कायरों के कवच-कुण्डल हैं सहिष्णुता और शालीनता

दुनिया के तमाम बुद्धिजीवी, प्रबुद्धजन और बुद्धिबेचक तटस्थ लोग सहिष्णुता, शालीनता, धीर-गांभीर्य और अहिंसा के उपदेशों की बाढ़ ला रहे हैं, कोई मानवाधिकारों की बात कहता है, कोई संस्कारों की। कोई आदर्शों और सिद्धान्तों की बातें करता है, भाषा में शालीनता और सौम्यता पर जोर देता है और बहुत सारे लोग मूकदर्शक होकर चुपचाप बैठ जाने की सीख देते हैं।

बहुसंख्य ऎसे भी हैं जो सम-सामयिक विपदाओं, मानवजनित आपदाओं, लोक जीवन की समस्याओं, अभावों और तनावों को दूर करने के लिए भगवान के अवतार की प्रतीक्षा में निहत्थे और उदासीन होकर बैठे हैं और अनगिनत ऎसे भी हैं जिन्हें कुछ नहीं पड़ी है, समाज, क्षेत्र और देश जाए भाड़ में, अपना कुछ नहीं बिगड़ना चाहिए।

तरह-तरह के वादों, विचारों, दावों, भ्रमों, आशंकाओं और शंकाओं के बीच मानव समुदाय जीने को विवश है। यानि की सभी जगह अनिश्चितता और विश्वासहीनता का जो दौर आज के समय देखने को मिल रहा है वैसा पहले किसी युग में नहीं।

भरोसा सभी का टूटता जा रहा है। उन लोगों का भी भरोसा नहीं रहा जिनके बारे में कहा जाता है कि वे भरोसेमन्द हैं, फिर दूसरों के भरोसे का तो प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि ये लोग किसी के भरोसेमन्द कभी रहे ही नहीं। इनका भरोसा हर बार अवसर पाकर डगमगाता और बदलता रहता है।

अपने स्वार्थ और फायदों को देखकर ये आज इसके साथ हो जाते हैं, कल उसके साथ। आदमी का कोई पाया रहा ही नहीं। सब तरफ नींव कमजोर है और कंगूरों का आकर्षण आसमानी ऊँचाइयां पाता जा रहा है।

काफी समय तक असहिष्णुता का बवण्डर चला और उसके बाद अब मर्यादाओं की बातें की जा रही हैं। कहा जा रहा है कि सभी को अपनी सीमा रेखाओं की हद में रहकर ही सब कुछ करना चाहिए।

बुद्धि बेचकर जीविका चलाने वाले देश के बुद्धिजीवियों की हालत बहुत ही दयनीय, दैन्य और हास्यास्पद होती जा रही है। इन प्रबुद्धजनों को अपनी छवि छद्म रूप से सकारात्मक के साथ ही धीर-गंभीर और शालीन बनाए रखने की पड़ी है ताकि वक्त आने पर सारे लाभ भी ले उड़ें,  भांजगड़ियों (मध्यस्थों) की भूमिका भी अच्छी तरह निभा सकें और खुद को लोक प्रतिष्ठ एवं जन स्वीकार्य बनाए रखने के तमाम पाखण्डों और आडम्बरों में सफल हो सकें।

हो यह गया है कि जो औरों को जितना अधिक बुद्धू बना कर भ्रमित रख सकता है, वह उतना ही चल निकलता है। बड़े-बड़े और खोटे सिक्के विमुद्रीकरण के बाद भी जैसे बैकडोर से चल निकलते हैं।

बेअक्ल और दगाबाज, बातों के महारथी, हथेली में दिल्ली और बालु में से तेल निकालना बता देने में माहिर खूब सारे मदारी, जमूरे और तिकडमबाज हैं जो यही सब कर रहे हैं।

देश की आजादी से लेकर सामाजिक और राष्ट्रीय नवनिर्माण तक मेंं तटस्थों से कहीं अधिक भूमिका उन लोगों की रही है जिन्होंने अपनी छवि की बजाय देश की परवाह की और सच को सच कहने का साहस रखा, देश के लिए सर्वस्व बलिदान के लिए तैयार हो गए।

उन लोगों के बलिदान को भुलाया नहीं जा सकता जिन्होंने दुश्मनों से दोस्ती, एवजी स्वार्थ पाने, दुरभिसंधि अथवा कायरता का प्रदर्शन नहीं किया बल्कि फौज बनाकर लड़े, फौजी की तरह भिड़े और रणक्षेत्र में आमने-सामने होते हुए कभी घर-परिवार की परवाह नहीं की।

वे लोग भी आज के तटस्थ, कुतर्की और कायर बुद्धिजीवियों की सलाह पर चलते तो आज देश आजाद नहीं हो पाता।  देश की आजादी में गरम दल का योगदान भुलाया नहीं जा सकता जिन्होंने लल्लो-चप्पो और कूटनैतिक लड़ाई की बजाय सीधे लोहा लिया और देश के लिए जीने-मरने का प्रण पूरा किया।

यह दिगर बात है कि हम उन्हें इतिहास में अपेक्षित स्थान और सम्मान नहीं दिला पाए, इसका मलाल हम सभी को है। भारत के ही संदर्भ में देखें तो हमने पिछली सदियों में अपनी शालीनता, संस्कारों, संस्कृति और परंपराओं को कहाँ छोड़ा, पूरा का पूरा परिपालन किया, अहिंसा के मार्ग पर चले और अपनी श्रेष्ठताओं को पक्के ढंग से निभाया।

बावजूद इसके हम कहां से कहां आ पहुंचे, इसका मूल्यांकन करें तो पाएंगे कि आज हम अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अखण्ड भारत खण्ड-खण्ड होता गया, सीमाएं आज भी असुरक्षित हैं,  अंग्रेजों के देश छोड़ देने के बाद भी हम कहाँ मुक्त हुए भ्रष्टाचार, व्यभिचार, वीआईपी वाद और अधिनायकवाद से।

देशवासी आत्मनिर्भरता के लिए तरस रहे हैं, लाखों- करोड़ों लोग आजीविका और जीने के लिए दर-दर की ठोकरें खाते दिख रहे हैं, आतंकवादी, अपराधी, नक्सली और तरह-तरह के असामाजिकों का ताण्डव जारी है।

यह सब कुछ इसीलिए होता रहा क्योंकि हम अपने दड़बों में बने रहे, अहिंसा, मर्यादाओं, सहिष्णुता और शालीनता के चक्कर में हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। और इसका असर ये हुआ कि हम तंग भी होते रहे और हमारा सब कुछ छीनता चला गया।

उन बुद्धिजीवियों का कुछ नहीें बिगड़ा जो हमें सहिष्णुता, शालीनता, शांति, संस्कारों और मर्यादाओं का पाठ पढ़ाते रहे क्योंकि उन लोगों ने हर युग में इसी तरह की चालाकियां करते हुए अपने उल्लू सीधे किए और मौज उड़ाते रहे।

भारतीय इतिहास के गौरव और गरिमा को जाने, उनकी परंपराओं, संस्कारों, मर्यादाओं और सहिष्णुता भरी कहानियों को सुनें तो हमें पता चलेगा कि हम केवल और केवल इसी वजह से लूटते रहे क्योंकि मूक दर्शक होकर अपने स्वार्थ में रमे रहे। इसका खामियाजा हम भी भुगत रहे हैं और हमारी आने वाली पीढ़ियां भी भुगतती रहेंगी।

शस्त्र और शास्त्र दोनों का प्रयोग करना जरूरी है। शठम् शाठ्यं समाचरेत। अर्थात दुष्ट के साथ और अधिक दुष्टता का व्यवहार करके ही उसे पराजित किया जा सकता है। धर्म के लिए हिंसा भी सर्वथा जायज है। हमने अहिंसा परमो धर्म के आधे-अधूरे सच को ही पकड़ रखा, ‘धर्म हिंसा तथैव च’ को भुला दिया।

इस सत्य को आज पूरी ईमानदारी से स्वीकार करने की जरूरत है कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते, लपकने और भौंकने वाले कुत्तों के लिए शालीनता की बजाय लट्ठ की मार जरूरी होती है और देश के दुश्मनों को ठिकाने लगाने के लिए वार्ताओं की नहीं बल्कि बमों और बारूद की जरूरत पड़ती है।

इसलिए अब समय आ गया है जब धर्म, समाज, मानवता और देश की रक्षा के लिए छद्म कवच-कुण्डल छोड़ें और निर्णायक संघर्ष में आगे आएं। अब छोड़ें उन बड़ी-बड़ी मनमोहक बातों को, सहिष्णुता, सहनशीलता और संस्कारों के दायरों से कुछ समय के लिए बाहर निकलें अन्यथा जो कुछ बचा हुआ दिख रहा है वह भी अपने हाथ से चला जाने वाला है।

इस देश की बरबादी के पीछे वे ही लोग जिम्मेदार रहे हैं जो उपदेशक बने हुए खुद भी नपुंसकता ओढ़े रहते हैं और दूसरों को भी कायरता का पाठ पढ़ाते हैं। देश वीरों और देशभक्तों से जिन्दा रहता है, तटस्थ कायरों और उपदेशकों से नहीं।