता रहे।

कोई नहीं चाहता जिम्मेदारी उठाना। सब चाहते हैं कि बिना कोई जिम्मेदारी संभाले सब कुछ उनकी झोली में आता रहे, जो कुछ है उसका लाभ उन्हें ही मिलता रहे, और कोई पूछने वाला नहीं हो, वे स्वच्छन्द होकर जीते हुआ सभी प्रकार के ऎश करते रहें।

हम अपनी इच्छित हर वस्तु को अपने सामने हाजिर कर देने वाला चाहते हैं। हमसे न कुछ होता है न होगा। बिना हिले-डुले या मेहनत किए यही चाहते हैं कि सब कुछ हमारे नाम हो जाए, हमारे काम आ जाए।

हम लोग अपने घरों, कार्यस्थलों से लेकर अपने तमाम प्रकार के व्यवहार स्थलों तक में मेहमानों की तरह पेश आते हैं और हर मामले में वीआईपी ट्रीटमेंट चाहते हैं। यह मिलता रहे तो हम खुश रहते हैं और न मिले तो नाराजगी की सारी हदें पार कर देते हैं। इस मामले में प्रतिभाओं, हुनर, स्वाभिमानी स्वभाव, सिद्धान्तों और आदर्शों से हमें कोई सरोकार नहीं है, हमें सिर्फ अपने स्वार्थ और काम बनने-बनाने, वीआईपी तथा वीवीआईपी की तरह जिन्दगी गुजारते हुए भरपूर मुफतिया आतिथ्य पाने की ही पड़ी है।

कुछ लोग तो बकवास और गाली-गलौच तक पर उतर आते हैं और अपनी प्रतिष्ठा का  प्रश्न बना कर जिन्दगी भर किसी न किसी से दुश्मनी मोल लेते रहते हैं। जब तक सब कुछ आसानी से मिलता रहे, तब तक हम परस्पर प्रशस्तिगान और पीठ थपथपाने में लगे रहते हैं। जहाँ कहीं कोई कमी दिख जाए, सुख-सुविधाओं में कटौती का अंदेशा हो, वहाँ हमारा छद्म स्वाभिमान अहंकार के रूप में जाग जाता है और हम लट्ठ लेकर पड़ जाते हैं पीछे। यह प्रतिशोध सुख-सुविधाओं और मौज उड़ाऊ समय लौटने तक जारी रहता है, फिर जैसे थे वैसे।

हमारी दयनीय हालत ही कही जा सकती है कि हम सभी प्रकार का सामथ्र्य होने के बावजूद अशक्तों की तरह जीवन जीने के आदी हो गए हैं। घर में रहते हुए पानी भी पीना हो तो उठकर नहीं पी सकते। इसके लिए भी किसी न किसी का सहारा लेना पड़ता है। दूसरे कामों की तो बात ही क्या है।

शौच और स्नान को छोड़ दिया जाए तो सामान्य दिनचर्या के तकरीबन सारे कामों में हम किसी न किसी का सहारा लेते हैं। यहाँ तक कि अपने कामों को भी खुद करने का मानस हमारा नहीं रहता। हम घर में भी परिजनों से इसी तरह नौकरों जैसा व्यवहार चाहते हैं। काम-धंधे, दफ्तरों और विभिन्न आयोजनों तक में हम खुद कुछ करना नहीं चाहते।

यही सब इसी तरह बदस्तूर चलता रहा तो एक दिन वह भी आ सकता है कि जब इंसानों को संतति चाहने के लिए भी औरों पर निर्भर रहना पड़ सकता है क्योंकि जिस हिसाब से हम नाकारा, दरिद्री और आलसी होते जा रहे हैं उस हिसाब से तो यही सब होना है। बस प्रतीक्षा कीजियें, वह समय जल्द ही आ सकता है।

पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक-साहित्यिक और सभी प्रकार के सामुदायिक आयोजनों में भी हम हर प्रकार की क्रिया में दूसरों पर निर्भर रहा करते हैं। इनमें भी मेहमानों की तरह ऎन वक्त पर आते हैं और बिना कुछ काम-धाम या सेवा किए समय होते ही चले जाते हैं।

कुल मिलाकर हम इस कदर परश्रित हो गए हैं कि हम अपने बूते जिन्दगी को भी आसानी से नहीं जी सकते। हम इतने अधिक पराश्रित, प्रमादी और आलसी हो चुके हैं कि हमारा कहीं कोई ठौर नहीं है।

जो लोग अपने रोजमर्रा के काम नहीं कर सकते, उन लोगों से समाज और देश की सेवा की उम्मीद कैसे की जा सकती है ?  हम जिस समाज में रहते हैं, जिस राष्ट्र का नमक खाते हैं उससे जुड़े हुए किसी भी आयोजन में निमंत्रण पत्र पाने की इच्छा रखते हैं और न मिले तो आसमान ऊँचा कर डालते हैं। चाहे वह राष्ट्रीय पर्व या कौटुम्बिक आयोजन ही क्यों न हो।

हर आयोजन में हम वीआईपी की तरह व्यवहार चाहते हैं। यह दिगर बात है कि हमारी औकात क्या है, यह हमें भी नहीं पता। हमें यदि कहीं किसी जगह अकेला छोड़ दिया जाए तो हम जीना ही भूल जाएं, हर क्षण शिकायत करते रहें वो अलग। हममें से बहुत से लोग हैं जो अपने से संबंधित कामों को भी करना नहीं चाहते।

खूब सारे हैं जिन्हें काम नहीं आता फिर भी ऎसे-ऎसे स्थानों पर आदरपूर्वक जमे हुए हैं कि कभी भगवान को कोसने की इच्छा होती है और कभी जनता के भाग्य को। इनमें भी बहुत सारे ऎसे मिल जाएंगे जो कि मुफत की तनख्वाह ले रहे हैं, बिना किसी काम-काज के मरजी मुताबिक पा रहे हैं और ऊपर से खाली दिमाग शैतान कर घर बने हुए औरों पर कीचड़ उछालने में दिन-रात लगे हुए हैं।

इन लोगोें के पास कोई काम नहीं होने से इनकी पूरी ऊर्जा नकारात्मक टिप्पणियों, शिकायतों और सज्जनों को तंग करने में लगी रहती है। कोई दो-चार ऎसे हों तो चल जाए, पर आजकल सभी जगहों पर ऎसे नालायक, नुगरे और वर्णसंकरों की भरमार है जिनके कारण से देश और समाज अपेक्षित तरक्की नहीं कर पा रहा है और हालात विकट होते जा रहे हैं। खासकर उन लोगों के सामने बड़ा संकट और भीषण समस्या है जो कर्मयोग में विश्वास रखते हैं और पूर्ण निष्ठा व समर्पण से काम करते हैं। 

हर नैष्ठिक कर्मशील व्यक्तित्व के जीवन का यही सबसे बड़ा तनाव है कि कुछ नुगरे और शैतानी किस्म के लोग हराम का खा रहे हैं, मुफत की तनख्वाह ले रहे हैं और ऊपरी कमाई भी जमकर कर रहे हैं , और काम के मामले मेें जीरो।

हम अपने दफ्तरों और सभी प्रकार के कार्यस्थलों में जाते-आते रहते है। तब भी हम मेहमानों की तरह व्यवहार करते हैं। कार्यस्थलों पर साफ-सफाई नहीं हो रही है, पानी फिजूल बह रहा है, बिना काम की बिजली जल रही है, सामान कबाड़ हो रहा है, संसाधन बरबाद हो रहे हैं, गंदगी पसरने लगी है, चोरी हो रही है, जरूरी आवश्यकताएं भी पूरी नहीं हो पा रही हैं, दुरुपयोग हो रहा है आदि-आदि। हमेें कोई फरक नहीं पड़ता चाहे पुराने कर्मचारी हों या फिर नये।

हम सब अपने कार्यस्थलों पर मेहमानों की तरह मनमर्जी से आते हैं और चले जाते हैं। हमें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि हमारे कार्यस्थलों की दशा क्या हो रही है? शादी-ब्याहों और बाराती मेहमानों की तरह हम मेहमानवाजी चाहते हैं और न मिले तो हमारा पारा सातवें आसमान पर चढ़ जाता है। और सम्मान में कुछ कमी आ जाए तो शादी वाले घर के फूफा की तरह हो जाएंगे।

दुर्भाग्य से शर्मनाक हालत यह है कि चाहे हमारा अपना घर हो, अपना संस्थान, क्षेत्र या अपना प्रदेश-देश हो, हम अपने आपको मेहमानों और वीआईपी की तरह ही रखने के आदी हो चले हैं। हम सब कुछ अपने लिए कर रहे हैं अपने संस्थानों और कार्यस्थलों को हम केवल मासिक बंधी-बंधायी रकम पाने का जरिया ही मान बैठे हैं, इसके अलावा न हमें अपने उत्तरदायित्वों की कोई समझ है, न अपने फर्ज निभाने का माद्दा।

इस लिहाज से गणना की जाए तो इंसान की अपेक्षा मेहमानों और वीआईपी की संख्या में निरन्तर बढ़ोतरी हो रही है। कोई अपने आपको अच्छा इंसान मानने को तैयार नहीं है, सारे के सारे या तो मेहमानों की तरह पेश आ रहे हैं अथवा वीआईपी बने हुए फिरने के आदी हो गए हैं। लानत है हमारी इस मानसिकता को जो पूरी की पूरी पीढ़ी को प्रमादी, आलसी और निकम्मी बनाने पर तुली हुई है।

आने वाले समय में वीआईपी, वीवीआईपी और मुफतिया आतिथ्य का आनंद पाने वाले जबरिया मेहमानों की संख्या विस्फोटक होने का अंदेशा बना हुआ है। जो लोग अपने आपको इस श्रेणी में मानते हैं उन स्वनामधन्य, महान लोगों के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। किन्तु जो इस श्रेणी से दूरी बनाए हुए हैं वे पुरुषार्थी लोग धन्य हैं।

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