यही है भाग्यहीनता

भाग्यहीनता और कुछ नहीं बल्कि आलस्य, प्रमाद और टालमटोल का दूसरा नाम ही है। कुछेक मनस्वी, तेजस्वी और कर्मयोगियों को छोड़ दिया जाए तो आजकल के अधिकतर लोग खुद ही गर्त में जाने के लिए तैयार बैठे हैं और उनके तमाम कर्म ही ऎसे हैं कि जिनसे न उनकी आयु और यश बढ़ सकता है, न समाज का कोई भला हो सकता है, न ये लोग देश के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।

हम सभी लोग समझदार हैं, सच, यथार्थ और अपने भले को सोचने वाले हैं, बावजूद इसके हम जो कुछ काम कर रहे हैं वह गड्ढ़ों में जाने के लिए ही है और कोई इससे बच नहीं सकता। हमारी रोजमर्रा की दिनचर्या को देख लें तो सवेरे जगने से लेकर रात को सोने तक हमारी दिनचर्या इतनी अधिक अस्तव्यस्त हो चली है कि इसकी कोई सीमा नहीं है।

असीमित को पाने के फेर में हम सभी ने अपने अधःपतन के सारे रास्ते खोल रखे हैं। भगवान ने हमें दूसरे प्राणियों से भी ऊँचा मानकर बुद्धि से नवाजा है और ज्ञान, विवेक तथा भले-बुरे के सारे पैमानों के बारे में पूरी प्रोग्रामिंग करके भेजा है।

इसके बावजूद हम यदि हमारे ज्ञान, बुद्धि, शरीर और दिल का इस्तेमाल ढंग से नहीं कर पाएं और इसका दुरुपयोग करते रहें, तो इसमें परमात्मा का कोई दोष नहीं है। न हमारे माता-पिता या घर वालों का। जो कुछ गलती है वह हमारी ही है और इस दोष से हम मुक्त नहीं हो सकते।

हम सभी को सब कुछ पता है फिर भी गर्त में जाने के लिए आमादा हैं। बात रात को जल्दी सोने और सवेरे जल्दी उठने से लेकर शास्त्र एवं धर्म सम्मत दैनंदिन जीवनचर्या की हो या किसी भी प्रकार के खान-पान और व्यवहार की।

हर मामले में हमने मर्यादाओं, अनुशासन और संयमित जीवन प्रवाह का त्याग करने को ही जिन्दगी मान लिया है। मन-मस्तिष्क और शरीर के समग्र पोषण के लिए जो खाना-पीना चाहिए, उसकी बजाय ऎसी-ऎसी सामग्री खा-पी रहे हैं जो कचरे और गन्दे नाले के पानी से भी गई बीती है।

ताजा भोजन छोड़ कर पैक्ड़ और फास्ट फूड़ के चक्कर में इतने भीतर तक घुस गए हैं कि हमारे शरीर का क्षरण हो रहा है। जो शरीर को बनाने के लिए चाहिए वह नहीं मिल पा रहा है। इसीलिए कहीं कोई बहुत अधिक मोटा और बेड़ौल होता जा रहा है और कहीं कोई मरियल पतला।

चश्मों के बिना हम कुछ कदम चल नहीं पा रहे हैं और न हमारे चेहरे से अब कोई ओज-तेज झलकता है। न हमारे चेहरे और बॉड़ी लैंग्वेज को देखकर कोई हमारे बारे में धारणा बना सकता है। हम रोजाना सोचते हैं कि कुछ नया करें, पूजा-पाठ और साधना करें, जीवन के नवनिर्माण के लिए आगे बढ़ें, ऎसा कुछ करें कि धन-सम्पदा और यश सभी कुछ प्राप्त हो। जल्दी उठें और जल्दी सोने का अभ्यास डालें।

लेकिन बरसों गुजर जाने के बाद हम ये नहीं कर पाते। हम सभी को पता है कि इससे हमारी जिन्दगी सुधर कर शक्ति सम्पन्न हो सकती है, जीवन का असली आनंद प्राप्त हो सकता है लेकिन सब कुछ जानते-बूझते हुए भी हम यह सब नहीं कर पाते।

दिन-महीने-साल यों ही सोचते-सोचते ही गुजरते चले जाते हैं और हम आयु, शक्ति एवं बौद्धिक क्षमताओं को खोते चले जाते हैं और एक समय बाद निराशा का समय आरंभ हो जाता है। जब भी जीवन में सब कुछ जानते हुए भी हम यदि हमारी तरक्की या समाज-देश के लिए कुछ न कर पाएं तो यह समझ लेना चाहिए कि यह सब कुछ भाग्यहीनता की निशानी है जिसकी वजह से हम जहां हैं वहीं न केवल ठहरे हुए हैं बल्कि बहुत कुछ रोजाना खोते चले जा रहे हैं।

इसे ही दुर्भाग्य कहा गया है जो हमारी तरक्की को रोकने में स्पीड़ ब्रेकर की तरह काम करता है और हम उतनी संकल्प शक्ति भी नहीं जुटा पाते कि इसे पार कर आगे बढ़ जाएं।

दोष किसी ओर का नहीं सब हमारा ही है। और तो और बहुत से ज्ञानी और अनुभवी लोग तथा हमारे माता-पिता, गुरुजन और बड़े-बुजुर्ग अक्सर हमें टोकते हैं, समझाते हैं और जीवन के सत्य से रूबरू भी कराते हैं लेकिन हम हैं कि ठान ही रखी है कि जो कर रहे हैं वही करते रहेंगे। न सुधरेंगे न सुधार की कोशिशों में सहयोग देंगे। यही हमारा दुर्भाग्य है।