वास्तु चर्चा – प्रगति में बाधक हैं ये

वास्तु चर्चा – प्रगति में बाधक हैं ये

हर प्रकार का प्रवाह अपने आप में सहज, सरल और निर्बाध रहना चाहता है। जब तक उसकी यह मौलिक अवस्था बनी रहती है तभी तक यह प्रवाह देखने में आनंददायी और अनुभव करने में सुकूनदायी रह सकता है। जैसे ही उसकी मौलिकता मेंं आंशिक या पूर्ण अवरोध आरंभ होता है वैसे ही यह प्रवाह अपना अस्तित्व खोने लगता है या विकृत और कुपित होकर अनिष्टकारी हो जाता है।

यह प्रवाह चाहे प्राकृतिक हो, दैहिक हो या फिर मानसिक ही क्यों न हो। जहाँ सहज वेग पर पहरे बिठाये जाने लगें, रोका जाए अथवा वेग का मार्गान्तरण कर दिया जाए। एक सीमा तक ये प्रवाह बाधित और रास्ता बदल कर चलता रहता है लेकिन जैसे ही प्रकोप का भाव आता है या सीमाओं और मर्यादाओं का बाँध टूटने लगता है वैसे ही सब कुछ विनाशकारी होकर ताण्डव मचाने लगता है और हर तरफ अपना कुप्रभाव दिखाने लगता है।

लोगों की सभी प्रकार की बीमारियों का भी यही कारण है और परिवेश, प्रकृति तथा समाज की तमाम विषमताजनक स्थितियों की वजह भी यही है। सभी जड़ और चेतन पदार्थों का स्वभाव है अपनी मर्यादा में रहना लेकिन इंसान ही एकमात्र ऎसी प्रजाति है जो कि मर्यादाओं का व्यतिक्रम करने में सबसे आगे रहा करती है।

यही कारण है कि मर्यादाओं को तोड़ते रहने वाले इंसान का प्रकृति से सीधा संघर्ष आरंभ हो जाता है और यह संघर्ष इंसान की हठधर्मिता और अहंकारों के कारण विध्वंस का इतिहास रचने तक पहुँच जाता है। प्रकृति, परिवेश और समाज से लेकर सभी प्रकार की मर्यादाहीनता को छोड़ दिया जाए और केवल अपने आस-पास की भौगोलिक स्थिति को ही देख लिया जाए तो कई प्रकार की विषमताओं की मौजूदगी के कारण हमारी प्रगति बाधित होती है।

यह एक तरफ वास्तुदोष भी है और दूसरी ओर सनातन और शाश्वत प्रवाह में अवरोध भी। आम तौर पर हम लोग अपने घर के आस-पास, मोहल्ले या पास से होकर गुजर रही सड़क पर पड़े हुए गड्ढों और खड्डों को देखते रहते हैं किन्तु इन्हें भरने या ठीक करने के लिए कोई प्रयास नहीं करते। हम सभी मूकद्रष्टा के रूप में होते हैं और हमेशा इसी प्रतीक्षा में रहा करते हैं कि सरकार की ओर से इसे ठीक कराया जाए या स्थानीय प्रशासन या ग्राम पंचायत अथवा और कोई एजेंसी इसे ठीक करे।

कई बार यह स्थिति महीनों तक यों ही पड़ी रहती है। हम चाहें तो कुछ मिनटों में ही इन खड्डों को आस-पास की मिट्टी से भरकर दुरस्त कर सकते हैं लेकिन हम इतने अधिक आलसी, प्रमादी और पराश्रित हो चुके हैं कि अपनी ओर से कोई पहल नहीं करते।

बरसात में गड्ढों में पानी भर जाता है और आस-पास कीचड़ फैलता रहता है, मच्छर और दूसरे जहरीले जीव-जन्तु और गंदगी का प्रकोप पसरा रहता है और हमेशा कीटाणुओं तथा संक्रामक बीमारियों की आशंका बनी रहती है।

इन खड्डों की हमारे द्वारा की जाने वाली उपेक्षा के कारण हम पर परोक्ष-अपरोक्ष रूप से होने वाले प्रभावों को नज़रअन्दाज कर भी दिया जाए तो उस राह से गुजरने वाले आवागमन में परेशानियों को भुगतते रहते हैं और जो लोग इस राह से गुजरते हैं वे सारे के सारे इन हालातों को देखकर बददुआएं और गालियाँ देते हुए गुजरते रहते हैं और सभी को कोसने में कोई कसर बाकी नहीं रखते।

इस तरह बददुआओं की भारी संख्या इतनी अधिक हो जाती है कि हर खड्डे के खाते में हजारों नकारात्मक विचारों का आभामण्डल पसरा रहने लगता है और ये सारे के सारे स्थल नकारात्मक विचारों और प्रभावों से भर उठते हैं।

ये नकारात्मकताएं कई प्रकार की अनचाही स्थितियां पैदा करने के लिए काफी हैं। बात केवल गड्ढों तक सीमित नहीं है बल्कि स्पीड ब्रेकरों का होना भी सतत प्रवाह को रोकने वाला होता है। जहाँ-जहाँ मार्गों के सतत प्रवाह को रोकने के लिए स्पीड ब्रेकर बने होते हैं वहाँ गंभीरता से देखा जाए तो आस-पास की दुकानों, संस्थाओं और घरों आदि पर इनका नकारात्मक प्रभाव  देखा जा सकता है।

जिन दुकानों के आगे या आस-पास स्पीड ब्रेकर होते हैं वे दुकानें किसी न किसी नकारात्मक कारण के अक्सर बंद रहती हैं अथवा चलती नहीं। यही स्थिति उन घरों की होती है जिनके मुख्य द्वार के ठीक सामने स्पीड़ ब्रे्रकर या कोई न कोई उभार अथवा गड्ढा होता है। इन घरों व प्रतिष्ठानों में कलह तथा हानि हमेशा बने रहते हैं।

अपने किसी भी स्थल के सामने या आस-पास स्पीड ब्रेकर गड्ढा, खड्डा, ऊबड़-खाबड़ जमीन, मिट्टी या कचरे का ढेर अथवा अनुपयोगी सामग्री का अम्बार लगा होने पर क्षेत्र विशेष का वास्तु भंग होता है। बुरी और नकारात्मक शक्तियां इन क्षेत्रों को अपना डेरा बना लिया करती हैं और इसका बुरा प्रभाव उन सभी लोगों पर पड़ता है जो वहाँ रहते हैं।

रास्तों पर आवागमन करने वाले तकरीबन सभी लोग स्पीड ब्रेकरों से धीमी पड़ने वाली स्पीड़, ठोकर और परेशानियों की वजह से हर स्पीड ब्रे्रकर के करीब आकर अपनी ओर से बददुआएं देते हैं और इस स्थिति से दुःखी होते हैं।

इस कारण से हर स्पीड ब्रेकर हजारों-लाखों बददुआओं के भण्डार से भर जाता है और वहाँ नकारात्मकताओं का जखीरा पनप जाता है। धीरे-धीरे ये नकारात्मक शक्तियाँ वहाँ से पसरने लगती हैं और अपना कुप्रभाव छोड़ती रहती हैं।

इसी प्रकार अपने घर या प्रतिष्ठान के आस-पास कहीं भी सटा हुआ कोई सा खाली भूखण्ड पड़ा हो तथा उसमें कचरा और कबाड़ जमा होता रहता हो, तब भी आस-पास के घरों का वास्तु भंग हो जाता है और समीप तथा उस मोहल्ले में रहने वाले लोगों को अकारण भय, शोक, रोग तथा दुःखों की प्राप्ति होती है।

परिवेशीय वास्तु दोषों के प्रति बेपरवाह न रहें तथा इनसे समय रहते मुक्ति पाने के उपाय करें। इसके लिए किसी और के भरोसे न रहें बल्कि खुद अपनी ओर से पहल करें। इन छोटी-छोटी समस्याओं और परेशानियों से बचने के लिए स्वयं के स्तर पर प्रवाह को सहज बनाने की कोशिश कर लिए जाने से बड़े-बड़े खतरों से बचा जा सकता है।

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