निश्छल हो वही प्रेम बाकी सब कारोबार

दुनिया में हर मामले में दो ही ध्रुवों पर सांसारिक मायाचक्र का निरंतर परिभ्रमण होता रहता है। दोनों ही ध्रुव एक-दूसरे के विपरीत हुआ करते हैं। व्यक्ति अपनी मानसिकता के अनुरूप इन्हें अंगीकार करता है और जीवन निर्माण में उत्प्रेरक या सहभागी मानकर पूर्ण साहचर्य के साथ अपनी जीवनयात्रा को आगे बढ़ाता रहता है।

इन्हीं में या तो पे्रम होता है अथवा दुश्मनी। कोई मित्र होता है और कोई या शत्रु। लेकिन एक उस स्थिति वाले लोग भी होते हैं जो न किसी के शत्रु होते हैं, न मित्र। ऎसे लोग तटस्थ हुआ करते हैं। इन सभी प्रकार के लोगों में मुख्य रूप से दो प्रकार के लोग होते हैं। परस्पर प्रेम करने वाले होंगे या आपस में द्वेष रखने वाले।

सारी दुनिया इन दो पालों में ध्रुवीकृत होती है। जिन लोगों में प्रेम होता है, जिनके हृदय में ईश्वर या आनंद भरा होता है वे पूर्णता के साथ प्रेम करते हैं जबकि जिन लोगों के मन में मालिन्य होता है, हृदय प्रदूषणों से भरा होता है, आसुरी भावों के साथ जीने को ही जिन्दगी का अहम सच मानते हैं उन लोगों के मन में कूट-कूट कर द्वेष भरा होता है और इन लोगों के लिए वह हर इंसान दुश्मन है जो उनके काम नहीं आता या उनकी बातों को स्वीकार नहीं करता।

प्रेम का अर्थ व्यष्टि और समष्टि के प्रत्येक कारक को प्रभावित करता है। जहाँ प्रेम होगा वहाँ से जड़ता समाप्त होकर जीवंतता आ जाती है और हर कर्म ईश्वर की आराधना का हिस्सा हो जाता है। प्रेम किसी दैहिक संबंध का नाम नहीं है बल्कि पारस्परिक कल्याण की संवेदनाओं की वह परिभाषा है जिसमें इस एक शब्द के माध्यम से ही सृष्टि को आनंददायी रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

प्रेम किसी आडम्बर या पाखण्ड का नाम नहीं है बल्कि वह सनातन प्रवाह है जिसमें नहाने वाला भी मौज-मस्ती और शाश्वत आनंद में डूब जाता है, और द्रष्टा भी आनंद के महासागर में गोते लगाने लग जाता है। फिर प्रकृति तो इस प्रेम शब्द से ही पुलकित हो ऊर्जाओं के जाने कितने समंदरों में ज्वार उमड़ा दिया  करती है।

इंसान के लिए दो ही रास्ते हैं – प्रेम करे या फिर दुश्मनी। इनमें से दुश्मनी के मार्ग को सदियों से इंसान के लिए वज्र्य माना जाता रहा है। फिर बचता है सिर्फ प्रेम। इस प्रेम को पाने, प्रेम प्रदान करने और इसका अनुभव करते-कराते हुए आनंद की प्राप्ति और इससे ईश्वर को अपने भीतर अनुभव करने वाला ही सच्चा और वास्तविक प्रेमी होता है।

इस प्रेम को शब्दों, मुद्राओं, भाव-भंगिमाओं या देहिक क्रियाओं में विभक्त नहीं किया जा सकता बल्कि प्रेम को आनंद का पर्याय मानते हुए चरम उल्लास की अनुभूति की जा सकती है। प्रेम ऎसा कारक है जिसे अंगीकार कर लेने वाला खुद भी मुक्त हो जाता है और अपने संपर्क में आने वाले दूसरे सभी लोगों की भी मुक्ति चाहने के लिए हर क्षण सर्वस्व समर्पण को तैयार रहता है।

प्रेम के मूल मर्म को समझ लेने वाला इंसान दुनिया में किसी भी एक से प्रेम करता है तो असली प्रेम वही है जिसमें व्यक्ति सभी से प्रेम करे, चाहे वह जड़-चेतन कुछ भी क्यों न हो, ईश्वर या इंसान, पशु आदि कोई भी हो सकता है। सच्चे और निश्छल प्रेमी का प्रेम उदात्त भाव के उत्कर्ष को जीता है और सार्वजनीन होता है। ऎसे इंसान के लिए जड़-चेतन सभी कुछ प्रेम से परिपूर्ण होता है।

जो एक से प्रेम करता है उसका प्रेम यदि सच्चा होता है तो ही वह सभी से प्रेम करता है। वास्तविक प्रेम करने वाला इंसान किसी दूसरे से कभी घृणा कर ही नहीं सकता।  दूसरी तरफ जो लोग किसी एक से प्रेम करते हैं और दूसरों के प्रति संवेदनशील नहीं रह पाते अथवा दूसरों से घृणा या शत्रुता भाव रखते हैं वे सच्चे प्रेमी कभी नहीं हो सकते हैं।

दुनिया की बहुत बड़ी आबादी उन लोगों से भरी पड़ी है जो कि अपने आपको प्रेम करने वालों की श्रेणी में तो रखते हैं लेकिन प्रेम के मर्म से अनभिज्ञ होते हैं। खूब सारी भीड़ है जो किसी न किसी से प्रेम करती है लेकिन इस प्रेम के चक्कर में ही औरों की घृणा, द्वेष या दुश्मनी का पात्र बन जाती है और प्रेम को भुला बैठती है।

असल में यह प्रेम है ही नहीं। प्रेम के साथ संवेदनशीलता, करुणा, आत्मीयता और औदार्य के भावों का सम्मिश्रण रहता है न कि मोह, शत्रुता और एकाधिकार का।

जो एक से प्रेम करता है तथा अन्यों से प्रेमपूर्वक व्यवहार न करे तो इसका सीधा सा अर्थ यही है कि उसका प्रेम आडम्बर और स्वार्थ के व्यापार से ज्यादा कुछ नहीं है। ऎसा प्रेमी जिससे प्रेम करता है उससे भी उसका संबंध स्वार्थ से ज्यादा कुछ नहीं होता बल्कि ऎसा व्यवहार प्रेम नहीं बल्कि बिजनैस की श्रेणी में आता है  और इसे प्रेम की संज्ञा नहीं दी जा सकती। शाश्वत प्रेम वही है जो किसी एक से बंधा नहीं रहकर जड़-चेतन सभी पर समान रूप से प्रतिभासित हो और सभी को प्रेम का आनंद अनुभव होता रहे।

प्रेम में परिपूर्ण और गोते लगाने वाला इंसान किसी एक से मोहग्रस्त नहीं होता, बंधता नहीं, बल्कि जिस किसी के सम्पर्क में आता है उसे लगता है कि आत्मीयता और प्रेम का जो निश्छल व्यवहार उसे प्राप्त हो रहा है, वह अपने आपमें अन्यतम और अद्वितीय है।

प्रेम की दिशा आक्षितिज आनंद पाती और दिलाती है तथा उसकी कोई सीमा नहीं होती।  प्रेम अपार और अथाह आनंद की अनुभूति कराता है और ऎसे प्रेम के प्रति न किसी को द्वेष होता है, न मोह या शत्रुता का भाव। अठारहवीं सदी के विश्व संत और त्रिकालज्ञ संत मावजी महाराज तो प्रेेम को सर्वोपरि कारक और ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बताते हुए बोध वाक्य रच गए – प्रेम तु ही ने प्रेम स्वामी प्रेम त्यां परमेश्वरो।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *