ले डूबेगी ये कृतघ्नता, नालायक वंशज हैं हम

हम सभी लोग उस युग में पहुंच चुके हैं जहाँ सेवा, परोपकार और कृतज्ञता ज्ञापन की मनोवृत्ति और अवसर भुला बैठे हैं और इनसे जुड़े हुए तमाम नैतिक मूल्य तिरोहित होते जा रहे हैं या यों कहें कि अस्तित्वहीनता की डगर पर तेजी से बढ़ते जा रहे हैं।

हालात ये हैं कि हम लोग भोग-विलास भरी जिन्दगी, मुफतिया खान-पान और ऎशो-आराम से लेकर उदासीनता के उस कगार पर पहुंच चुके हैं जहाँ हमें सिर्फ और सिर्फ अपने से ही मतलब रह गया है।

हमारे माता-पिता, भाई-बहन और बड़े-बुजुर्गों, गुरुजनों, आत्मीय स्वजनों, सहयोगियों से लेकर घर-परिवार वालों से भी हमारा दिखावटी रिश्ता रह गया है। हमें उनकी भी परवाह नहीं है कि वे किस स्थिति में जी रहे हैं, उनकी क्या समस्या है, कौनसे अभाव हैं और उन्हें क्या चाहिए।

हम अव्वल दर्जे के खुदगर्ज, मौकापरस्त और मतलबी लोगों को वैयक्तिक लाभ-हानि की गणित से ही फुर्सत नहीं है, जीवन और जगत में मायावी पदार्थों और व्यक्तियों के प्रति आकर्षण में इतने रमे हुए हैं कि टाईम तक नहीं है औरों या अपनों के बारे में सोचने का।

हमारे माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी आदि पुरखों ने जिस लहू से हमें सींच कर बड़ा किया, पाल-पोस कर लायक बनाया, उनके बारे में सोचने, उनके गुणों और विलक्षण व्यक्तित्व के बारे में जानने, औरों को बताने, उनके ज्ञान और अनुभवों को जगत तथा दूसरे जीवों तक शेयर करने और उनकी शिक्षा-दीक्षा को अपनाते हुए अपने व्यक्तित्व विकास को सुघड़ दिशा-दृष्टि देने के प्रति हम हमेशा लापरवाह रहे हैं। 

हमसे दुनिया जहान की बातें करवा लो, चाहे जिसकी मक्खनबाजी, अंधानुचरी, जयगान और परिक्रमा करवा लो, जीभ के स्वाद और पेट पूजा के साथ जेब भराई कोई करवाता रहे तो हम मरते दम तक उनके पालतु कुत्तों और गधों की तरह जिन्दगी न्यौछावर कर दें लेकिन अपनों के बारे में न हम कभी चर्चा करते हैं, न उनकी महिमा का कीर्तिगान करते हैं और न ही उनके बारे में लिखने की कभी कोशिश करते हैं।

जबकि आज हम जो भी कुछ हैं उन्हीं की देन है। उन पुरखों ने ही हमें बनाया और आगे बढ़ाया है। आज फेसबुक, ट्वीटर, व्हाट्सअप आदि सभी प्रकार के सोशल मीडिया पर हम रोजाना अपना कीमती समय फालतू के कामों, रूटीन के संदेशों और अनुपयोगी सामग्री के आयात-निर्यात व परिवहन में जाया कर रहे हैं लेकिन हमें अपने पुरखों या बुजुर्गों के बारे में लिखने की कभी इच्छा जागृत नहीं होती।

हम सभी लोग आजकल प्रत्यक्ष लाभ और सम्मान, अभिनंदन व पुरस्कार पाने के लिए दिन-रात उतावले रहते हैं और इसलिए उन्हीं कामों की तरफ हमारा ध्यान है जिनमें तत्काल फल की प्राप्ति हो।

इससे भी अधिक उन व्यवहारों पर हमारा ध्यान अधिक केन्दि्रत है जिनमें काम कोई दूसरा करे, और इसका लाभ तथा श्रेय हमको प्राप्त होता रहे या फिर काम कम करना पड़े और लाभ एवं लोकप्रियता हजार गुना।

हम यदि समाज और देश की तरक्की चाहें तो हमें सबसे पहले अपने इतिहास की गौरव गाथाओं के साथ ही अपने पुरखों के जीवन से संबंधित ज्ञान और अनुभवों से भरे विशिष्ट प्रयोगों, संस्मरणों, खासियतों, हुनर और विलक्षण व्यक्तित्व के सभी पक्षों पर जानकारी एकत्र कर इसे अपने क्षेत्र और दुनिया तक पहुंचाने के लिए सभी प्रकार के माध्यमों का भरपूर उपयोग करना चाहिए।

पूर्वजों के ज्ञान, अनुभव और हुनर तथा विशिष्ट जीवन शैली एवं कर्मयोग से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। हम यदि उन अनुभवों को पाने की कोशिश करें तो हमारा बुढ़ापा आ जाने और मृत्यु हो जाने तक भी हम कुछ भी हासिल नहीं कर पाएंगे। इसलिए यह जरूरी है कि पुरखों के अनुभवों का पूरा-पूरा लाभ लें तथा खुद का जीवन सँवारें व औरों को भी आगे बढ़ाएं।

पुरखों के बारे में चर्चाहीनता अपने आप में वह सबसे बड़ी कृतघ्नता है जो कि पाप की श्रेणी में आती है और पूर्वजों के आशीर्वाद और कृपा भाव को भी कम करती है। कृतघ्न पीढ़ी से पूर्वज और पितर नाराज रहते हैं और उनके कोप का अनिष्ट होने से हमारे जीवन में सफलता प्राप्त नहीं हो पाती। 

साल भर में एकाध बार श्राद्ध और तिथि मना लेने से पितरों की प्रसन्नता प्राप्त नहीं होती। इसी तरह मदर डे, फादर डे आदि के दिन बोरे भरकर श्रद्धा उण्डेल देने और साल भर उनकी उपेक्षा करते रहने का भी कोई औचित्य नहीं है।

इसके लिए उनके बताए मार्ग पर चलते हुए उनका गौरवगान करने और पूरी दुनिया को उनके बारे में बताना भी जरूरी है। पूर्वजों के साथ ही अपने माता-पिता और बड़े-बुजुर्गों के जीवनानुभवों को भी जगत के समक्ष लाया जाना चाहिए।

लेकिन ऎसा नहीं कर हम उनकी उपेक्षा करते हैं और जो अपने हैं उनसे दूर-दूर भागते हैं। यह हमारा दुर्भाग्य ही है।  हमें चाहिए कि सोशल मीडिया पर भी फालतू के संदेशों, फोटो, वीडियो और सस्ते मनोरंजन की बजाय पुरखों के महिमा गान पर ध्यान केन्दि्रत करना चाहिए।

ऎसा हो जाने पर हमारे लिए ज्ञान और अनुभवों का वो विराट आकाश खुल जाएगा जो अब तक उपेक्षित ही रहा है। और इसका लाभ हमें, अपने परिवार को, क्षेत्र को तथा अन्ततोगत्वा देश को ही प्राप्त होने लगेगा।

जीवन को ज्ञान व अनुभवों का समन्दर बनाने की जरूरत है न कि सस्ते मनोरंजन और ऊर्जा क्षरण के फालतू के धंधों में उलझकर दुर्लभ मनुष्यत्व को व्यर्थ में गंवा देने की।  समझ जाएं तो ठीक है अन्यथा हजारों-लाखों लोग पैदा होते हैं और पशुओं की तरह काल कवलित होकर बिना कोई उपलब्धि पाए ऊपर भी चले जाते हैं। न उन्हें कोई याद करता है, न वे याद आने लायक होते हैं। एक न एक दिन हम भी जिन्दगी भर नाकारा रही उसी ऊपर जाने वाली भीड़ का हिस्सा बन जाने वाले हैं।

1 thought on “ले डूबेगी ये कृतघ्नता, नालायक वंशज हैं हम

  1. कृतघ्नता के शर्मनाक दौर में पहुंच चुके हैं हम …
    जरा सोचे कि हम अपने संरक्षकों, मार्गद्रष्टाओं, सहयोगियों, प्रोत्साहनदाताओं और मददगारों के साथ ही अपने उन पुरखों-पूर्वजों के प्रति कितने कृतघ्न हो चुके हैं। हमारे पास उनका आभार व्यक्त करने और उनकी विलक्षणताओं का बखान करने के लिए चन्द शब्द तक नहीं हैं।
    ऎसी संतति, ऎसे वंशजों को डूब मरना चाहिए जो अपने वंश-परंपरा और राष्ट्र का स्वाभिमानी, अद्भुत और विलक्षण गौरव भुला बैठते हैं। जरा सी भी शर्म अभी बची है तो फालतू के संदेशों, फोटो, वीडियो आदि से सस्ते और टाईमपास मनोरंजन की बजाय कुछ लिखें, उन लोगों के लिए जो अपने जन्म, विरासत और प्रगति में भागीदारी निभाते रहे।
    आईये आज से ही यह संकल्प लें कि हम उनके ज्ञान और अनुभव तथा जगत को उनकी देन के बारे में कुछ कहें, कुछ लिखें ताकि जमाना भर उनसे सीख ले और अनुभवों का इस्तेमाल जगत कल्याण के लिए करे।

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