आजमाएं शर्तिया ईलाज

हर कोई दुःखी है उन लोगों से जो बेवजह शत्रु की तरह पीछे पड़े रहते हैं और शत्रुता के लिए अपात्र होने के बावजूद शत्रुता निभाने के लिए हर समय निर्लज्ज, बेशर्म और नंगे होकर प्रयास करते रहते हैं।

स्वार्थ और तरह-तरह के मोह के पीछे पागल होती जा रही दुनिया में मानवीय मूल्यों का इतना अधिक क्षरण हो चुका है कि अब शायद ही कोई ऎसा बिरला इंसान बचा होगा जो यह कहता हुआ मिल जाए कि वह अजातशत्रु है।

आजकल सांसारिकों से लेकर संसार छोड़ चुके परम वैराग्यवान बाबाओं और बाबियों तक में शत्रुता देखी जा रही है। बहुत सारे लोगों ने तो यही मान लिया है कि वे शत्रुता करने और निभाने के लिए ही संसार में पैदा हुए हैं और जब तक जियेंगे तब तक किसी न किसी से वैर भाव का प्रदर्शन करते ही रहेंगे, चाहे उनसे हमारा कोई संबंध हो या न हो।

इन लोगों की अमूल्य मनुष्य देह का अधिकांश हिस्सा जमाने भर से शत्रुता करने में ही बीत जाता है। इनके लिए कोई शत्रु स्थायी नहीं होता, समय-समय पर शत्रु बदलते रहते हैं। इन दुर्बुद्धि लोगों को न उनके माँ-बाप समझा सकते हैं न पत्नी या कोई सा कुटुम्बी। यहाँ तक कि इनके घर वाले भी इनसे परेशान रहते हैं और यही कामना करते हैं कि जितनी जल्दी हो इनकी तीये की बैठक हो जाए या फिर तेरमी।

कई मुफतिया लोगों के लिए वे ही शत्रु हैं जो उनके लिए  खर्चा पानी का इंतजाम नहीं कर पाते, कहीं से सैटिंग बिठाकर पैसे निकालने का कोई जुगाड़ नहीं कर पाते, वीआईपी और वीवीआईपी आतिथ्य नहीं दे पाते या कि इन भिखारियों के लिए हफ्ता, माहवारी और रंगदारी का इंतजाम करने में असमर्थ रहते हैं। अधिकांश बार देखा गया है कि बिकाऊ लोग ही सबसे अधिक शत्रुता निभाते हैं अथवा हर काम में पैसे निकालने की युक्ति रखने वाले।

शत्रुता पाले हुए बड़े-बड़े लोग जिन्दगी भर जीभ लपलपाते रहते हैं। इनकी शत्रुता तब तक बदस्तूर जारी रहती है जब तक कि इनका मुँह बंद नहीं कर दिया जाता। और मुँह बन्द करने के लिए आजकल रोटी, हड्डी का टुकड़ा या झूठन नहीं बल्कि रुपया चाहिए होता है। रुपया ठूँसा नहीं कि मुँह बन्द।

बड़े-बड़े श्वान, लोमड़ और लोमड़ियों का यही हाल है। खूब सारे गधे और खच्चर भी हैं जो गुलाबजामुन का स्वाद लेते ही रेंकना बंद कर देते हैं। बहुत सारे लोग प्रतिस्पर्धाओं में सफलता पाने लायक प्रतिभा के अभाव में औरों को नीचे गिराने के लिए जी तोड़ कोशिशें करते रहते हैं।

और खूब सारे ऎसे हैं जिनके पास सब कुछ है लेकिन अपने अहंकारों के मारे गुब्बारों की तरह आसमान में उन्मुक्त आवाराओं की तरह उछलकूद करने लगे हैं।

इनसे इतर बहुत बड़ी भीड़ सब जगह विद्यमान है जिसके पास न कोई ज्ञान है, न हुनर। इसलिए ये अपना वजूद सिद्ध करने के लिए जिन्दगी भर खुराफातों और षड़यंत्रों में रमे रहते हुए खूब सारे लोगों से शत्रुता पाल लिया करते हैं और इस तरह नकारात्मक माहौल का सृजन करते हुए शत्रुता का व्यवहार करने में लगे रहते हैं।

एक आम अच्छे इंसान के लिए हर स्थान पर शत्रुता निभाने वाले नालायकों और मुफ्तखोरों की पूरी की पूरी जमात देखी जा सकती है जिसका एक ही लक्ष्य है और वह है किसी न किसी से शत्रुता पाले रखते हुए संसार के गलियारों में अपनी उपस्थिति दर्शाते रहना ताकि लोग उनके वजूद को मृत न मान लें।

