पुण्य क्षय का संकेत है वंशजों में दरार

कुल-कुटुम्ब सौहार्द और संगठन का परिणाम है और इसमें उत्तरोत्तर विस्तार एवं सुदृढ़ता के साथ समृद्धि पाना इस बात का द्योतक है कि पूर्वजों के साथ वर्तमान पीढ़ी का भी पुण्य प्रभाव बढ़ रहा है और पुरानी पीढ़ी के अनुपात में पुण्य का दौर निरन्तर बना हुआ है।

हालांकि ऎसा बिरले परिवारों में ही हो पाता है और वे भी वे ही परिवार हुआ करते हैं जो कि वंश परंपरा से आनुवंशिक रूप से पवित्रता का वरण करने वाले हों, कुल परंपरा के अनुरूप जिनका आचरण हो तथा कौटुम्बिक पुरातन सांस्कृतिक, सामाजिक और पारवारिक परंपराओं का विशुद्ध रूप से पालन करने वाले हों अन्यथा इतना एक्य और संगठन होना कभी संभव नहीं है यदि पुण्यों का सम्बल न हो।

देखा यह गया है कि बड़े-बड़े घराने और महान-महान लोगों के परिवार बिखर जाते हैं और पारिवारिक परंपराएं ध्वस्त हो जाती हैं, कइयों की कुल परंपरा को ग्रहण लग जाता है और स्थितियां यहां तक भी आ जाती हैं कि इनका नाम लेवा कोई नहीं बचता। जो कुछ जमा पूंजी और जमीनादि होते हैं उन पर दूसरों का कब्जा हो जाता है और मूल परिवार की बजाय दूसरे लोग मौज उड़ाते रहते हैं।

यह स्थिति तब आती है जबकि पूर्वजों का संचित पुण्य बरकरार रखते हुए उनके वंशज स्व पराक्रम और पुरुषार्थ से इसमें अभिवृद्धि करते रहें। वे ऎसा न कर पाएं तो एक न एक दिन पूर्वजों द्वारा संचित पुण्य समाप्त हो ही जाता है और इसके बाद वंश-परिवार को एक सूत्र में बांधे रखने वाले सारे ताने-बाने क्षीण होकर टूटने लगते हैं और इस कदर टूटते चले जाते हैं कि इसकी रोक तक संभव नहीं हो पाती।

यही वह समय होता है कि जब पिता-पुत्र, पिता-माता, पति-पत्नी, भाई-भाई, भाई-बहनों और तमाम प्रकार के रिश्तों में दरार पड़ना शुरू हो जाती है। इसका आरंभिक चरण किसी न किसी बात को लेकर वाद-विवाद से शुरू होता है और संवादहीनता की सीढ़ियां पाकर आक्रोश, मनभेद और प्रतिशोध का पारा सातवें आसमान की ओर ऊँचा उठना शुरू करने लगता है।

एक बार जब कहीं संवाद खत्म हो गया तो इसका सीधा सा अर्थ है कि सजातीय विकर्षण का भयावह और अनिष्टकारी दौर आरंभ हो ही गया। इसका अंत कोर्ट-कचहरी में चक्कर काटने से शुरू होता है और जीवन भर की अतृप्ति, प्रतिशोध का जखीरा और एक-दूसरे को नुकसान पहुंचा डालने की चरमावस्था को पार करता हुआ अन्ततः असमय गंभीर बीमारियों, तनावों और विषादों के साथ काल के आवाहन की पूर्णता के साथ ही समाप्त हो पाता है।

अक्सर इंसान को क्रोध, प्रतिशोध तथा दूसरों का सर्वोच्च अपमान एवं अहित कर डालने की आदत बन जाती है और जो एक बार नकारात्मक और विध्वंसक मनोवृत्ति को लेकर रण के मैदान में नंगा और बदहवास होकर आ जाता है उसका इंसान के रूप में लौटना संभव है ही नहीं। या तो किसी न किसी बहाने ऊपर चला जाएगा या फिर मतिभ्रम की अवस्था पाकर ऎसा हो जाएगा कि वह न खुद के किसी काम का रहेगा और न ही दूसरों के।

बहुत सारे लोग हैं जो इन्हीं अवस्थाओं में जी रहे हैं और जिनके लिए जिन्दगी अभिशाप ही हो गई है। बहुतों के लिए जिन्दगी का काफी कुछ हिस्सा अनर्गल अलाप, प्रलाप और विलाप में बीतता है, बहुत से आधे या पूरे पागलों की तरह भटक रहे हैं, काफी सारे हैं जो फर्जी शिकायतों और नुकसान पहुंचाने के दूसरे सारे रास्तों को अपना कर इंसानियत भूल चुके हैं।

खूब सारे लोग अपने आपको परम विद्वान, ज्ञानी, तत्वज्ञानी और सर्वश्रेष्ठ मानने का भ्रम इस कदर पाले हुए हैं कि इन्हें दुनिया भर में अपने सिवा और कोई अच्छा और सच्चा नहीं दिखता, इसलिए हर किसी के खिलाफ बोलने लगते हैं, निन्दा करते रहते हैं और जो अपने सम्पर्क में आता है उसके सामने किसी न किसी का नाम लेकर रोना रोते रहते हैंं।

इस किस्म में वे लोग अधिक आते हैं जिनके लिए जीवन का कोई सा सुख प्राप्य नहीं है, एक सामान्य इंसान की जिन्दगी से भी महरूम हैं और नैसर्गिक अभावों के कारण विक्षिप्त अवस्था में पहुंच चुके हैं।  इस कारण से इन लोगों का अपने आपको महान और श्रेष्ठ साबित करना एक बीमारी  और अभाव ग्रस्तों की पीड़ा की अभिव्यक्ति के रूप में ही देखा जान चाहिए।

फिर जब बात परिवार की हो तब यदि किसी कारण से कोई मतभेद सामने आने लगें तब इन्हें हल्के में नहीं लेकर सभी परिवारजनों और कुटुम्बियों को मिलकर गंभीरता से इस बात का चिन्तन करना चाहिए कि जो स्थितियां सामने आ रही हैं उसके लिए हमारे पूर्वज नहीं बल्कि हम स्वयं दोषी हैं क्योंकि हम उनके पुण्यों को सुरक्षित नहीं रख पाए, इनकी बराबरी तक नहीं कर पाए और इस कारण से यह सब हो रहा है।

पुण्यों के क्षय होने के दौर को यदि आरंभिक चरण में ही नहीं रोका गया तो पुण्यक्षीणता का यह प्रवाह और अधिक तेजी पा लेता है और ऎसा यदि हो गया तो परिवार में बिखराव और प्रतिष्ठा हानि को कोई नहीं रोक पाता।

पुरखों के मुकाबले अधिक कुछ न कर पाएं तो कम से कम इतना जरूर कर लें कि पूर्वजों के पुण्य, कीर्ति और साख को कम न होने दें, यही काफी है पारिवारिक एवं सामाजिक सौहार्द और संगठन के साथ आगे बढ़ने के लिए। संघे शक्ति कलौयुगे …..।