यही हैं दुर्भाग्यशाली मनहूस

यही हैं दुर्भाग्यशाली मनहूस

हम लोग अक्सर अपने भाग्य को कोसते या सराहते हैं। अधिकांश लोग अपनी किस्मत के प्रति अधिक श्रद्धावान नहीं होते। उन्हें लगता है कि भगवान ने उनका भाग्य अच्छी तरह नहीं लिखा, भाग्यरेखाओं के अंकन या लम्बाई बढ़ाने में कहीं न कहीं कोई कमी छोड़ दी है।

जब भी अनमना कुछ होता है तब भाग्य को कोसते नज़र आते हैं और जब कभी कोई अच्छा या मनचाहा होता है तब अपनी पीठ थपथपाने लगते हैं। उस समय भगवान या भाग्य को भूल जाते हैं। यानि की जहाँ कुछ अनचाहा हो गया, वहाँ भगवान और भाग्य दोनों दोषी हैं और जहाँ हमारे मन के अनुकूल और लाभकारी हो गया वहाँ हम स्वयं ही हैं जिन्हें सफलता या उपलब्धि का श्रेय प्राप्त होना चाहिए।

अधिकांश लोग इसी बात को जीवनाधार मानकर चलते रहते हैं। ताजिन्दगी उनका यही स्वभाव बना रहता है। इसके बाद धीरे-धीरे ये लोग अपनी नाकामियों को ढंकने और असफलताओं को छिपाने के लिए दूसरे लोगों को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया करते हैं।

इंसान की यही सबसे बड़ी कमजोरी है कि वह अच्छे कार्यों और सफलता का श्रेय खुद लेना चाहता है, चाहे इसमें उसकी किंचित मात्र भी भूमिका न हो, किन्तु दूसरों के सामने अपने आपको प्रभावशाली और परोपकारी जताने के लिए ऎसा करता रहता है।

यदि हम अपने हर कर्म का श्रेय भगवान को देना आरंभ कर दें तो प्रभु हमारे सारे कर्मों में आशातीत सफलता देता है और इस क्रम को निरन्तर जारी रखता है। क्योंकि इसमें हम अनासक्त भाव से बिना किसी आशा-अपेक्षा के कर्म करते हैं और इसलिए सारे कर्म हमारे ग्रह-नक्षत्रों और नकारात्मक शक्तियों के आभामण्डल से परे रहते हैं और इन कर्मों में विफलता का प्रश्न ही नहीं उड़ता।

दुष्ट और बुरे लोग हमेशा दूसरों के कर्म का श्रेय ले उड़ने का ही काम करते हैं। इन सभी प्रकार के हालातों के बीच सर्वाधिक विषम और विचित्र स्थिति सज्जनों की हो जाती है जिन्हें कभी भी कोई श्रेय प्राप्त नहीं हो पाता, बल्कि उन्हें सुनना ही पड़ता है। और वह भी उन लोगों से जिनका कर्म की गुणवत्ता और प्रभाव से कोई सरोकार नहीं होता।

आजकल सब जगह यही स्थितियां विद्यमान हैं। हम सभी को यह लगता है कि हम चाहे कितनी ही ईमानदारी, कत्र्तव्यनिष्ठा और सेवा भावना से समर्पित कार्य करते रहें, अच्छे परिणामों का दिग्दर्शन भी कराते रहें, अपने जीवन में नैतिक मूल्यों और सिद्धान्तों पर कायम रहें और स्वाभिमान के साथ अपनी ही मौज मस्ती का चाहे कितना आनंद लेते रहें, यह सब उन लोगों को नहीं पच पाता जिनका कतरा-कतरा हराम की कमाई और भ्रष्टाचार से बना है और पूँछ हिलाते हुए तलवे चाटना  तथा अपने आपको पूर्ण रूप से समर्पित कर देना ही जिनकी जिन्दगी हो गई है।

सच्चे और अच्छे सज्जनों को इस किस्म के लोगों के प्रति बेपरवाह होकर जीना चाहिए और यह मान लेना चाहिए कि जो लोग औरों के टुकड़ों और प्रभाव पर पलते हैं वे दुम हिलाते हुए झूठन ही पा सकते हैं या परायी हवाओं से अपने पसीने की दुर्गन्ध को छिपा ही सकते हैं, किसी के भाग्य के साथ कोई खिलवाड़ नहीं कर सकते क्योंकि जो लोग दुर्भाग्यशाली होते हैं वे किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकतें, केवल गुर्रा सकते हैं, भौंकने या लपकने, झपटने और काट खाने का अभिनय ही कर सकते हैं और वह भी दूर से ही।

