वास्तु चर्चा – अभिशप्त होते हैं ऎसे भवन और परिसर

वास्तु चर्चा – अभिशप्त होते हैं ऎसे भवन और परिसर

धरती कभी खराब नहीं होती और न ही अशुद्ध होती है। इसे बिगाड़ने, अशुद्ध और प्रदूषित करने का काम इंसान ही करते हैं। वे सारे स्थल तब तक शुद्ध बने रहते हैं जब तक कि इंसान की पहुुंच वहां तक नहीं हो पाती है।

जैसे ही किसी स्थान पर इंसानी प्रजाति की कोई सी इकाई पहुंच जाती है वैसे ही उस स्थल का  बंटाढार होने लगता है। दिखने में भौतिक विकास और चकाचौंध का मंजर सामने हो सकता है लेकिन उस स्थान विशेष का ओज-तेज, पवित्रता, ऊर्जा और आलोक छीन जाता है।

हम सभी लोग इस बात को सच्चे दिल से स्वीकार करते ही हैं कि पहले जमाने के मकानों में रहने वालों को जितने भरपूर सुकून का अहसास होता था उतना आज के मकानों में नहीं मिल पाता, चाहे वे कितने ही आलीशान, बेशकीमती और बादलों से बातें करने वाले ही क्यों न हो।

दुनिया की सभी प्रकार की भोग-विलासी सुविधाएं, संसाधन और सेवादार उपलब्ध हों, सब कुछ होेते हुए भी इन गगनचुम्बी भवनों में शांति, सुकून, संतोष और आनंद प्राप्त नहीं हो पाता, कोई न कोई मानसिक या शारीरिक अथवा दोनों ही प्रकार की समस्याएं हमेशा बनी रहती हैं।

इसके लिए हर मामले में आज का इंसान ही जिम्मेदार है जिसकी वजह से भूमि व भवन प्रदूषित होते हैं और इनका खामियाजा वर्तमान के साथ ही आने वाली पीढ़ियों तक को भुगतना पड़ता है। भूमि शुद्धि के बिना बनाए गए भवन नाकारा सिद्ध होते हैं या समस्याओं से ग्रस्त। न भूमि पूजन ढंग से होता है, मुहूर्त पर। नेताओं के समय को देखकर होने वाले भूमिपूजन, शिलान्यास और उद्घाटन मुहूर्त की अवहेलना ही है और हमारे संसाधनों के अनुपयोगी पड़े रहने तथा दुर्घटनाओं का एक कारण यह भी है।

खाली भूखण्डों पर लगातार कचरा डलता रहता है, जहरीले जानवरों और अपराधियों का डेरा बना रहता है और इस प्रकार यह प्रदूषित और गन्दगी भरे स्थल दुष्ट आत्माओं के डेरे बन जाया करते हैं, भूमि में कई फीट नीचे तक प्रदूषित पानी और गंदगी का जमावड़ा हो जाता है।

इसके साथ ही होता यह है कि भवन निर्माण की सामग्री खुली पड़ी रहती है जिसमें कई तरह के जानवरों का मल-मूल, हड्डियाँ और मृत देह के अवशेष भी पड़े रहते हैं। इससे भी निर्माण सामग्री अशुद्ध हो जाती है और इससे बनने वाले भवनों में स्वाभाविक रूप से अपवित्रता का  वास रहता ही है।

इस वजह से भूमि के सात लोक नीचे और आसमान की ओर के सात लोकों में भूखण्ड की परिधि के अनुपात में ऊध्र्ववर्ती प्रभाव रहता है। इस कारण से प्रदूषित स्थल पर रहने वालों को न भूगर्भ के विभिन्न लोकों का सकारात्मक प्रभाव प्राप्त हो पाता है और न ही ऊपर के सात लोकों से कोई ऊर्जा प्राप्त हो पाती है।

ऎसे मलीन स्थलों पर चाहे कितने ही करोड़-अरब खर्च कर गगनचुम्बी इमारतें ही क्यों न खड़ी कर दी जाएं, इनमें सुकून, आलोक और दिव्यता का प्रभाव देखने में नहीं आ सकता। फिर यदि इनके निर्माण में एक इंच भी जमीन अतिक्रमण से हड़पी गई हो या किसी को धोखा देकर हासिल की हुई हो, तब भी इनमें रहने वाला सुखी नहीं रह सकता, समृद्ध रहने की बात तो दूर ही है।

ऎसे अतिक्रमणकारियों और जमीन-जायदाद हड़पने वालों का मंगल कुपित हो जाता है और वह जिन्दगी भर किसी न किसी तरह परेशान करता ही रहता है। इनकी हरामखोरी, पाप वृत्ति और छीना-झपटी की आदत के कारण दूसरे ग्रह भी कुपित बने रहते हैं।

