कछुआ छाप गधे

काम के न काज के, ढाई मन अनाज के

कोई लाख कोशिश कर लें, कछुओं पर क्या असर पड़ने वाला है। छोटे दिमाग और मोटी खाल के जो हैं। कछुओं का मतलब ही मंथर गति और सुस्ती होकर रह गया है। ऎसे में किसमें ताकत है कि कछुओं को खरगोश या हिरण बना सके।

हर कछुआ अपने आपको जल और थल दोनों का सम्राट मानने लगा है। उसे इन दोनों ही जगहों के घड़ियालों, मगर और मछलियों की भी चिन्ता नहीं है और न दूसरे प्राणियों की भी। जितना जी करता है उतना चल लेता है, कुछ खा-पी लेता है और फिर अपनी औकात में आ जाता है। 

बाहरी हवाओं, पानी के थपेड़ों और लहरों की उछाल का कोई फर्क उस पर नहीं पड़ता। पड़े भी कैसे सारा शरीर अभेद्य और मोटे चट्टानी खोल में छुपाकर सुरक्षित हो जाता है। हिलना-डुलना भी ऎसा बंद कर देता है जैसे कि बेजान ही हो गया हो। कई तो ऎसे ढीठ हो गए हैं कि बरसों से अपनी नालायकियों के सहारे मस्त हैं। और तो और नए-नवेले भी पुरानों की तर्ज पर ही चलकर अपने आपको धन्य समझने लगे हैं।

उदासीनता और शिथिलता के इसी खोल का सहारा पाकर हर कछुआ अपने आपको सुरक्षित और मुक्त समझने लगा है। कछुओ के लिए न कोई मर्यादाएं काम आती हैं, न कर्मयोग या जोब चार्ट का कोई झंझट।  निर्लज्जता, उदासीनता और बेशर्मी की जाने कितनी परतों से बने खोल के भीतर हर कछुआ अपने आप में मदमस्त है।

उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाहर क्या हो रहा है, कौन पुकार रहा है, कौन उसके नाम का रो रहा है और कौन उसकी वजह से परेशान है। कछुओं की फितरत ही ऎसी कि उन पर किसी हलचल का कोई असर कभी नहीं होता।

यह उन्हीं की इच्छा पर निर्भर है कि कब दर्शन देने के लिए धीरे से मुँह बाहर निकालें और कब खोल में घुसकर कहीं ऎसे गायब हो जाएं कि ढूँढ़े नहीं मिलें। कछुओं के लिए न आने के समय की कोई पाबंदी है न जाने के समय की।

हर कछुआ मनमौजी है, मनमानी उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। यों भी कछुओं के लिए न दायरे होते हैं न दीवारें। जल में हों या थल पर, मीलों तक या तो पानी है या फिर गुदगुदाने वाली हरी-हरी घास और शैवालों के जंगल, चाहे जहाँ जिस समय घुस जाएं, न कोई पूछने वाला है, न देखने वाला और न ही रोक-टोक करने वाला।

फिर जो बेशर्म और निर्लल्ज ही हो गया हो, उसके लिए किसी भी बात का क्या फर्क पड़ता है, चाहे जो बके जाओ, सुनते जाएंगे। इनकी सेहत पर क्या फर्क पड़ने वाला है। जो फर्क पड़ेगा वह तो उन पर ही जो इन नालायक कछुओं को कुछ कहने-सुनने का फर्ज निभाकर अपनी ऊर्जा नष्ट कर रहे हैं और सदियों से इस मुगालते में हैं कि कछुओं के भी कान होते हैं या उन पर भी कोई फर्क पड़ता है।

यही सब कुछ हो रहा है अर्से से। बावजूद इसके कछुए हैं वहीं के वहीं हैं। कछुओं में सुधार की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है और न कछुओं की नस्ल में सुधार की कोई संभावनाएं। कछुआछाप लोग हर तरफ विद्यमान हैं और पूरे यौवन के साथ अपनी मौज-मस्ती में रमे हुए हैं। उन्हें न सहकर्मियों की परवाह है, न अपने संस्थानों, समुदाय और देश की।

