बेवफा होते हैं कसम खाऊ

बेवफा होते हैं कसम खाऊ

किसी भी बात की पुष्टि के लिए कसम खाना और खिलवाकर ही विश्वास जताने का सीधा सा अर्थ यही है कि जो कसम खा रहा है वह भी आत्मविश्वासहीन और विश्वासघाती है और कसम दिलवाने वाला भी।

इंसान अपने आप में प्रामाणिक जीव है, वह जो कुछ बोलता है उसके लिए किसी और पुष्टि के पुट की आवश्यकता नहीं होती। कसम केवल आपराधिक मामलों या विवादों में ही प्रयुक्त हो सकती है, सामान्य जीवन व्यवहार में नहीं।

पूरी दुनिया में कुछ प्रतिशत लोगों की तादाद ऎसी भी है जिसकी यह आदत ही हो गई है कि बात-बात में कसम खाकर अपनी बात की पुष्टि करेंगे और दूसरों से भी यह अपेक्षा रखेंगे कि वह भी अपनी हर बात को कसम खाकर पूरी करे।  और कई लोग तो ऎसे हैं कि अपनी हर बात की पुष्टि कराने के लिए अपना हाथ सामने वाले के सामने कर देते हैं और यह अपेक्षा रखते कि अगला आदमी ताली बजाकर उनकी बात को समर्थन दे।

कसम खाना और खिलाना सीधे तौर पर  सामने वाले को झूठा, अविश्वसनीय और गैर प्रामाणिक मानना है। यह आदत मानवता के लिए घातक है वहीं मनुष्य मात्र के लिए अपमानजनक भी। कसम खाने और खिलवाने वालों में अनपढ़-गँवार से लेकर उच्च शिक्षित, आम से लेकर ख़ास तक सभी हैं।

हम सभी लोग जिन्दगी भर कई तरह की कसमें खाते रहते हैं, कसमों के आधार पर फैसले लेते हैं और इंसान की वाणी से कहीं अधिक कसमों पर विश्वास करते रहते हैं।

आज के समय में कसमों का कोई औचित्य नहीं है, यह केवल औपचारिताओं और बाहरी तसल्ली के सिवा कुछ नहीं। हम सभी लोग असत्य को अपना चुके हैं, दिन भर में सैकड़ों झूठ बोलते रहते हैं। कभी मजाक में झूठ बोलते हैं और अधिकांशतया पूरे होश-हवास में। ऎसे में कसमों का क्या अस्तित्व है।

मनुष्य से मनुष्य का संबंध समााजिक रिश्तों और पारिवारिक-आत्मीय माधुर्य की डोर से बंधा रहता है जहाँ एक-दूसरे को जानकर व्यवहार करने और निभाने की जरूरत है। कसमों और वादों के आधार पर न इंसान अपनी जीवनयात्रा को पूर्ण कर सकता है, न समाज और परिवार अच्छी तरह चल सकता है।

इंसानी रिश्तों में जहाँ कहीं कसम खाने की आवश्यकता आन पड़े, तब यह समझ लेना चाहिए कि यह विश्वासहीनता की पराकाष्ठा है और जो बचे-खुचे संबंध हैं वे केवल किसी न किसी परोक्ष या अपरोक्ष, एकतरफा या उभयपक्षीय स्वार्थ अथवा भय के कारण ही चल पा रहे हैं। इनमें प्रेम, आत्मीयता, स्नेह या श्रद्धा से भरे माधुर्य का कोई स्थान नहीं है।

ऎसे संबंध कुछ समय बाद अपने आप कटुता में परिवर्तित होकर या किसी न किसी कारण से समाप्त हो ही जाते हैं।  इंसानी मनोविज्ञान और यथार्थ को सामने रखकर देखा जाए तो स्पष्ट निर्णय है कि जिन संबंधों को बरकरार रखने के लिए कसमों का सहारा बार-बार लेना पड़े, अपने किसी कथन या व्यवहार की पुष्टि के लिए कसम की मोहर लगाने की जरूरत पड़े, उन संबंधों को समाप्त हो जाना चाहिए।

हम यदि ऎसे रिश्तों को समय रहते प्रसन्नतापूर्वक सहर्ष समाप्त कर लें तो दोनों पक्षों का भला है अन्यथा ऎसे कसमाई संबंधों को निकट भविष्य में कभी न कभी तो खत्म होना ही है।  स्वेच्छा से दूरियां नहीं बनेंगी तो कटुता या विद्वेष के आधार पर संबंधों का निर्णायक खात्मा होगा ही होगा।

कसमें अक्सर झूठे, धूर्त और विश्वासघाती लोग ही खाते हैं अन्यथा सच्चाई और ईमानदारी पर चलने वाले लोग तो ईश्वर के सिवा किसी से नहीं डरते इसलिए अच्छा या बुरा हर प्रकार का सच उगलने में इन्हें कोई हिचक या परेशानी नहीं होती।

लेकिन धूर्त, मक्कार, स्वार्थी और खुदगर्ज लोगाें को अपने वजूद को बनाए रखने तथा अपने क्षुद्र स्वार्थ एवं अनुचित कामनाओं की पूर्ति के लिए झूठ भी बोलना पड़ता है और बार-बार कसम भी खानी पड़ती है। ये लोग कसम का सहारा न लें तो इनका जीना मुश्किल हो जाए।

कसम खाने और खिलवाने को अब केवल औपचारिकता निर्वाह और दूसरों को भ्रमित करने के हथियार के रूप में देखा जाना चाहिए क्योंकि हमारे संकल्पों, शपथ, प्रतिज्ञाओं, वादों और कसमों का कोई आधार नहीं रहा।

ये केवल बातें हैं और हवाओं की तरह चलती रहती हैं। कसमें खाना हवाओं में बातें करने जैसा ही है। हममें से अधिकांश लोग अपने प्रेमी-प्रेमिका, बीवी-बच्चों, पति, माँ-बाप, बहन-भाई, रोजी, सेहत आदि के साथ ही भगवान की कसमें खाते हैं।

कई लोग तरह-तरह के गुरुओं और भगवान की कसमें खाकर अपने आपको सही और प्रामाणिक सिद्ध करने की कोशिश करते रहते हैं। इन्हें पता है कि भगवान को क्या फर्क पड़ने वाला है और भगवान की झूठी कसमें खाते रहें तो कसम खाने वालों पर भी कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं है। इसीलिए अधिकांश लोग भगवान के नाम पर कसमें खाकर अपने आपको प्रामाणिक और सच्चा सिद्ध करने के भ्रम में खुद भी जीते रहते हैं और दूसरों को भी भ्रमित करते रहते हैं।

जो इंसान सही, सच्चा, ईमानदार है वह कभी किसी की कसम नहीं खाता। उसे आवश्यकता ही नहीं होती किसी की कसम खाने की। वह जो कुछ कहता-करता है वह स्वतः प्रामाणिक और विश्वासनीय होता है और वही कहता है जिस पर उसे पक्का भरोसा होता है।

और ऎसा इंसान इतना अधिक स्वाभिमानी होता है कि वह लाख कहने पर कसम नहीं खाता। कसम खाने की अपेक्षा वह ऎसे सारे संबंधों को एक ही झटके में विच्छेद कर डालने में विश्वास रखता है जो कि उस पर अविश्वास करते हैं।

इसलिए जो लोग कसमों में विश्वास रखते हैं वे भीतर से आत्महीन, अविश्वासी, आशंकित होते हैं और संबंधों के सफर में किसी न किसी एक मुकाम पर आकर विश्वासघाती ही सिद्ध होते हैं।

ईमानदारी, पारदर्शिता, सच्चाई और प्रामाणिकता को अपनाएं, और कसमों से दूर रहें। जो लोग कसमों के आधार पर अपने कथन और संबंधों की दशा और दिशा तय करते हैं उन सभी से हर तरह के संबंधों को प्रेमपूर्वक सहर्ष विराम प्रदान करें अन्यथा ये संबंध जीवन में आगे चलकर कभी न कभी दुःखदायी होंगे ही। कहा भी गया है – कसमें वादे प्यार वफा के, वादे हैं वादों का क्या ….।