दुनिया की अधिकांश आबादी इन हालातों में अपनी सारी की सारी ऊर्जा अच्छे कामों में खर्च करने की बजाय भटक जाया करती है और उसका आरंभिक लक्ष्य शत्रुता रखने वालों को ठिकाने लगाना या कि इन तथाकथित शत्रुओं से निपटना ही रह जाता है।

इससे जो ऊर्जा समाज, परिवेश, अपने क्षेत्र, देश या संसार के मंगल कार्यों में लगनी चाहिए, उसका काफी कुछ हिस्सा उन लोगों के विरूद्ध कार्यवाही में खर्च हो जाता है जो किसी भी दृष्टि से हमारे शत्रु होने लायक होते ही नहीं।

किसी सम्राट का शत्रु कोई मलीन और गन्दा बीमारू भिखारी कैसे हो सकता है।  किसी शेर या हाथी का शत्रु कोई चूहा या मकौड़ा कैसे हो सकता है। लजीज पकवानों के स्वाद में मस्त रहने वाला इंसान का शत्रु झूठन चाटने वाले कैसे हो सकते हैं। किसी ईमानदार और निष्ठावान कर्मयोगी का शत्रु कोई निकम्मा, पुरुषार्थहीन और बेईमान फरेबी कैसे हो सकता है। कोई ब्लेकमेलर किस्म का इंसान किसी सच्चे इंसान का शत्रु कैसे हो सकता है।

कुल मिलाकर बात यहीं आकर समाप्त हो जानी चाहिए कि जो लोग हमसे शत्रुता के भाव रखते हैं वे किसी भी कीमत पर हमारे शत्रु नहीं हो सकते। इन तथाकथित शत्रुओं को किसी भी तरह अपना शत्रु न मानें बल्कि इन्हें पूरी तरह उपेक्षित करते चलें।

किसी कुत्ते को जितनी बार पत्थर या लाठी से प्रहार करेंगे, वह भौं-भौं करता रहेगा। यह मानकर चलें कि इन तथाकथित शत्रुओं की औकात गली-गली में सड़ी-गली झूठन चाट-चाट कर पेट भरने वाले कुत्तों से अधिक नहीं है।

ये चाहे जो करें, करने दें। खुद पूरी की पूरी मस्ती में जीने की आदत डालें  और अपने कर्मयोग को और अधिक सुगंध व विस्तार देने का प्रयास करने में कहीं कोई कमी नहीं छोड़ें। दुनिया में ऎसे खूब सारे लोग सब जगह हैं। इनसे दुश्मनी निकालने के लिए किसी तरह के शोध-प्रतिशोध का सहारा लेने की कोई आवश्यकता नहीं है।

अपनी संचित ऊर्जा स्वयं के, परिवारजनों के, समाज और देश के कल्याण में खर्च होनी चाहिए न कि इन नुगरे-नालायकों पर। जो लोग धर्म, सत्य, न्याय और जीवन लक्ष्यों से बेखबर हैं वे तो पहले से ही अधमरे हैं और अपने पाप कर्मों से ही खुद ब खुद मरने वाले हैं, इनके लिए न कुछ सोचने की आवश्यकता है, न कुछ करने की। समय बड़ा बलवान है जिसने अच्छे-अच्छे नरपिशाचों से लेकर भयंकर से भयंकर और खूंखार राक्षसों व राक्षसियों का सफाया कर डाला है, ये किस खेत की मूली हैं।

इन कुकर्मियों और विध्वंसकारी लोगों को अपना शत्रु मान लेना स्वयं के धोखा है क्योंकि हम जिस ऊँचाई पर होते हैं उसके मुकाबले इनका कोई अस्तित्व ही नहीं होता। ऎसे नकारात्मक मनोवृत्ति वाले विघ्नसंतोषी लोग सौ जन्मों में भी हमारी बराबरी पर नहीं आ सकते।

इन लोगों को अपना शत्रु मान लेने का भ्रम भी हमारी कदर घटाता है। अपने व्यक्तित्व की शुभ्रता और कद की ऊँचाइयों का आदर-सम्मान करें तथा उस दिशा में बेपरवाह होकर आगे बढ़ते रहें जो लोक मंगलकारी और जीवनलक्ष्य में सफलता देने वाली है।

जो इंसान हमसे शत्रुता रखता है वह नासमझ, अज्ञानी और अधोगामी होने के साथ ही कुकर्मी और पापी है, तथा ऎसे लोगों की ओर तनिक भी ध्यान नहीं देते हुए इनकी उपेक्षा करना ही इनका पक्का और शाश्वत ईलाज है। अपनी ऊर्जा, ज्ञान, हुनर और क्षमताओं का उपयोग जीवों और जगत के कल्याण के लिए करना ही युगधर्म है।

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