अपनी बात-सच्ची बात

कैसे-कैसे सरकारी कारिन्दे, खाओ और देर तक सोते रहो  …

पक्षियों के लिए चुग्गा डालना बचपन से मेरी आदत में शुमार रहा है। जहाँ-जहाँ भी रहा, वहाँ इस परंपरा को बरकरार रखा। तमाम प्रजातियों के पक्षियों का डेरा आवास की चहारदीवारी पर चुग्गा पाने जमा रहता। यह क्रम आज भी बदस्तूर जारी है। लेकिन इस पुण्य कार्य को भी बर्दाश्त नहीं करने वाले कुछ लोग होते हैं जो सवेरे आठ-नौ बजे तक नींद को त्याग नहीं पाते, आलसी और दरिद्रियों की तरह सोते रहते हैं, इन लोगों को चुग्गा खाने आए पक्षियों का कलरव सुहाता नहीं क्योंकि इनकी नींद में खलल पड़ता है।

हाल ही की बात है। हमेशा की तरह विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों के झुण्ड कलरव करते हुए मस्ती से चुग्गा खाने लगे।  प्रातःकाल 8 बजे का समय ही होगा। इस बीच खर्राटों में खलल पड़ने पर पीछे सिविल लाईन के क्वार्टरों से कोई सरकारी नुमाइन्दा बाहर आया और लट्ठ बजाने लगा। इससे सारे पक्षी भय के मारे फुर्र हो गए।

पक्षियों ने अब तहे दिल से स्वीकार कर लिया कि ये लोग खुद ही खाने में विश्वास रखते हैं और उसी के कारण आलसी-दरिद्री और भिखारी बने रहकर प्रभातकाल में भी सोते रहते हैं। कोई पक्षियों को खिलाए, यह भी इन्हें बर्दाश्त नहीं होता।

धन्य हैं ये लठ्ठ बजाने वाले कुंभकर्ण।

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