आत्म आनन्द चाहें, तो दिखावा त्यागें

आत्म आनन्द चाहें, तो दिखावा त्यागें

जिन्दगी भर हम सैकड़ों-हजारों कर्म करते रहते हैं फिर भी बुढ़ापे तक आते-आते न आत्मसंतोष की अनुभूति कर पाते हैं और न ही आनंद की। अधिकांश लोग जिस आनंद को पाने की आकांक्षा रखते हैं उसे मरते दम तक प्राप्त नहीं कर पाते।

इनके लिए क्षणिक आनंद का अहसास कराने के बाद फिर जैसे थे वैसे ही हो जाने की स्थितियाँ  सामने आ जाती हैं। इंसान जो कर्म ईश्वर के लिए या उसकी साक्षी में करता है उसका अपना खास आनंद होता है और यह शाश्वत होता है, इसमें कभी कोई कमी नहीं आती। और वस्तुतः ऎसे ही कार्य श्रेयदायी और कालजयी होते हैं और यशस्वी जीवन का अनुभव कराते हैं।

इस प्रकार का कर्म करने वाले लोगों की संख्या हालांकि बहुत कम होती है लेकिन इनका कर्म ठोस और उपलब्धिमूलक होने के कारण वैश्विक सुगंध प्रदान करने वाला होता है और दशकों से लेकर सदियों तक याद किया जाता है।

इसके ठीक उलट अधिकांश लोग जो भी कर्म करते हैं, जो व्यवहार प्रकटाते हैं, जिस तरह के स्वभाव का परिचय देते हैं  वह सब कुछ क्षणभंगुर, अस्थायी और अत्यल्प होता है और इसे पा जाने के बाद भी तृष्णा और पिपासा का अन्त नहीं होता।

मरते दम तक इन कर्मों को बार-बार करने की इच्छा बनी रहती है। एक औसत इंसान अपनी पूरी जिन्दगी में नब्बे फीसदी काम अपने मन से नहीं करता बल्कि औरों की देखादेखी करता है अथवा दूसरों को दिखाने अथवा खुश करने के लिए करता है।

और इस सारी यात्रा में इंसान यही सोचता है कि वास्तव में जैसा है वैसा किसी को न दिखे बल्कि उसके बारे में लोग अच्छा और श्रेष्ठ कहें, उसे सर्वोच्च और सर्वोत्कृष्ट मानने का भ्रम पालते रहें चाहे वह उसके योग्य हो या न हो।

यदि हम सभी लोग अपने सारे कार्य सहज स्वाभाविक रूप से करने लगें, तो हमें न तो ब्यूटी पॉर्लरों में जाकर रूप निखारने की जरूरत पड़े, न स्पॉ पार्लरों या जिम में जाकर बैड़ौल और थके-हारे शरीर को सुड़ौल और स्वस्थ बनाने के लिए धनराशि और समय खर्च करना पड़े, और न ही रोजाना बिना किसी काम के सवेरे-शाम कुछ किलोमीटर घूमने की विवशता रहे।

यह सब कुछ उन लोगों को करना पड़ता है कि जो कि एक इंसान के रूप में खरे नहीं उतरते, मेहनत से जी चुराते हैं, आरामतलबी, भोगी और विलासी तथा सामन्ती सोच से जीने वाले हैं। इंसान यदि हर मामले में मौलिक बना रहे, मौलिक अवस्था में भी जीता रहे तो उसे किसी भी प्रकार के बाहरी संसाधन, रसायन या उपक्रम करने की कोई आवश्यकता ही न रहे।

हम स्वयं यदि अपना आत्म मूल्यांकन करें और पूरी ईमानदारी से काम करें, अपने स्वभाव, व्यवहार और चरित्र में कुटिलता त्यागें तो हमारा मन, तन और मस्तिष्क सब कुछ ठीक-ठाक और स्वस्थ-मस्त एवं सुन्दर बना रह सकता है। हम आजकल जो कुछ करते हैं वह सब दिखावा ही है।

लोग हमारे बारे में क्या सोचेंगे, कहेंगे, लोगों को हम कैसा दिखते हैं, कैसा हमें दिखना चाहिए और जगत में सम्मोहक तथा जीवन्त इंसान दिखने के लिए क्या कुछ करना चाहिए कि हम अन्यतम और आकर्षक दिखें।

इन्हीं दो-चार बातों के इर्द-गिर्द पूरी दुनिया घूम रही है और निरन्तर घनचक्कर बनी हुई है। औरों को दिखाने व खुद को महान एवं सर्वश्रेष्ठ साबित करने की हौड़ में हमने सामाजिक, आर्थिक और परिवेशीय विषमताओं, दारिद्रय और आलस्य को इतना अधिक पाल लिया है कि हम कहीं के नहीं रहे।

बिना काम के संसाधनों की भीड़, वाहनों की कतार, आलीशान भवनों, पद-प्रतिष्ठा और पैसों को ही हमने अहम् मान लिया है। सभ्यता, संस्कृति, संस्कार, सिद्धान्त और मर्यादाएं सब कुछ गौण या निरर्थक मान बैठे हैं।

भौतिक सम्पदा को श्रेष्ठ मानने की भूल के कारण मानवीय संसाधन और व्यवहार हाशिये पर जा रहे हैं। पदार्थ के प्रति आसक्ति के भाव ऊँचाइयां पाते जा रहे हैं और मानवीय मूल्यों का इतना अधिक क्षरण होता जा रहा है कि हमारा पूरा का पूरा जीवन दूसरों की निगाहों का कायल होता जा रहा है।

हमारे लिए आत्मा का कोई वजूद नहीं रहा बल्कि जो कुछ है वह दूसरे ही हैं। दूसरे ही हमारे स्वभाव, व्यवहार और चरित्र को तय करने में निर्णायक भूमिका अदा करते हैं और दूसरों की इच्छा ही सर्वोपरि है।

हम अपने रहे ही नहीं, हमारा पूरा जीवन दूसरों की भेंट चढ़ चुका है, हम तो केवल कठपुतलियों, कठपुतलों या बिजूकों की तरह व्यवहार कर रहे हैं।  हमारा अपना कुछ भी नहीं, न हमारे कोई सोच-विचार हैं, न कोई उद्देश्य या लक्ष्य। जो कुछ है वह औरों का ही है, औरों के लिए ही है।

लगता है हम गलती से संसार में इंसान बन गए हैं।  दिखावों की भेंट चढ़ चुकी मानव जाति का ऎसा हश्र आज से पहले कभी नहीं हुआ। जब हम अपने ही नहीं रहे, तब हम किसके हो सकते हैं, यह प्रश्न हमारे जेहन में तब तक आता रहेगा, जब तक हम धरती से विदा न होंगे।

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