हर क्षण का करें उपयोग

समय ही पूरी दुनिया की वह धुरी है जिसके इर्द-गिर्द सृष्टि घूमती है और पिण्ड से लेकर ब्रह्माण्ड तक सभी कारक प्रभावित होते हैं। काल का अनवरत गतिमान चक्र न किसी का सगा होता है न दुश्मन। वह अपनी धुरी पर अनथक गतिमान है और रहेगा। न कोई इसे रोक सका है, न मनमाफिक चलाने का दुस्साहस कर सका है।

इस सत्य से वाकिफ होने के बावजूद लोग समय को मान नहीं देते, समय के साथ नहीं चल पाते, समय की उपेक्षा करते हैं। ध्रुव सत्य यही है कि आज का समय अपना है, आने वाली घड़ी या कल के बारे में कोई कुछ नहीं कह सकता कि क्या हो जाए।

ये लोग चाहते हैं कि समय उनके अनुरूप चले, और ऎसा हो पाना कभी संभव है ही नहीं। मनुष्य के रूप में संसार में अवतरण के उपरान्त एकमात्र समय ही वह सर्वोपरि कारक है जिसके बारे में हर जीवात्मा को सचेष्ट होकर इसका पूरा-पूरा उपयोग करना चाहिए क्योंकि मनुष्य जीवन ही ऎसा है जिसमें हम कर्म के माध्यम से आने वाले समय के प्रारब्ध और भाग्य का निर्माण कर सकते हैं। इसके अलावा दूसरी सारी योनियां केवल भोग पूर्णता के लिए  हैं, कर्म के माध्यम से ऊध्र्वगति पाने के लिए नहीं। यह हम पर निर्भर है कि हम ऊध्र्वरेता बनकर उच्चतर अवस्था और उच्चतम लोकों की यात्रा करें या फिर अधोगति की ओर गमन करें।

अधिकांश लोगों की जिन्दगी की असफलता का यही कारण है कि वे लोग समय के मोल को नहीं पहचानते हैं और इंसानी जीवन को केवल टाईमपास का पर्याय मानकर बैठे रहते हैं। जो समय को सम्मान नहीं देता, उसे समय भी तिरस्कृत कर देता है और जिसे समय नकार देता है, उपेक्षित कर देता है, उसका विधाता भी भला नहीं कर सकते।

 समय के मामले में लोगों की भिन्न-भिन्न आदतें हैं। कोई इसे सायास गुजारने के लिए मनोरंजन के मार्गों का सहारा लेते हैं, कोई यह मानते हैं कि जब तक मृत्यु न हो जाए तब तक जैसे-तैसे इस शरीर को घसीटना ही है। खूब सारे मानते हैं कि शरीर मिला है तो जमकर भोग करो, पता नहीं बाद में यह शरीर मिले न मिले। कुछ फीसदी लोग ही ऎसे होते हैं जो कि समय का पूरा-पूरा सदुपयोग करते हैं और कालजयी कीर्ति प्राप्त करते हैं।

जो समय के साथ नहीं चलता, समय के महत्व को अंगीकार नहीं करता, उसे समय ऎसा भुला देता है कि उसके रहते हुए भी, और जाने के बाद भी उसका नामलेवा तक कोई नहीं रहता। पता ही नहीं चलता कि ये लोग कब संसार में आए और कब चले गए।

बहुत थोड़े ही लोग ऎसे बचे होंगे जो कि समय के अनुशासन का पूरी तरह पालन करते हैं और अपने हर काम समय पर करते हैं, समय के साथ चलते हैं और वर्तमान समय के एक-एक सैकण्ड को मान देते हैं, उसका पूरा उपयोग करते हैं।

इनके अलावा में वे सारे लोग आ जाते हैं जो समय के मामले में अनुशासनहीन, उन्मुक्त और हद दर्जे के स्वेच्छाचारी हैं। ये लोग आलसी, प्रमादी और शैथिल्यग्रस्त होते हैं।

इनमें दो किस्मों के लोग हैं। एक प्रजाति उनकी है जिसे समय की पहचान नहीं है, समय के महत्व से अनभिज्ञ हैं और जीवन भर यही तनाव बना रहता है कि टाईमपास कैसे करें। ऎसे लोगों के पास करने को कुछ नहीं होता, जमाने भर की गंदगी के छिद्रान्वेषण और निन्दा के अलावा इनके जीवन में और कोई दूसरा काम होता ही नहीं।

ये लोग उन सभी विषयों और क्षेत्रों की तरफ ताक-झाँक करते हैं जिनसे इनका कोई लेना-देना नहीं होता। असल में यही वे लोग हैं जो समाज और परिवेश में गंदगी का परिवहन करते हुए प्रदूषण फैलाते रहते हैं। ये लोग जिस तरह की हरकतें करते हैं उसे देखकर यही लगता है कि ये अपने पिछले जनम में सूअर, गिद्ध या श्वानों की किसी प्रजातियों में कई सदियों तक रहे हाेंगे, तभी इनका स्वभाव जम गया है, तनिक भी नहीं बदला। इंसानी खोल पा जाने के बावजूद पुराने जन्मों की आदतें बरकरार हैं।

इन्हीं में काफी सारे लोग उन सभी कामों में रमे रहते हैं जिनका न इनकी जिन्दगी के लिए कोई उपयोग होता है, न समाज या देश के लिए। ऎसे लोग पृथ्वी पर वह अनचाहा बोझ हुआ करते हैं जिसे न इनके घरवाले पसन्द करते हैं, न सहकर्मी, मित्र और क्षेत्रवासी।

इनका जीना बस जीना ही है, और वह भी जैसे-तैसे जी लेना। ऎसे लोग हर कहीं भारी तादाद में देखने को मिल जाते हैं। आजकल इस प्रजाति के कचराढोलू और बतरसिया लोगों की जनसंख्या हर कहीं बढ़ी हुई दिख रही है। हर तरह के बाड़ों और गलियारों, तमाम तरह के आम और खास पथों, चौराहों, सर्कलों और तिराहों से लेकर नुक्कड़ों और फुटपाथों तक इस किस्म के अजीबोगरीब जन्तु आसानी से देखे जा सकते हैं।

इन्हीं की तरह के दूसरे लोग वे हैं जो समय के महत्व को अच्छी तरह जानते जरूर हैं लेकिन समय के अनुशासन का पालन नहीं कर पाते। ये लोग आलसी, दरिद्री और ढीले होते हैं इस कारण से समय की पाबंदी कभी नहीं रख पाते। इनका स्वभाव ही जिन्दगी भर के लिए ऎसा लापरवाह बन जाता है कि समय के प्रति कठोर नहीं रह पाते। समय उन सभी के साथ अत्यन्त भयानक और कठोर होता है जो समय के महत्व को तो स्वीकार करते हैं किन्तु उसका उपयोग करने में पीछे रह जाते हैं।

कोई काम-काज न हो, ठाले बैठे हों, तब भी ये समय पर नहीं पहुँच पाते, चाहे काम-धंधों का स्थान हो या अपना दफ्तर। ये लोग बेवक्त धरती पर पैदा हो गए लगते हैं तभी कोई काम समय पर नहीं कर पाते। खुद तो समय के पाबंद नहीं होते, बल्कि औरों को भी अपनी तरह ढीठ और बेशर्म बना डालते हैं। यही कारण है कि इस किस्म के लोगों के बीच घनिष्ठता और दोस्ती बहुत जल्दी हो जाती है।

ये लोग इतने आलसी और कामचोर रहते हैं कि कोई काम समय पर नहीं करते। इनके जीवन की सबसे बुरी आदत होती है कोई काम समय पर नहीं करना, समय की पाबन्दी के प्रति हमेशा बेपरवाह रहना और समय का अनादर करना।

इन सभी लोगों की यही आदत होती है कि जैसे-तैसे दिन गुजार लेना ताकि ज्यादा काम भी नहीं करना पड़े और हमारी मौजूदगी भी सुनिश्चित हो जाए। और जो मिलना है उसमें कहीं कोई कमी नहीं आए।

पता नहीं लोगों में बिना मेहनत के खाने की ये कैसी आदत पड़ गई है। ये लोग चाहते ही नहीं कुछ भी परिश्रम करना। मुफत में सब कुछ मिल जाए और जिन्दगी भर मजे करें। काम-धाम कुछ न करना पड़े, और आवक बढ़ती ही चली जाए। इसी उद्देश्य से ये लोग हर जगह कामचोरी के हथियार का इस्तेमाल कर माल जमा करते रहते हैं।

बहुत सारे नुगरों का यही खेल है जो अर्से से चल रहा है। देश की सबसे बड़ी समस्या आज यही है। न समय का मान रहा है, न समय प्रबन्धन का खयाल।  चाहे कितना कुछ कह डालो, खूब सारे नालायकों की भरमार है जो न समय पर आते हैं न कोई काम करते हैं और जाने की जल्दी हमेशा बनी रहती है।

कोई काम न हो तब भी घर में पड़े रहेंगे, खटिया तोड़ते रहेंगे, घर वालों से सेवा-चाकरी कराएंगे और उन्हें भी तंग करते रहेंगे। ये लोग बिना मेहनत किए कमाने-खाने  के साथ ही अपने आपको भले ही चतुर मानते रहें और यह दंभ भरते रहें कि दुनिया को मूर्ख बनाकर माल बना रहे और मौज मार रहे हैं लेकिन इन लोगों को शायद यह पता नहीं कि जिस प्राप्त समय का वे निरादर कर रहे हैं वह समय ही उनका चुपचाप किश्तों-किश्तों में क्षरण कर रहा है।

जो समय का उपयोग नहीं करता है, समय उन्हें खा जाता है। समय की पाबन्दी का संबंध हृदय के भावों से है।  बहुत से लोग हैं जिन्हें चाहे कितनी ही टोका जाए, उलाहना दिया जाए, निन्दा की जाए, लेकिन ये सुधरते नहीं। निर्लज्ज और बेशर्म लोग इतने ढीट होते हैं कि इन पर कोई असर नहीं होता। इनके लिए दण्डात्मक विधान ही हैं जो इनमें सुधार ला सकते हैं।

लेकिन बात यहीं आकर अटक जाती है कि दण्ड दे कौन? कारण साफ है कि अब लोगों में उतना माद्दा रहा ही नहीं कि राजधर्म और लोक धर्म का पालन खुद करें और दूसरों से करवाने का साहस रखें क्योंकि जिनके हाथ में दण्डात्मक विधान है वे भी कौन से दूध के धुले हुए हैं। इस बात को यह सारे कामचोर, भ्रष्ट और नालायक लोग अच्छी तरह जानते हैं इसलिए सब चल रहा है जैसा चलता रहा है।

समय की पाबन्दी के प्रति बेपरवाह लोगों के लिए सख्त दण्डात्मक कार्यवाही होनी चाहिए और वह भी ऎसी कि उसे आर्थिक दण्ड से दण्डित किया जाए, तभी कामचोरों, अनुशासहीनों और बेशर्म लोगों को अक्ल आ सकती है।

ऎसे लोगों की उपेक्षा या बचाव करना सीधे-सीधे देशद्रोह ही है क्योंकि इन्हीं कामचोरों और बिना परिश्रम के सारे भोग-विलास पा रहे लोगों के कारण देश की तरक्की  बाधित हो रही है।

अपने आस-पास भी ऎसे खूब सारे हरामखोर और कामचोर हैं जो न समय पर आते हैं, न काम करते हैं, उल्टे धरती पर बोझ की तरह ही हैं। ये सारे के सारे ‘काम के न काज के – ढाई मन  अनाज’ के हैं। ऎसे पुरुषार्थहीन लोगों के कारण से ही हमारा देश आगे नहीं बढ़ पा रहा है। जो लोग इन निकम्मों को प्रश्रय देते हैं वे भी पाप के भागी होते हैं।

1 thought on “हर क्षण का करें उपयोग

  1. यों तो तय है इहलोक और परलोक दोनों का बिगड़ना ..

    इंसान को ज्ञान और विवेक के कारण से ही बुद्धिशाली जीव माना गया है लेकिन हमारी स्थिति यह है कि हम सब कुछ जानते-बूझते हुए भी दरिद्रता, आलस्य, प्रमाद और आरामतलबी स्वभाव के कारण वर्तमान के करणीय कर्तव्यों के प्रति जानबूझकर उदासीन रहते हैं और यही हमारी तमाम असफलताओं, अभावों और दुर्भाग्य का मूल कारण है।
    समय की डोर को पक्की तरह पकड़ कर जो लोग चलते हैं उनका वर्तमान भी सुधर जाता है और भविष्य भी। यही नहीं इहलोक के श्रेष्ठ कर्म और उच्चावस्था भरी सोच के कारण आने वाले जन्म भी अच्छे और ऊध्र्वगामी होते हैं। लेकिन इसके लिए समय को सम्मान देना ही पड़ेगा।
    समय किसी का सगा नहीं होता। युगों-युगों से यह समय साक्षी रहा है अनगिनत महापरिवर्तनों का, उत्थान और प्रलय का, सृजन और संहार का। हम बार-बार किसी न किसी स्वरूप में पैदा होते रहे हैं फिर भी अब तक जीवात्मा के मूल कल्याणकारी स्रोत समय को नहीं जान पाए हैं।
    हममें से अधिकांश लोग हैं जो वर्तमान समय के महत्व को नहीं जानते या कि जानते हुए भी उसका सायास निरादर करते हैं, उपेक्षा का भाव अपनाते हैं और अपने ही भोग-विलास में रमे रहकर समय को यों ही बिना किसी उपलब्धि के गुजारने मेें जुटे रहकर टाईमपास जिन्दगी जीने के आदी हो गए हैं।
    अपने गुजारे हुए समय यानि की भूतकाल के समग्र कालखण्ड पर एक बार पूरी ईमानदारी से गहन चिन्तन करें तो पता चलेगा कि समझदार होने के बाद से लेकर अब तक अमूल्य समय को यों ही गँवा दिया, कुछ नहीं कर पाए।
    अब भी समय है। जितनी जिन्दगी बची-खुची रह गई है, वह भी कोई कम नहीं है। चेत जाएं और समय का मान करते हुए हर पल का सदुपयोग करें, अपने लिए जियें, समाज और देश के लिए कुछ करें और यह प्रयास करें कि हर दिन कुछ न कुछ नई उपलब्धि या आत्मतोष के साथ बीते और अगले दिन इस बात का संतोष रहे कि बीत गया कल बहुत कुछ नहीं तो कुछ तो दे ही गया है।
    यह ध्यान रखें कि यही हमारा अंतिम जन्म नहीं है। प्रारब्ध कर्मों को भोगे बिना न भगवान मिलने वाले हैं, न गति-मुक्ति संभव है।
    सारभूत बात यही है कि अनमोल समय को पहचानें और निरन्तर प्रगतिगामी व्यक्तित्व के रूप में आत्म कल्याण तथा जीवों एवं जगत के उत्थान के लिए इसका पूरा-पूरा उपयोग करें।

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