हम सब असामाजिक हैं !

हम सब असामाजिक हैं !

हम सारे लोग सामाजिक प्राणी की पहचान रखते हैं और कहे जाते हैं। लेकिन हमारे स्वभाव, लोक व्यवहार, रहन-सहन और जीवन जीने के रंग-ढंग को देख कर ईमानदारी से यदि सोचें और हमारी सामाजिकता के प्रतिशत का आत्म मूल्यांकन  करें तो हमें अपने आप पर शर्म ही आएगी क्योंकि हम जिस सामाजिकता और सामुदायिकता की बात करते हैं वह हमारे चरित्र में है ही नहीं।

हमने सामाजिक और सामुदायिक काम आने वाले सारे कारकों पर अपने-अपने कब्जे कर लिए हैं और बातें विश्व कल्याण की करते हैं।

हम खुदगर्ज, व्यक्तिपरक और व्यक्तिपूजक होकर रह गए हैं। हो सकता है कुछ फीसदी लोगों और समाजों में मानवीय मूल्यों और सामाजिक गुणधर्मों का समावेश हो लेकिन ज्यादातर में सामाजिकता का ह्रास होने लगा है।

समाजों पर प्रभावशालियों और पूंजीवादियों का अधिकार छाने लगा है और मूल सामाजिक कल्याण की सारी भावनाएं केवल भाषणों, उपदेशों और पब्लिसिटी के फण्डों में ही दिखने लगी हैं।

यहां जब हम समाज की बात करते हैं तब किसी जात-पात की नहीं बल्कि मानव समाज या समुदाय की बात करते हैं और इस दृष्टि से यह कहना समीचीन होगा कि पुरानी सामाजिक व्यवस्थाएं, नियंत्रण, अनुकूल खान-पान और लोक व्यवहार, एक-दूसरे के सुख-दुःख में काम आने की प्रवृत्ति और मानवीय संवेदनाएं खत्म होती जा रही हैं।

समाज और सामाजिकता हमारी तभी जगती है जबकि जातिवादी मानसिकता का परिचय देना होता है अथवा जाति-बिरादरी पर संकट जैसी स्थितियां सामने आ जाएं।

समाज का व्यक्ति पर नियंत्रण समाप्त होता जा रहा है क्योंकि व्यक्ति उन्मुक्त, स्वेच्छाचारी, अनुशासनहीन, अमर्यादित और स्वार्थी किस्म का होने लगा है और ऎसे में सामूहिक कल्याण की भावनाएं तिरोहित होने लगी हैं।

सामाजिक मर्यादाओं की सीमा रेखाओं से आदमी अपने आपको बहुत बड़ा और बढ़िया समझने लगा है और जिन लोगों को हम रोल मॉडल और अनुकरण करने लायक मानते रहे हैं उनका चरित्र और व्यवहार अब अनुकरणीय रहा ही नहीं।

लोगों में पैसे,पद, प्रभाव और शक्तियों की ताकत को इतना अधिक सर्वोच्च महत्व दे दिया गया है कि अब प्रतिभा, हुनर, ज्ञान, अनुभवों और सार तत्वों का कोई वजूद रहा ही नहीं। पैसा सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभर कर आया है या फिर कोई न कोई स्व अर्जित या परायी कृपा से प्राप्त पॉवर।

इसलिए वे लोग हाशिये पर आते जा रहे हैं जो कि समुदाय के हितों के लिए जीवन होम दिया करते थे, सामूहिक कल्याण और सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय की भावना से काम करते थे।

आज हमारे कोई से लोक व्यवहार हों, शुभाशुभ कर्म हों या कोई से अवसर, हम पैसों के बल पर सब कुछ कर डालने का दंभ रखते हैं। पहले ऎसा नहीं था। उस जमाने में सारे लोग मिलकर सभी के काम आते थे और दूसरों की मदद व सेवा करके इतने अधिक खुश होते थे कि उनके लिए इससे बढ़कर प्रसन्नता का कोई और कारण  हो ही नहीं सकता था।

आज हमारी इंसानियत खोने लगी है। हमारा पड़ोसी, भाई-बंधु और स्वजन कितना ही पीड़ा में हो, अभावों और समस्याओं से ग्रस्त हो, हमें कुछ नहीं पड़ी है। बस हम पर कोई आँच नहीं आनी चाहिए, हमें किसी तरह का अभाव न हो, चाहे इसके लिए हमें दूसरों का किसी भी तरह इस्तेमाल क्यों न करना पड़े, कोई सा छोटा-बड़ा नुकसान ही क्यों न करना पड़े।

