परखें मानवीय संवेदनाएँ

नोटबंदी से पसरा हुआ मौजूदा माहौल समाज और देश की अस्मिता से जुड़ा वह मुद्दा है जो भारतीय संस्कृति, सभ्यता और देश की एकता-अखण्डता से जुड़ा हुआ प्रत्यक्ष असरकारक है।

इस बात को वे लोग कभी समझ नहीं पाएंगे जिनके लिए पैसा ही परमेश्वर है और पैसे कमाना, जमा करना तथा पराये पैसों पर मौज उड़ाना ही जिनकी जिन्दगी है।

आज केवल करेंसी बदलने की ही बात सामने है और इसी में हम सभी लोग हायतौबा मचाने लगे हैं। युद्ध की विभीषिका और आतंकवादियों की करतूतों से लेकर वीभत्स दृश्य हमारे सामने होते और हम केवल मुद्रा से ही नहीं घर-परिवार और समाज, अपने क्षेत्र में ही अपनी बरबादी का मंजर देखते तब हमारी स्थिति क्या होती क्योंकि मुद्रा का सीधा संबंध उन लोगों से भी है जो देशद्रोही इन्हीं नोटों के भण्डार और पड़ोसी मुल्क से आने वाले असली-नकली नोटों से घातक हथियार खरीदते और जमा करते हैं, एके 47 से लेकर तमाम तरह के अत्याधुनिक हथियारों, राकेट लांचरों और बमों का इस्तेमाल करते हैं। तब हमारे पास न करने को कुछ होता, न कहने को।

इसके अलावा देश के पिछड़ेपन और गरीबों तथा अमीरों के बीच खाई को चौड़ा और गहरा करने वाले जमाखोरों, दलालों, पूंजीपतियों, मुनाफाखोरों, तस्करों, नक्सलियों, आतंकवादियों, उचक्कों, भ्रष्टाचारियों, रिश्वतखोरों आदि के कारण बहुसंख्य जनता परेशान रही है और इस वजह से नोटबंदी जैसे सरकार के फैसले को बहुमत प्राप्त हो रहा है।

नोटबंदी ने उन सभी लोेगों के अहंकार को चूर-चूर कर दिया है जिन्हें नोटों के बण्डलों की वजह से इस बात का गुमान था कि वे ही दुनिया में सर्वोपरि और सर्वश्रेष्ठ हैं।

नोटबंदी के बाद के हालातों को देखा जाए तो हमारी संवेदनाएं अब भी उतनी आकार नहीं ले पायी हैं जितनी लेनी चाहिएं। पिछले कुछ दिनों का वक्त हम सभी के लिए मानवीय संवेदनाओं की कसौटी पर खतरा उतरने और सामाजिक प्राणी के रूप में स्वयं को सिद्ध करने के लिए आया।

वे लोग धन्य हैं जिन्होंने इस राष्ट्रीय आपदा जैसी स्थिति में लोगों को मदद की, सेवा और परोपकार करते हुए हाथ बंटाया। उन सभी बैंककर्मियों की भी तारीफ की जानी चाहिए जिन्होंने अपना भरपूर समय देकर, रातों की नींद और दिन के चैन की परवान न करते हुए दिन-रात लोगों की सेवा की और यह दर्शा दिया कि देश के लिए जब भी कोई संकट की घड़ी आए या हमारी जरूरत पड़े, हम सभी लोग त्याग, तपस्या और सर्वस्व समर्पण करने को तैयार हैं।

यहां तक कि रिटायर्ड बैंककर्मियों ने भी दिल खोलकर अपनी सेवाएं दी और बैंकिंग काम-काज में हाथ बंटाया। इन सभी बैंककर्मियों के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

इनकी जितनी अधिक तारीफ की जाए, वह कम ही होगी। दूसरे सभी क्षेत्रों में काम करने वाले अधिकारियों एवं कार्मिकों को भी बैंककर्मियों से सीख लेने की आवश्यकता है।

इस प्रकार की स्थितियां देशवासियों के धैर्य, त्याग, समर्पण और देशभक्ति की परीक्षा की घड़ी हुआ करती है। जो कुछ देश के लिए अच्छा है, उसका दिल खोलकर समर्थन करना चाहिए, हरसंभव मदद को तैयार रहना चाहिए क्योंकि यही ऎसे वक्त होते हैं कि जब हम देश के लिए पूरे ज़ज़्बे के साथ आगे आते हैं और अपने-अपने फर्ज को अच्छी तरह निभाने की कोशिश करते हैं।

देश भर में जहाँ कहीं नोटबंदी का जैसा भी कुछ असर रहा है, लोगों को जिस तरह की तकलीफें सहनी पड़ी हैं, उन सभी के लिए हमारी कोई न कोई जिम्मेदारी थी और है, लेकिन हम लोग इसे कितना निभा पाए हैं यह हमारी आत्मा ही जानती है अथवा हमारे इलाके के लोग।

सामाजिक सौहार्द, समरसता, नर सेवा- नारायण सेवा, समाजसेवा और लोक कल्याण-परोपकार की बातें करने के आदी कितने लोगों ने अपने दायित्वों को निभाया, यह आज की मानवता के मूल्यांकन का बड़ा विषय है।

इस मूल्यांकन में जो लोग खरे उतरे हैं वे सचमुच लोकसेवी हैं और जो कुछ नहीं कर पाए, केवल मूकदर्शक बने हुए देखते रहे हैं, उन लोगों के लिए क्या कहा जाए, यह लोगों पर छोड़ दिया जाना चाहिए।