सिद्धों की कथाएँ – भैरव साधक दया महाराज

तंत्र-मंत्र साधकों का गढ़ रहा है बांसवाड़ा

राजस्थान के एकदम दक्षिणी भूभाग में माही नदी की स्नेहिल रसधार से आप्लावित बांसवाड़ा प्राचीनकाल से तंत्र-मंत्र साधकों और तपस्वियों का महा  गढ़ रहा है।

गुजरात और मध्यप्रदेश से सटे इस अँचल में हर तरह की मांत्रिक और तांत्रिक सिद्धियों में सिद्ध साधकों के साथ ही चमत्कारिक तपस्वियों का बाहुल्य रहा है। प्रकृति  के पंचतत्वों की प्रचुर उपलब्धता और दैवीय ऊर्जाओं से भरे-पूरे इस क्षेत्र में हर तरफ सिद्धों का बोलबाला रहा है। इन सिद्ध तपस्वियों और साधकों के चमत्कारों की गाथाएं आज भी यहाँ श्रद्धा और भक्तिभाव से सुनी जाती हैं।

इन्हीं में पं. दयाशंकर भट्ट (दया महाराज) का नाम अग्रणी है जो भगवान भैरवनाथ के सिद्ध साधक रहे हैं। भैरव के साथ उनका इतना अधिक गहरा आत्मीय संबंध था कि पास की नदी मेंं सवस्त्र नहाकर आने के बाद अपनी गीली धोती को निचोड़कर ही भैरव को स्नान करा दिया करते थे।

एक बार राजा ने उन्हें भैरव पूजा से हटा कर किसी और को भैरवनाथ की सेवा-पूजा में रख लिया। इससे भैरव इतने अधिक क्रोधित हो उठे कि भैरव ने नए पुजारी पण्डित को इस कदर जोरों से थप्पड़ जड़ दी कि गर्दन टेढ़ी हो गई।

उधर राजा को भी अनिष्टकारी स्वप्न आने लगे। अन्ततोगत्वा राजा ने अनुनय विनय कर पं. दया महाराज को ही फिर से भैरव की पूजा में नियुक्त किया। राजा और दरबारी सभी उनके चमत्कारों से अभिभूत थे।

इसी विषय पर प्राचीन कहानी-किस्सों और पुरातन परम्पराओं के जानकार रहे स्व. पं. दिनेश भट्ट ने दो वर्ष पूर्व बांसवाड़ा के वनेश्वर श्मशान घाट पर चर्चा के दौरान काफी जानकारी दी और रहस्योद्घाटन किया।

केवल भैरव साधना की ही बात करें तो बांसवाड़ा में बहुत से साधकों ने भगवान भैरवनाथ से साक्षात किया और सिद्धियां प्राप्त की तथा इनका लोक कल्याण में उपयोग किया।

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