इन लोगों की अपनी ही अपनी ढपली है, अपना ही राग है। ये वही कुछ करना, सुनना और देखना चाहते हैं जो वे सोचते हैं या इनके जैसे ही संगी-साथी। इन कछुओं के लिए जल-थल की जरूरत नहीं बल्कि ये फाईलों के सागर और कागजों के जंगल में भटकते रहने के इतने आदी हो गए हैं कि इन्हें लगता है कि यही स्वर्ग है जहाँ रहकर वो सब कुछ किया और कराया जा सकता है जो कि आनंद देता है, घर भरता है और उन्मुक्त भोग-विलास के तमाम रास्ते खोलता है।

कछुओं की बहुतायत के मौजूदा दौर में आज वे सारे के सारे लोग परेशान-हैरान हैं जिनके लिए हर क्षण कीमती है और जो जमाने की गति के अनुरूप चलना और चलाना चाहते हैंं। इनके लिए ये कछुए हर तरफ स्पीड ब्रेकरों की तरह अड़े हुए नज़र आते हैं और सामान्य गति को भी बाधित करने की हरचंद कोशिशें करते रहते हैंं।

इन कछुओं की वजह से समाज और देश सब की तरक्की को जैसे ग्रहण ही लग गया है। किसम-किसम के कछुए सभी बाड़ों में पूरी निरंकुशता के साथ विराजमान हैं। इन्हें कोई पूछने वाला नहीं है। किसी की हिम्मत भी नहीं है कि इन्हें पूछे या रोक-टोक करें क्योंकि कछुओं  के अपने गिरोह हैं, अपनी बिरादरी है।

आम तौर पर अधमरे या मरे हुए पड़े दिखने वाले कछुओं पर जब कोई बाहरी चर्चाएं होने लगती हैं तब सारे के सारे कद्दुओं की शक्ल बनाकर संगठित होकर सामने आ आते हैं। ऎसे में कौन इनके पीछे माथापच्ची करे, यही सोचकर कछुओं को उपेक्षित कर दिया करते हैं।

कोई लाख कोशिशें कर लें, कछुए कछुए ही रहने वाले हैं, इनकी उदासीनता, शिथिलता और नालायकियां खत्म करने के सारे प्रयास अतीत में भी विफल रहे हैं और आज भी इस अभियान में सफलता पा जाना संदिग्ध ही लगता है। कछुओं को अपनी मौत मरने दें, कुछ न कहें इन्हें। कछुओं की छाती नहीं बल्कि पीठ मजबूत है और हर मामले में पीठ दिखाना कछुओं को अच्छी तरह आता है।

कछुआ छाप गधों की कई सारी किस्में हमारे सामने हैं जो केवल पीठ पर अनावश्यक बोझा ढाना और पीठ दिखाना ही जानते हैं। इनसे और कोई उम्मीद की ही नहीं जा सकती।

1 thought on “कछुआ छाप गधे

  1. कछुआ ब्राण्ड गधों से मुक्ति पाए बगैर समाज और देश की तरक्की संभव नहीं…

    समाज और देश के पिछड़ेपन के लिए वे गधे जिम्मेदार हैं जो सारा ऎशो आराम चाहते हैं और जहाँ सुकून मिल जाए वहाँ आराम फरमाने लग जाते हैं।
    हर काम में पहले तो ना नुकुर करते हैं फिर ज्यादा जोर पड़े या दबाव हो तो कछुआ चाल चलने की आदत पाल लेते हैं। और ज्यादा कुछ कहो तो दुलत्ती झाड़ कर कूद-फांद करते हुए आगे-पीछे हो जाते हैं या गुदगुदी घास वाली किसी माँद में घुस जाते हैं।
    इन गधों से तो कछुआ छाप अगरबत्ती ज्यादा तेज चलती है और पूरा काम करती है। क्या करें, इन कछुआ छाप गधों का। इस विषय पर चिन्तन करना हम सभी के लिए युगीन आवश्यकता है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *