वरना लुट जाएगा सब कुछ

करेंसी बदलने से आहत और व्यथित हम सभी लोगों ने इन दिनों जबर्दस्त हायतौबा मचा रखी है। बहुत कम लोग ही होंगे जो धैर्यवान बने हुए मितव्ययता से दिन काट रहे हैं अन्यथा हर तरफ ऎसा माहौल हो गया है जैसे कि दुनिया खतरे में पड़ गई हो और ऎसा कुछ अनहोना हो गया है जो भूतकाल में कभी नहीं हुआ हो।

संकट के समय धीर-गंभीर और संयमित होकर जीने का अभ्यास हम सभी ने त्याग दिया है और यही कारण है कि हम सारे लोग आरामतलबी होकर सुविधाभोगियों के रूप में जीवन निर्वाह के आदी हो गए हैं जहाँ हमें सारी सुख-सुविधाएं और भरपूर भोग-विलास चाहिएं लेकिन इनके लिए न आत्मसंयम का अभ्यास है न धैर्य के साथ सब कुछ देखने-सुनने और समझ कर सहज होने का ।

पूरा का पूरा देश जैसे कि इतना असहज हो गया है कि कुछ कहा नहीं जा सकता। कई सारे लोग पगलाए हुए हैं, बहुत से महान और बड़े कहे जाने वाले लोकप्रिय लोग रोजाना अपने बयानों से नित नया बखेड़ा खड़ा करने की हरचन्द कोशिश कर रहे हैं।

जब एक करेंसी बदलने में यह हालत है तो उन लोगों से पूछिये जिन्होंने विभाजन के काल का महासंघर्ष देखा-भुगता है और इतना कुछ खो दिया है कि जो वापस नहीं आ सकता। इसका दंश वे हजारों-लाखों लोग आज तक भुगत रहे हैं। आपातकाल के हालातों के बारे में सोचिये। मुगलों और अंग्रेजों की गुलामी के वक्त की बर्बर कहानियों को सुनें जब कितनी अधिक बर्बरता का माहौल रहा।

उन सैनिकों को देखियें, उनके बारे में जानिये, जो कि सीमाओं पर शून्य से कई डिग्री नीचे और कहीं 55 डिग्री तक के तापमान में रेगिस्तानी सरहदों पर डटे हुए घर-परिवार और अपने गांव-शहर से  दूर रहकर हमारे देश की हिफाजत का दायित्व निभा रहे हैं।

उन गरीबों को देखें जो दो वक्त की रोटी के लिए खून-पसीना बहा रहे हैं फिर भी परिवार की गाड़ी नहीं चला पा रहे हैं। उन लोगों की ओर देखें जो अभावों में जीते हुए अपने जीवन को नारकीय अभिशाप ही मान बैठे हैं, जिन्हें एक वक्त की रोटी भी नसीब नहीं है।

और हम हैं कि सब कुछ होते हुए भी केवल कुछ दिन के करेंसी संकट से रूबरू होने में ही चिल्लपों मचाने लगे हैं,  थोड़ा धूप में क्या खड़ा होना पड़ रहा है, लाईन में क्या लगना पड़ गया, नानी याद आ गई है।

यह ठीक बात है कि कुछ लोगों के सामने रुपये-पैसों का संकट खड़ा हो गया है लेकिन पूरे धैर्य के साथ देश का साथ देना होगा।

बहुत से लोग तो आशंकाओं में जीते हुए सब कुछ आज ही कर लेना चाहते हैं। बात करेंसी की ही क्यों करें, नमक का झूठा संकट बताकर हमें छला गया और हम पागलों की तरह दौड़ पड़े नमक जमा करने।

कल कोई यह कह देगा कि जहर पर पूर्ण पाबंदी लगने वाली है, तो हम सारे काम-धाम छोड़कर जहर खरीदने ही निकल पड़ेंगे, यह सोचकर कि पता नहीं किसी को ठिकाने लगाने के लिए कब जहर की जरूरत ही पड़ जाए।

इन सभी प्रकार की स्थितियों के बीच करेंसी से जुड़ी सम सामयिक समस्याओं को समझने के लिए हमें राष्ट्रीय चरित्र और देश भक्ति की निगाह से सोचना होगा।  पड़ोसी देशों की ओर से करोड़ों रुपए मूल्य के नकली नोटों की खेपें पहले ही भारत पहुंच चुकी हैं, आतंकवादियों को इन्हीं बड़े-बड़े नोटों की फण्डिंग अपराधियों व आतंकी संगठनों द्वारा होती है, देश को लूटने वाले लोग इन्हीं नोटों के सहारे अहंकार और पॉवर से भर कर हम पर शोषण करते हैं, अत्याचार ढाते हैं और इसी मुद्रा के दम पर बंदरिया उछलकूद करते हुए देश को समस्याओं में धकेलते हैं।

इन सभी किस्मों के हरामखोरों और देशद्रोहियों के लिए यह काला धन ही वह हथियार है जिसके सहारे ये लोगों को चलाते हैं।  देश के खूब सारे झूठन और खुरचन चाटकर पेट भरने और दुम हिलाने वाले पालतु और फालतू लोग इन्हीं आकाओं की आवाज पर नापाक कारनामे, अपराध और भ्रष्टाचार कारित करते रहे हैं।

किसी को यह बताने की जरूरत नहीं है कि देश में वे कौनसे लोग हैं जिनके पास संग्रह ही संग्रह करने की मनोवृत्ति है, उनका कुछ भी देश के काम नहीं आता, सिवाय झूठी और मक्कार जबान के।

इनमें ये बहुत से लोगों को हम पूज्य, लोकप्रिय, सम्माननीय, आदरणीय और मंचीय-लंचीय मानकर सम्मान देते रहे हैं। समाज के लिए बातें करने वाले बहुत से लोग हैं लेकिन समाज के दीन-हीन व्यक्ति के लिए मददगार बनने में इनकी कभी कोई रुचि नहीं रही।

यानि कुल मिलाकर हमारे देश का पैसा उन लोगों के यहां नज़रबंद हो गया था जो लोग अपने आपको दूसरों से सुपर-डुपर समझ रहे थे या फिर आतंकवादियों और अपराधियों के यहाँ। यह पैसा देश या देशवासियों के किसी काम का था ही नहीं।

इसी कालेधन से ये लोग घातक हथियार खरीदते रहे हैं, देश की अर्थव्यवस्था को चौपट कर रहे हैं, गरीब और अमीर के बीच की खाई को निरन्तर चौड़ा और गहरा करते हुए सामाजिक और राष्ट्रीय असमानता पैदा कर रहे हैं, बेनामी सम्पत्ति और जमीनें खरीद कर गरीबों के हक मार रहे हैं, पैसों की लोभ-लालच में अपने आपको संप्रभु मानकर लोगों पर अन्याय, अत्याचार ढाते हुए शोषण कर रहे हैं।

कर्मनिष्ठ, समर्पित और ईमानदार देशवासियों पर चौतरफा हमले करवा रहे हैं और परोक्ष-अपरोक्ष रूप से समाज और देश को इतना अधिक नुकसान पहुंचा रहे हैं कि इसकी व्याख्या तक करना पाप है।

और कहीं न जाएं, अपने ही इलाके में अपने आस-पास के लोगों को देख लीजिएं। इनमें से बहुत से लोग देखते ही देखते समृद्ध बन गए जबकि उनमें हमसे भी कम प्रतिभा या हुनर था और बहुत से लोग तो भौंदू, बुद्धू , मंदबुद्धि और गुण्डे-बदमाश तक माने जाते हैं।

इन सभी लोगों के यकायक वैभवशाली होने का राज जानने की कोशिश करें तो यही सामने आएगा कि ये लोग रिश्वतखोरी, बड़े लोगों की चापलुसी और सेवा से दलाली, भ्रष्टाचार, कमीशनबाजी और गलत-सलत धंधों को अपना कर ही इतने महान, बड़े और वैभवशाली बन गए।

इनमें इतना अधिक अहंकार आ गया है कि इन्हें धर्म, सत्य, नीति, समाज और सिद्धान्तों से कोई सरोकार नहीं है। केवल लूटना, धौंस जमाना, वीआईपी बने फिरना और आपराधिक कृत्य करते हुए भी अपने आपको धर्मात्मा साबित करना ही इनकी जिन्दगी होकर रह गया है।

किसी गरीब को इन्होंने कभी धेले भर की कोई मदद दी हो, कोई नहीं कह सकता। कालेधन और जमाखोरी ने समाज और देश को समस्याओं के भंवर में उलझा रखा था और इससे मुक्ति दिलाने के लिए जो चमत्कार प्रधानमंत्री मोदी ने दिखा दिया है वह इन लोगों पर लगातार आसमानी बिजली की तरह कहर बरपाने लगा है और इसी वजह से ये सारे हतप्रभ होकर बदहवास हो गए हैं।

गनीमत है कि करेंसी परिवर्तन से केवल हमारी पारिवारिक और घरेलू मौद्रिक व्यवस्था पर ही असर हुआ है, अन्यथा अभी यह नहीं होता तो कुछ समय बाद यही कालाधन आतंकवादियों और अपराधियों का सहयोग कर घातक अस्त्र-शस्त्रों के रूप में हमारे सामने होता, तब न केवल रुपए-पैसों की ही समस्या सामने होती बल्कि हमारी बस्तियां बमों के धमाकों से हिल जाती, हजारों-लाखों लोग आतंकी हमलों में तबाह हो जाते, देश सुलग उठता और नापाक पड़ोसियों के मंसूबे सफल  हो जाते।

न समाज की शांति की कल्पना संभव थी, न राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की रक्षा कर पाना। रक्तबीजों को खत्म करना कोई मामूली बात नहीं है।

जो हो रहा है वह देश के समग्र हित में हो रहा है। या तो छोटे नुकसान या परेशानियों के लिए तैयार रहकर देश के लिए जीने का माद्दा पैदा करें या फिर हमेशा-हमेशा के लिए तबाह हो जाने के लिए भोग-विलास और आनंद में डूबकर आने वाले समय की प्रतीक्षा करें।