आवारा साण्डों की धमाल

आजकल बतरसिया और कामचोरों ने कर्मयोग का परित्याग कर दुनिया जहान की बातों और चर्चाओं में रस लेना शुरू कर दिया है। पहले जमाने में इंसान अपने-अपने हुनर और कर्म के अनुरूप काम में लगा रहता था तथा लक्ष्य प्राप्त करते हुए समाज और क्षेत्र में अपना खास वजूद बनाता हुआ जीवन को धन्य बनाते हुए संसार को कुछ न कुछ देकर जाता था।

अब बहुत सारे लोगों के लिए जिन्दगी टाईमपास हो गई है। बंधी-बंधायी मिल रही है या फिर बाप-दादाओं ने इतना अधिक जमा किया हुआ है कि सात पुश्तें आसानी से खा-पी सकें और ऎश करती रहें। इसके अलावा कामचोर प्रजाति के लोग मेहनत करना नहीं चाहते इसलिए एक-दूसरे को उल्लू बनाते हुए चतुराई के साथ कमा खा रहे हैं।

ऎसे लोगों के लिए कर्म गौण हो गया है और कर्म का स्थान ले लिया है फालतू की चर्चाओं, विघ्नसंतोषी दुष्प्रवृत्तियों और समाज में प्रदूषण घोलने में रमे रहने ने।

बात चाहे किसी भी कर्म क्षेत्र की हो या इलाके की, हर जगह इस पुरुषार्थहीन और आसुरी प्रजाति के लोगों ने दबदबा बना रखा है। पहले जहाँ चिल्लपों और शोरगुल वाले इलाकों के लिए सब्जी मण्डी नाम दिया जाता था।

अब सब्जी मण्डी का शोर भी इन लोगों की हरकतों और करतूतों के सामने फीका पड़ गया है। और यही वजह है कि इन नाकारा और टाईमगुजार लोगों के लिए अपने-अपने बाड़े और परिसर ही सर्वाधिक उपयुक्त हो चले हैं। हमारे अनुभव में आता है कि सब जगह ऎसे कुछ न कुछ डेरे होते ही हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि इन्हें कुछ लोगों ने अखाड़ों का रूप दे दिया है जहाँ ये अखाड़ची और अक्खड़ लोग हावी हैं और धींगामस्ती करने में रमे हुए हैं।

इसी तरह खूब सारे लोगों के लिए ये डेरे धर्मशालाओं या रैनबसेरों से कम नहीं हैं जहां चाय-पानी और नाश्ते के साथ आवभगत के तमाम अवसर आदरपूर्वक उपलब्ध हैं। आदमी जब कोई काम नहीं हो, तब आ धमकता है इन धर्मशालाओं में, और भिड़ जाता है अपनी ही तरह के लोगों के साथ चर्चाओं में डूबकर घण्टों गुजारने में। कइयों का रोजाना का यही क्रम बन गया है। बेचारे आवारा साण्डों को तो लोग यों ही बदनाम करते हैं। इनसे भी अधिक आवारा इंसानों की कोई चर्चा नहीं करता।

सबका अपना-अपना कर्मक्षेत्र होता है, अपने-अपने काम होते हैं और अपनी-अपनी सीमाएँ। सभी लोग अपने लिए निर्धारित मर्यादाओं का पूरा-पूरा और ईमानदारी से पालन करते रहें, अपनी-अपनी सीमाओंं में रहकर निर्धारित कर्तव्य कर्म का निर्वाह करते रहें, तो दुनिया में किसी को किसी से कोई परेशानी या समस्या हो ही नहीं।

पर यह केवल सिद्धान्तों में ही रह गया है। हकीकत कुछ दूसरी ही है। हर कोई अपनी सीमाओं और मर्यादाओं को जानता-पहचानता और समझता जरूर है लेकिन इससे अधिक को पाने, इससे अधिक अधिकारों और संसाधनाें का उपभोग करने, सुपरसीट करने तथा अपनी सीमा रेखाओं तथा सभी प्रकार की परिधियों से बाहर तक की टोह और उन पर अधिकार रखने का शगल ही ऎसी बहुत बड़ी बुराई है जिसके कारण मानवजाति खुद परेशान है और आत्महन्ता जैसी स्थितियों में जी रही है।

हर आदमी अपनी खाल और खोल से बाहर निकल कर अपने से ऊपर वालों के अधिकारों को छीनना चाहता है, अपनी निर्धारित हैसियत और प्रतिभाओं से अधिक पाने को उतावला बना रहता है और चाहता है कि उसे अपने वर्तमान से ऊपर की श्रेणी के सारे अधिकार और लाभ प्राप्त हो जाएं ताकि दूसरों के मुकाबले अधिक प्रभुता संपन्न हो जाए और अपने आपको महान तथा बड़ा सिद्ध करने में कामयाब हो जाए। किसी का पैर बाहर निकल आए, किसी का चेहरा खोल छोड़कर बाहर तकने लगे, तब समझ जाना चाहिए कि आदमी ऑक्टोपस हो गया है।

यों भी इंसानी आयु को कुछ ज्यादा नहीं माना जा सकता। बावजूद इसके हम लोग अपने निर्धारित दायित्वों, सामाजिक कर्तव्यों और व्यक्तिगत कर्म को भुलाकर दूसरों की पंचायती करने लगते हैं। हममें से बहुत सारे लोग हैं जो अपने बारे में कभी चिन्तन नहीं करते किन्तु दुनिया जहान की पंचायती, भांजगड़े और मध्यस्थता करने के लिए हमेशा उत्सुक बने रहते हैं।

इन लोगों से अपने काम होते नहीं, जिन कामों से रोजी-रोटी और दूसरी सारी सुविधाएं मिल रही हैं, जिन्दगी की गाड़ी चल रही है,  उन कामों के प्रति बेपरवाह रहते हैं। यही नहीं तो बहुत सारे लोग ऎसे होते हैं जिनके बारे में कहा जाता रहा है कि ये लोग अपने-अपने कर्मक्षेत्रों में ऎसे काम करते हैं जैसे कि अखाड़ची ही हों।

ये लोग अपने कर्मस्थलों को इतना अधिक विचित्र स्थितियों में पहुँचा देते हैं कि लगता है तमाम प्रकार के उस्तादों के अखाड़ों का पुराना वैभव फिर जिन्दा हो चुका है अथवा दिवंगत अखाड़चियों और उस्तादों की आत्मा का प्रवेश इनमें जब-तब होता रहता है।

बहुत सारे बाड़े और गलियारे इन अखाड़चियों की वजह से बेवजह अखाड़े बने हुए हैं जहाँ एक-दूसरे को पछाड़ने और नीचा दिखाकर खुद को  येन-केन-प्रकारेण स्थापित करने की जद्दोजहद इन बाड़ों की हमेशा की कल्चर बन गई है।

इन सभी अखाड़चियों और उस्तादों को पता है कि इन बाड़ों और गलियारों में उनकी मौजूदगी के दिन और वर्ष निर्धारित हैं, इन्हीं वर्षों में इन्हें समय गुजारकर कुछ कर दिखाना है मगर ये लोग अपने कर्मयोग में रमे रहने की बजाय उस्तादी, पहलवानी और अखाड़ची क्रियाकर्मों में लग जाते हैं।

कभी तेज आवाजों में चिल्लाने का दम-खम दिखाते हुए औरों पर पिल पड़ते हैं, हावी हो जाते हैं, कभी अपने आकाओं के दम पर बंदर-भालुओं की तरह उछलकूद करते हुए परिक्षेत्र गुंजा दिया करते हैं, कभी कठपुतलियों की तरह नाचने लगते हैं, कभी कोई शिकायती और नकारात्मक कारतूस निकाल कर ब्लेकमेलिंग करते हुए औरों को नीचा दिखाने और गिराने की हरचन्द कोशिश किया करते हैं, कभी खुद नंगे और बेशर्म होकर दूसरों पर कीचड़ उछालने लग जाते हैं।