पहले हम हमारे गली-मोहल्लों में सार्वजनिक प्रयोजन के लिए इतनी अधिक जमीन छोड़कर रखते थे जो कि सभी के शुभाशुभ कर्म में उपयोग में आती थी। हमारी वैयक्तिक संग्रहवादी मानसिकता और परिग्रह का भूत इतना अधिक सर चढ़ गया कि हम सभी ने थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़कर उस जमीन को अपने में मिला लिया। इसका खामियाजा यह हुआ कि हमें अब वाटिकाओं और पार्कों में पैसा देकर अपने आयोजन करने पड़ रहे हैं जो कि पहले घर के पास ही और पूरी तरह मुफ्त में होते थे।

हम हमारे माँ-बाप, भाई-बहन और आत्मीयजनों के नहीं हो सकते, फिर दूसरों के लिए काम आने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। हमारे घर-परिवार में कौन कुँवारा है, किसे शादी-ब्याह की जरूरत है, इसकी चिन्ता अब हम नहीं करते। न ही शादी योग्य लड़के-लड़कियों के लिए सुयोग्य जीवनसाथी ढूँढ़ने में कोई मदद करते हैं।

यहां आकर कुटुम्ब और समाज की उपयोगिता और हमारी भूमिका किसी काम की नहीं रही। और यही कारण है कि हमें वैवाहिक विज्ञापनों और अनजान लोगों की शरण लेनी पड़ती है। जो काम हमारे पुरखे आसानी से कर दिया करते थे, लेकिन हमारी मानसिकता ही नहीं है कि समाज के लिए कुछ करें, सामाजिक की तरह व्यवहार करें। हजारों लड़के और लड़कियां हैं जिन्हें अच्छे जीवनसाथी की तीव्र तलाश है। इनके माँ-बाप परेशान हैं और हम हैं कि हमारी सामाजिक भूमिका के प्रति भी मौन होकर समाज की दुरावस्था को देख रहे हैं।

हमें शर्म भी नहीं आती कि हम कितने असामाजिक हो गए हैं। बेशर्म और निर्लज्ज होकर जीने में हमें आनंद आने लगा है क्योंकि यह बेशर्मी ही है जो हमारे और समाजजनों के बीच परदा बनी हुई है और जिसकी आड़ में हम सब लोग बेफिक्र होकर खुदगर्जी और स्वार्थी जिन्दगी में रमे हुए अपने ही अपने पेट और घर भरने को ही जीवन का सम्पूर्ण लक्ष्य मान बैठे हैं।

हमारी समाज से अन्तःक्रिया, परस्पर संवाद और सहयोगी भावनाओं की निर्मम हत्या हो चुकी है और हम किसी द्वीप की तरह मैं और मेरा परिवार का बोध वाक्य लेकर जी रहे हैं। द्वीप की तरह जीने का एक फायदा यह भी है कि हमारे संसाधनों, सुखों और सुकून का विभाजन करने वाला कोई नहीं होता क्योंकि हम समाज से सायास दूर हैं और एकान्तजीवी होकर अपने आप में मदमस्त हैं।

समाज या क्षेत्र का कोई सा शुभाशुभ कर्म हो, हमारी भागीदारी नगण्य होती जा रही है। जिस समाज और क्षेत्र ने हमें पैदा किया, हवा-पानी, अन्न देकर बड़ा किया, उस समाज और क्षेत्र के लिए कुछ भी करने में हमें शर्म आने लगी है।

समाज के किसी काम के लिए, जरूरतमन्दों की सेवा के लिए हमसे एक पैसा नहीं छूटता, मुफ्त का सब कुछ पाने के लिए हम नंगे-भूखों की तरह दौड़ लगा रहे हैं और भिखारियों सा बर्ताव करते रहे हैं।

पूरी दुनिया हमारे लिए सब कुछ करती रहे, और हम कुछ न करें। इसी मानसिकता का प्रभाव है कि हम सब असामाजिक होते जा रहे हैं। हमसे बड़े असामाजिक और कहाँ से आएंगे।

अपनी पूरी जिन्दगी का आत्मावलोकन करें तो हमारी आत्मा इस सच को स्वीकार करने में एक सैकण्ड भी नहीं लगाएगी कि हम सब असामाजिक ही हैं।

आज के युग की हमसे यही अपेक्षा है कि सामाजिक होने के सारे पाखण्ड, आडम्बर, लोकदिखाऊ बहुरूपिया स्वाँग और नौटंकियां छोड़कर अपने आपको इंसान के रूप में प्रतिष्ठित करें और सामाजिक प्राणी होने का गौरव पुनः प्राप्त करें।