इसी प्रकार जिन भवनों में शौचालय और मूत्रालय बदबूदार होते हैं, जिनमें जगह-जगह पान-गुटके की पीक फैली रहती है, टंकियों व नलों से बेवजह पानी रिसता रहता है, बिना काम के बिजली जलती रहती है,  सूर्य की पर्याप्त रोशनी होते हुए भी जहाँ बिजली की चकाचौंध बनी रहती है, जहाँ काम करने या रहने वाले लोग हमेशा जुगाली करते रहते हैं, जुगाली करते हुए मुँह से वार्तालाप किया करते हैं और अपने मुँह से शब्दों को दूषित व झूठे करके बाहर निकालते रहते हैं, जिनके घर के मुख्य द्वार पर रात में अंधेरा रहता है, परिसरों, कक्षों और बरामदों में गंदगी पसरी रहती है, ये सारे भवन इनमें रहने वाले लोगोंं की मूर्खता, पिशाचवृत्ति और दुष्टताओं के कारण अनिष्टकारी हो जाते हैं और इन भवनों का वास्तुदोष भगवान भी दूर नहीं कर सकता।

इनसे संबंधित लोग कभी यश प्राप्त नहीं कर पाते हैं।  इनमें रहने और काम करने वाले लोग हमेशा भिखारी और लूटेरों की तरह ही हिंसक और व्यभिचारी व्यवहार करते हैं चाहे वे कितने ही पैसे वाले क्यों न हों।

ये लोग जिन्दगी भर कौल्हू के बैल या नामी कोठे की वैश्याओं व कोठेदारों की तरह कमा-कमा कर धन जमा करते रहते हैं लेकिन अपने लिए इस धन का कोई उपयोग नहीं कर पाते हैं। इनके धन को बाद वाले लोग व्यसनों, अपराधों आदि में डूबे रहकर ठिकाने लगाया करते हैं।

जिन कार्यस्थलों का लोग आवास या रात्रि विश्राम के लिए इस्तेमाल करते हैं उन कार्यस्थलों मेंं जड़ता दोष व्याप्त हो जाता है और इसमें काम करने वाले सारे के सारे लोग आलसी, दरिद्री और प्रमादी ही बने रहते हैं। ऎसे कार्यस्थलों में आलस्य पसरा रहता है इस कारण से ये पूरी तरह अभिशप्त और बदनाम डेरों के रूप में कुख्यात ही बने रहते हैं।

अपने से संबंधित भवनों और परिसरों को सुकूनदायी और तेजस्वी बनाने के लिए यह जरूरी है कि हम इनकी साफ-सफाई पर पूरा ध्यान दें, व्यक्तिगत और स्थानगत शुचिता को देखें, सप्ताह में एक बार नमक या फिटकरी के पानी का पोंछा लगाएं, गौमूत्र का छिड़काव करें।

जो लोग अपने घरों में गाय पालते हैं उनके लिए सभी प्रकार के वास्तुदोष अपने आप समाप्त हो जाते है। जिस स्थल पर गौमूत्र का छिड़काव होता है अथवा गोबर से सफाई की जाती है उस स्थल पर भूमि सहित नीचे और ऊपर के सातों लोकों तक सीध में पवित्रता का घेरा बन जाता है और यह परमाणु विकिरण, दुष्ट शक्तियों तथा कुप्रभावों से बचाव करता है।

आजकल मल-मूत्र विसर्जित करने से रोकने के लिए हम गाय को डण्डा मारकर भगाने के आदी हो गए हैं और इस कारण हम गौमूत्र व गोबर के अचूक प्रभाव से वंचित होते जा रहे हैं। हम केवल भौतिक पदार्थों को ही सर्वस्व मानकर उनकी अंधी दौड़ में रमे हुए हैं और पाश्चात्य अंधे मूर्खों की नकल करते हुए खुद भी अंधे बने हुए हैं।

जीवन और जगत की ढेरों समस्याओं के पीछे भूमिगत दोष ही मूल कारण है जिसे आजकल धंधेबाज वास्तुशास्त्री भुनाने में लगे हुए हैं लेकिन कोई वास्तुदोषों के मूल मर्म को समझाने और बिना पैसे के उपाय बताने के प्रति कोई रुचि नहीं ले रहा।

अपने-अपने भवनों, कार्यस्थलों, खेत-खलिहानों, बाड़ों, परिसरों, गलियारों, दुकानों, प्रतिष्ठानों और अपने से संबंधित सभी स्थलों में शुचिता का पूरा-पूरा ध्यान रखने से ही हम जमीनी दोष से बचकर अपने कर्म को आसमानी सफलता प्रदान कर सकते हैं।

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