कभी भूखे और प्यासे होते हैं तब भक्ष्य-अभक्ष्य सब कुछ खा जाने के लिए गिद्धों, सुअरों और श्वानों की तरह टूट पड़ते हैं, कभी चोर-डाकुओं, जेबतराशों और तस्करों की तरह व्यवहार करते हुए सब कुछ लूट लेने के लिए लपक पड़ते हैं।

सारे अखाड़चियों को लगता है कि पुराने जमाने के सारे के सारे अखाड़ों का बाड़ों और गलियारों के रूप में पुनः उद्भव हो चुका है जहाँ हर कोई अपनी ही शेखी बघारने का आदी है, अपनी हेंकड़ी, अहंकारों और मूँछहीन ताव के साथ पूँछ उठाकर ऎसे कैटवॉक करता है जैसे कि हिंसक जानवरों के लिए किसी ने मुफतिया अन्नक्षेत्र के दरवाजे खोल दिए हों।

बहुत सारे लोग हैं जिनके बारे में देखा, सुना और कहा जाता है कि ये कोई काम-धाम नहीं करते, मुफत का सब कुछ पा रहे हैं, धींगामस्ती कर रहे हैं और दर्शाते ऎसे हैं कि जैसे दुनिया में उनसे बड़ा और कोई धीर-गंभीर और शालीन कर्मयोगी हो ही नहीं।

जो लोग अपना निर्धारित कर्तव्य कर्म छोड़ कर अखाड़ची और उस्ताद बने हुए हैं उन्हीं नुगरे, नालायक और निकम्मों की वजह से समाज और देश की तरक्की बाधित हो रही है। हम अपने वतन के लिए चाहे कितने समर्पित होकर निष्ठा से काम करें, दिन-रात देश सेवा करते रहें, मगर हमारे आस-पास के अखाड़ची हैं ही ऎसे कि  इनकी वजह से समस्याओं के वटवृक्ष पनपते रहे हैं।

समाज और देश के लिए सर्वाधिक घातक ये ही लोग हैं जो न खुद ईमानदारी और निष्ठा से काम करते हैं, न औरों को करने देते हैं। अंधकार के प्रतीक ये लोग जहां दो-चार ही हों, वहाँ मनहूसियत और अंधकार का साया पसरने लगता है क्योंकि मूलतः ये लोग आसुरी परंपराओं का ही प्रतिनिधित्व करते हैं और इस कारण किसम-किसम के श्वानों की तरह अपनी छोटी-छोटी गलियों और बाड़ों को अखाड़ों के रूप में पहचान देते हुए शेर बने फिरते हैं।

जहां कहीं हम रहते या काम करते हैं, वहां कर्मस्थलों को अखाड़े न बनाएं, जितना समय मिला है ईमानदारी से काम करें, सेवा और परोपकार का दामन थामें। यह स्थिति लाएं कि जब इन बाड़ों से निवृत्ति का दिन आए तब लोग मुक्त कण्ठ से तारीफ ही करें।

यह न कहें कि इसी कमीन, बेईमान, शोषक, भ्रष्ट और खुदगर्ज इंसान की वजह से सारा माहौल बिगड़ा रहा, कार्यस्थलों का कबाड़ा करके रख दिया और कुछ अच्छा नहीं होने दिया। हर इंसान इससे परेशान ही रहा। अपने आपको इंसान के रूप में स्थापित करें, अखाड़ची, आवारा या धक्कामार के रूप में नहीं।

1 thought on “आवारा साण्डों की धमाल

  1. हम सब परेशान हैं बिगड़ैल साण्डों की धींगामस्ती से …

    इस लेख का संबंध किसी न किसी रूप में हम सभी से है। तसल्ली से पढ़ें और समाज, क्षेत्र तथा देश के सम-सामयिक हालातों से तुलना करें। हम सभी इस बात को स्वीकार करेंगे ही न केवल हमारा क्षेत्र बल्कि हम सभी लोग आवारा साण्डों से परेशान हैं।

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