हमसे बेहतर हैं कचरा बीनने वाले

वे लोग कितने अच्छे और भले हैं जो दिन-रात अक्सर सब जगह पाए जाते हैं अपनी पीठ पर बड़े-बड़े बोरों को लादे हुए, इधर-उधर घूमते हुए जहाँ कहीं कचरा, प्लास्टिक और अनुपयोगी सामग्री पर लपक पड़ते और बोरी के हवाले करते हुए दिख ही जाते हैं।

इन लोगों की निगाह अधिक इतनी पैनी हुआ करती है कि ये लोग चाहे किसी कोने में कुछ पड़ा क्यों न हो, इनकी नज़र से बच नहीं सकता।  इन लोगों की वजह से हम गंदगी और कचरे से मुक्त हो जाते हैं, इससे वातावरण का प्रदूषण हटता रहता है और हमारी साँसों के लिए ताजी हवा मिलती रहती है। कई प्रकार के संक्रमण और कीटाणुओं से भी हमें मुक्ति मिलती रहती है। और इन सबके लिए ये लोग हमसे न कोई पैसा ले रहे हैं और न ही कुछ और। अपने पापी पेट की आग बुझाने के लिए ही इन गरीबों के लिए कचरा बीनने की विवशता है। निर्धनता न हो तो कौन ये काम करना चाहेगा।

इस मामले में कचरा-प्लास्टिक बीनने वाले लोग धन्य हैं जो हमारे लिए इतना अधिक परिश्रम करते हैं और रोजाना हमसे कचरे-प्लास्टिक से मुक्ति दिलाते हैं। इन लोगों के सामाजिक अवदान को कहीं कम नहीं आँका जा सकता। ये जो कुछ कर रहे हैं हमारी भलाई के लिए कर रहे हैं। इसमें इनका कोई स्वार्थ नहीं है सिवाय जिन्दा रहने के लिए प्रबन्ध करने के। कचरा जहाँ कहीं भी है वह सभी के लिए घातक है, हमारे लिए, समाज के लिए, क्षेत्र, देश और दुनिया सभी के लिए।  कचरे से मुक्ति के अभियान में जो लोग लगे हुए हैं उनकी भूमिका स्तुत्य है, वंदनीय है और इनके काम अभिनंदन योग्य हैं।

कचरे से मुक्ति पाने का जो जुनून और ज़ज़्बा इन लोगों में है वह किन्हीं और में नहीं। जिन लोगों को इसके लिए पैसा मिलता है वे भी इस मामले में इतने गंभीर नहीं दिखते। अब अपवाद तो हर जगह हुआ ही करते हैं, इस क्षेत्र में भी बहुत से लोग हैं जो अपवाद हैं, अपने काम ईमानदारी और पूर्ण मनोयोग से करते हैं।

कचरा बीनना अपने आप में समाज और देश की बहुत बड़ी सेवा है। वर्तमान में जहां हर तरफ हम स्वेच्छाचारी, उन्मुक्तता और धींगामस्ती के साथ कचरा फेंकू होते जा रहे हैं उसमें प्रदूषण का स्तर हर तरफ बढ़ रहा है।इन सभी प्रकार के प्रदूषणों को केन्द्र में रखकर यदि गंभीरता से सोचा जाए तो साफ-साफ सामने आएगा कि ये कचरा बीनने वाले हमारे बहुत बड़े सहयोगी हैं जिनकी वजह से हम काफी कुछ मात्रा में प्रदूषण से बचे हुए हैं।

एक तरफ इन कचरा बीनने वालों का दृश्य है तो दूसरी तरफ हम लोग हैं जो कचरा जमा करने, चाहे जहाँ फेंकने, कचरे का प्रसंस्करण कर दिमागी कचरा पैदा करने और उसके निर्यात से लेकर दुनिया भर के कचरे का आयात करते हुए अपने आपको कचरा पात्र बनाए हुए हैं। हमारे आस-पास के कई लोगों की तो जिन्दगी ही कचरे के आयात-निर्यात का मजा लेने में लगी हुई है।

बहुत से लोग हैं जो जिन्दगी भर दुनिया का कचरा जमा करते रहकर आनंदित होते हैं। इन लोगों की जिन्दगी ही कचरा परिवहन और आयात-निर्यात में निकलती जा रही है। हर कचरे को मसाला लगाकर औरों तक परोसने और अपने आस-पास, क्षेत्र तथा दूरदराज सभी इलाकों का कचरा जमा कर इसे चारों ओर फैलाने का जो काम हम कर रहे हैं वह अपने आपमें इतना अधिक घृणित है कि यह हमें इन कचरा बीनने वालों से भी नीचे के दर्जे का सिद्ध करने को काफी है।

हमारे में से ही खूब सारे लोग अपने आप में किसी विशाल कचरा पात्र से कम नहीं हैं। इन लोगों के पास हर इंसान, संस्थानों, गलियारों, बाड़ों, चौराहों, दफ्तरों, परिसरों और सर्कलों से लेकर मन्दिरों, मठों, झोंपड़ियों और राजप्रसादों तक का सभी तरह-तरह का कचरा आसानी से उपलब्ध रहता है।इस मामले में इनका पूरा दिमाग कचरा-कॉम्प्लेक्स या कूड़ा-मॉल से कम नहीं होता।  कचरा बीनने वाले तो कचरे को बस्तियों से दूर जाकर ठिकाने लगाते हैं लेकिन अपने आस-पास जमा ये कचराधर्मी अधकचरे लोग कचरे के भण्डारण, मसालाई-फ्राई प्रसंस्करण, परोसगारी, विस्तार और देशज से लेकर तमाम प्रकार के वैश्विक उपयोग तक में माहिर हुआ करते हैं।

कुछ कचरा आयात-निर्यातकों ने तो पूरे देश में कबाड़ा ही कर दिया है। कुछ-कुछ दिन में नया-नया कचरा आकर बदबू फैलाने लगा है। यहाँ तक कि कन्हैया के देश में तालीमी गलियारों में भी कचरे की दुर्गन्ध भभकने लगी है। इन दोनों ही जात के कचरा मित्रों की तुलना करें और अपने आस-पास के लोगों को इससे जोड़कर देखें, आनंद आ जाएगा। अब जरूरी हो चला है इन कूड़ाघरों को भस्मीभूत करना अन्यथा देश की हवाओं को बिगाड़ कर रख देंगे।