दूसरे के गुणों और विलक्षणताओं को समझने, परखने और प्रोत्साहित करने की जिसमें समझ नहीं है अथवा जो दुर्बुद्धि के कारण या फिर किसी रिमोट कंट्रोल  के कारण दुराग्रह से भरा हुआ हो, वह जिन्दगी में कभी भी किसी के लिए न अच्छा सोच सकता है, न कह सकता है और न ही किसी का अच्छा कर सकता है।

दुनिया में सबसे बड़े दुर्भाग्यशाली यही आसुरी भाव वाले स्त्री-पुरुष हैं जो जिन्दगी भर नकारात्मकता से भरे रहें, लोगों को बेवजह तंग करते रहें, फालतू की कार्यवाही करते हुए खुद भी उलझे रहें और दूसरों को भी उलझाये रखें, झूठों और फरेबियोें के चक्कर में आकर अपनी व्यभिचारी मानसिकता का परिचय देते रहें, हर किसी की शिकायत करते रहें और विध्वंसकारी माहौल खड़ा करते रहें।

ये दुर्भाग्यशाली चाहे कितने बड़े ओहदे पर बैठ जाएं या किसी बड़े इंसानी कंगारू की गोद में घुस कर करतब दिखाते रहें अथवा खुद कभी मदारी, कभी जमूरे, बन्दर-भालू और कभी तमाशबीन की तरह तरह-तरह के अभिनय करते रहें, इन्हें जीवन भर कभी यश की प्राप्ति नहीं हो सकती।

जब यश नहीं होता तब बददुआओं और पापों का भण्डार इतना अधिक जमा हो जाता है कि यह मनुष्य के रूप में इनका अंतिम अवतार ही होता है। इस वजह से इन्हें पुण्य भी प्राप्त नहीं हो पाता। जो कुछ पुण्य इनके खाते में पहले के जन्मों का चला आ रहा होता है वह भी खत्म हो जाता है।

जो गुणों को पहचानना और कद्र करना छोड़ देता है वह गुणचोर की श्रेणी में गिना जाता है। अब चोर शब्द की जगह डकैत का प्रयोग किया जाना उचित होगा। जो गुणग्राही नहीं है वह कभी किसी की अच्छाइयों की चर्चा नहीं कर सकता।

और ऎसे लोग यदि किसी सज्जन और श्रेष्ठ व्यक्ति के बारे में कुछ नकारात्मक बात कहें भी, तो इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि कचहरी में आवाज लगा लगाकर बुलाने वाला न्याय नहीं कर सकता, न्याय तो वही कर सकता है जो न्यायाधीश हो।

वे सारे लोग दुर्भाग्यशाली ही हैं जो गुणग्राही नहीं हैं और केवल अपनी झूठी वाहवाही और फरेबी शान चमकाने के लिए या कि किसी न किसी अघोषित मांग को पूरा करने-करवाने की गरज से हमें नीचा दिखाने की कोशिश करते रहते हैं।

ऎसे लोगों का मुँह देखना भी दिन और रात बिगाड़ने वाला होता है। सच तो यही है कि जिसका दुर्भाग्य जग जाता है वही उलटे-सीधे कामों, निन्दा और शोषण के साथ औरों को प्रताड़ित करने, बुरा ही बुरा कहने और परेशान करने का स्वभाव पाल लेता है।

हम सभी का पाला आए दिन ऎसे लोगों से पड़ता ही रहता है जो बेवजह हमारे पीछे पड़े रहते हैं और हर थोड़े-थोड़े दिन में कोई न कोई बखेड़ा खड़ा कर दिया करते हैं।

इसी बात से हम अपने सभी छोटे-बड़े सम्पर्कितों, सहकर्मियों तथा कुटुम्बियों में कौन-कौन दुर्भाग्यशाली और मनहूस है, इसका पता कर सकते हैं।

इन लोगों का नाम लेना भी पाप देता है और पुण्य का क्षय करने वाला है। दुर्भाग्यशाली लोगों को बकने, नकारात्मक हलचलों और दुष्टताओं में रमे रहने दें, ये अपनी मौत मरने वाले हैं, इनसे दूरी बनाए रखना और हर परिस्थिति में प्रतिक्रियाहीन बने रहना ही श्रेयस्कर है।