यूज करो और भूल जाओ

यूज करो और भूल जाओ

हर इंसान काम का है। कोई अच्छे काम में मददगार हो सकता है तो कोई बुरे काम में।  हर फसल के साथ हर तरह की खरपतवार भी होती है और हर उद्यान में सुगंधित पुष्पों के साथ निर्गन्ध वनस्पति भी होती है। इन सभी का अपना कोई न कोई उपयोग होता ही है।

आजकल इंसान में इतनी अधिक और अतिरिक्त अनचाही काबिलियत आ गई है कि वह चाहे जिसका उपयोग अपने लाभ के लिए, अपने हक में पूरी मनमानी के साथ कर सकता है और उपयोग पूरा हो जाने के बाद धत्ता दिखा कर इस तरह उछाल कर दूर फेंक देता है अथवा उपेक्षित कर दिया करता है जैसे कि वह उसे जानता तक न हो।

उपयोगी होना बहुत ही अच्छी बात है लेकिन किसी के भी हाथों की कठपुतली बनकर उपयोग में आ जाना अपने मौलिक गुणधर्म, परम्परा और स्वाभिमान के खिलाफ है।

दुनिया में बहुत से लोग हैं जो अपनी अतिरिक्त क्षमताओं, विशिष्ट और विलक्षण प्रतिभा-हुनर और उपयोगिता की दृष्टि से अन्यतम रहे हैं। इनमें मानवीय संवेदना, औदार्य और सेवा भावना कूट-कूट कर भरी होने के कारण इनका अतिशय दोहन इतना अधिक होता रहा है कि जिसे शोषण की संज्ञा सहर्ष दी जा सकती है।

उपयोग और उपयोगिता को अपने हक में भुनाने वालों की दुनिया में कहीं कोई कमी नहीं है और इसलिए यूज करना भी अपने आप में कला और विज्ञान की श्रेणी में आ गया है।

आजकल जो औरों को अपने लाभ के लिए जितना अधिक उपयोग करने की दक्षता रखता है, वही शातिर इन्सान औरों के मुकाबले रेस में आगे बढ़ जाता है।

जो लोग मानवीय संवेदनाओं और दूसरों की पीड़ाओं, दर्द तथा मनःस्थिति को समझते हैं वे सारे के सारे लोग मौजूदा युगीन दौड़ में बिना किसी गलती या कमजोरी के पिछड़ कर रह जाते हैं।

आजकल उपयोग में आ जाने वाले सीधे-सादे और सरलमना लोगों की भी कोई कमी नहीं है और इनका उपयोग कर लेने में माहिर शातिरों की भी कोई कमी नहीं है।

एक अनपढ़ या कम पढ़ा लिया इन्सान हर किसी आम आदमी के दर्द को समझता है और मानवीय पक्ष सामने रखकर सारे व्यवहार निभाता है लेकिन जो इन्सान जितने अधिक पढ़-लिख जाते हैं उनमें से कुछ बिरलों को छोड़ दिया जाए तो शेष सारे ही खुदगर्ज, चतुर और स्वार्थी किस्म के हो जाते हैं और इन लोगों को अपने सिवा और कोई नज़र आता ही नहीं।

न घर-परिवार और कुटुम्ब वाले दिखते हैं और न ही स्वजन, समाजजन और क्षेत्रजन। देश की बात करना तो बेमानी ही है इनके आगे। अतीत से लेकर अब तक प्रतिभाओं और विलक्षण व्यक्तित्वों का यूज करने वालोें की कोई कमी नहीं रही है।

इनका एकमेव काम यही है कि इंसान का मनचाहा यूज करते रहो और इसके बाद गुमनामी में जीने के लिए कहीं उछाल दो अथवा उसे उपेक्षित दीर्घा में डाल दो।

अपने आपको बुद्धिजीवी मानने वाले चतुर बुद्धिबेचकों का यूज एण्ड थ्रो के सिद्धान्तों से भरा यह कारोबारी तंत्र हर युग में प्रभावी रहा है। इसका शिकार बेचारे वे लोग होते रहे हैं जिन्हें हम विद्वान, मर्मज्ञ और जानकार मानते रहे हैं।

लोग बड़े ही प्रेम से आदर-सम्मान, स्वागत, अभिनंदन और पुरस्कारों आदि के लोभ-लालच से इन्हें रिझाकर इनसे काम लेते-लिवाते रहते हैं और अपने स्वार्थ पूरे हो जाने के बाद इन्हें धकिया देते हैं। कोई इन्हें नहीं पूछता कि उनकी भी कोई ख्वाहिश या स्वप्न है कि नहीं, जिसे कि पूरा किया जा सके।

अतीत में बहुत बड़े-बड़े विद्वजन, गुरु परंपरा के मर्मज्ञ और समाज-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अप्रतिम मेधा-प्रज्ञा सम्पन्न लोगों का यही हश्र हुआ है। हर बार से भोलेपन और लिहाज में आकर किसी न किसी के साथ जुड़ जाते हैं लेकिन बाद में उन्हें महसूस होता है कि ठगे गए। और इस कारण से इनके जीवन मेें सोचे गए काम और स्वप्न तक पूरे नहीं हो पाते और वह भी उन शातिरों के कारण जिनमें न मानवीय संवेदना होती है, न मानवता।

बुद्धिबेचक ठगों का तंत्र हर तरफ पसरा हुआ उछाले मार रहा है और इसका यही काम रह गया है कि समाज में जो लोग काम आ सकते हैं, उन्हें भरमाकर उनका पूरा-पूरा उपयोग कर लें और उसके बाद इन्हें किसी कोने में धकिया कर दूसरों की तलाश आरंभ कर दें।

कलियुग में इंसानियत का ग्राफ जितना नीचे गिरता जा रहा है इन शातिर ठगों की तिलस्मी बातों में आकर भोले-भाले लोग अधिक संख्या में फँसते चले जा रहे हैं। उन विद्वानों की गिनती तक नहीं की जा सकती जो कि अपनी विद्वत्ता और सहज-सरल व्यक्तित्व के कारण से हमेशा उपयोग में लिए जाते रहे और बाद में इन्हें सच्चे दिल से अहसास हुआ कि ठगे गए।

समाज, क्षेत्र और देश के लिए उपयोगी बनी विलक्षण प्रतिभाओं को हमेशा यह टीस बनी रहती है कि हम कहीं न कहीं ठगे गए हैं और ठगों के शिकार हुए हैं। मजे की बात यह है कि ये ठग कहीं विदेशों या बाहर से नहीं आए हैं बल्कि हमारे आस-पास भी इन ठगों का बाहुल्य है। और ये ठग हर बार नए चोले में फबते हुए इस कदर सामने आते रहते हैं जैसे कि भिखारियों और उचक्कों की कोई विचित्र वेशभूषा प्रतिस्पर्धा हो रही हो।

आजकल यूज एण्ड थ्रो का जमाना है और इसे और कोई स्वीकार कर पाए या नहीं, मगर आज के इंसान ने इस महामंत्र को अपने जेहन में गहरे तक उतार रखा है। उसे जिओ और जीने दो में विश्वास नहीं है बल्कि उसका जीवन लक्ष्य ही हो गया है कि खुद मौज-मस्ती से जिओ, चाहे दूसरों की मौत ही क्यों न हो जाए।

अपनी उपयोगिता स्वयं सिद्ध करने की कोशिश की जानी चाहिए न कि औरों के भरोसे अपनी प्रतिभाओं का लोहा मनवाने की। अपनी प्रतिभाओं का प्रचार-प्रसार और उत्कर्ष अपने आत्मप्रयासों से होने पर ही कालजयी यश और सफलता हासिल हो सकती है, इस मूल मंत्र को आत्मसात कर यदि समाज और देश के लिए अपनी उपयोगिता सिद्ध करने की कोशिश की जाए तो न हमें कोई यूज कर पाएगा, न थ्रो।

यूज एण्ड थ्रो की कुटिल और खुदगर्ज मानसिकता वाले लोगाें को पहचानें और उनसे यथोचित दूरी बनाए रखें, इसी में हम सभी का भला है। अपनी प्रतिभाएं रिश्वतखोर लुटेरों, भिखारियों और दस्युओं के लिए नहीं हैं बल्कि मातृभूमि की सेवा के लिए हैं। अपने कर्म की उपयोगिता के लिए सबसे पहले पात्रता का विचार करना आज की सबसे बड़ी और अनिवार्य शर्त है।