टाईमपास भुजंग हैं या अजगर

टाईमपास भुजंग हैं या अजगर

त्रिकालद्रष्टा मलूकदास जी महाराज की भविष्यवाणी आज के संदर्भ में ही है – अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए सबके दाता राम।

वर्तमान की परिस्थितियों में ये न केवल प्रासंगिक बल्कि उन सभी लोगों के लिए जीवन भर अपनाने लायक बोध वाक्य है जो अजगरों की तरह जीवनयापन कर रहे हैं या पंछियों की तरह माल-मलाई पर गिद्ध दृष्टि गड़ाए हुए इधर-उधर सब जगहों पर मुँह मारते दिखाई देते हैं।

दुनिया की कुल जनसंख्या का करीब 10 फीसदी तो इन्हीं लोगों से भरा हुआ है जिनके पास कोई काम-धाम, ज्ञान-हुनर और कुव्वत नहीं है फिर भी भरपेट खा-पी रहे हैं और अपनी धूर्तता, चतुराई एवं मक्कारी का भरपूर उपयोग करते हुए लोगों को उल्लू बनाते हुए मौज-मस्ती और धींगामस्ती करते हुए पूरी उन्मुक्तता के साथ स्वेच्छाचारी जीवन जी रहे हैं।

इन्हें न कोई पूछने वाला है, न रोकने-टोकने वाला। जो जी में आए करते हैं और जीवन भर कोई न कोई धमाल करते हुए अपने वजूद को सिद्ध करते रहते हैं। जब से बस्तियों का फैलाव और जंगलों का अंतिम संस्कार हो चुका है तभी से साँप-बिच्छू और अजगरों से लेकर तमाम प्रकार के सूक्ष्म, मध्यम और बड़े जीवों को इंसान का शरीर मिल चुका है ताकि बेचारी ये जीवात्माएं धरती पर अपने निर्धारित समय तक भोग का उपभोग कर सकें।

ज्ञान-हुनर, परिश्रम और संवदनाओं से हीन ये लोग न कुछ करना चाहते हैं, न कर पाते हैं। इनके लिए बैठे-बैठे हुक्म चलाना और शतिर दिमागी घोड़ों को दौड़ाते हुए औरों पर चाबुक चलाते हुए काम कराना और उस सारे काम का श्रेय खुद हड़प लेना ही जीवन का वो सच हो गया है जिसकी खातिर दूसरे सारे लोग हैरान-परेशान हैं।

एक ओर दुनिया के कई मुल्कों में बेकारी, बेरोजगारी और गरीबी का ताण्डव पसरा हुआ है, ज्ञानियों और हुनरमन्दों को अपने भविष्य की चिन्ता सता रही है, युवाओं की अपार जनसंख्या समाज, क्षेत्र और देश के नवनिर्माण में ईमानदारी से हिस्सा बंटाना चाह रही है और दूसरी तरफ अजगरी मानसिकता के लोग दुनिया के डेरों में ऎसे कुण्डली मारकर जमें बैठे हैं कि जैसे इन मठाधीशों को ठेका मिला हुआ है जिन्दगी भर के लिए।

युवाओं को प्रोत्साहन और सुखद-सुरक्षित भविष्य दिलाने के लिए जिम्मेदार रिटायर्ड लोग फिर से बाड़ों और गलियारों में जम गए हैं जैसे कि भारतमाता की कोख में अब हुनरमन्द और अनुभवी लोग पैदा होने ही बंद हो गए हों और इसलिए पुरानी खेप को तब तक चलाने की जरूरत आन पड़ी है। ऎसा ही चलता रहेगा जब तक उनका राम नाम सत्य न हो जाए।

पुराना और सड़ा हुआ गन्दा पानी हर तरफ जमा हो चला है और सडान्ध मारने लगा है। केवल जमा ही नहीं हुआ है बल्कि नए लोगों को बिगाड़ रहा है और उन तमाम नुस्खों की दीक्षा दे रहा है जिनकी वजह से देश की नींव खोखली हो गई और राष्ट्रीय अस्मिता पर संकट के बादल गहराते रहे हैं।

और इधर नए पानी वाली नदियाँ इतनी उफान पर हैं कि अब कोई न कोई मुकाम पाकर थम जाना चाहती हैं। यह असन्तुलन इतना अधिक पसरता जा रहा है कि हालात विषम होते जा रहे हैं। और हम हैं कि न सुधरना चाहते हैं और न ही औरों को मौका देना। और न ही हम कोई काम करना चाहते हैं।

हम सभी लोग भगवान को हाजिर-नाजिर मानकर सच्चे मन और ईमानदारी से सोचें कि हम जितना कुछ पा रहे हैं, जिस काम पर हमें लगाया गया है, जो दायित्व हमें सौंपे गए हैं, जितना हमें पारिश्रमिक, ओहदा, सम्मान और सुविधाएं प्राप्त हो रही हैं उनके मुकाबले हम समाज और देश के लिए कितना कुछ कर पा रहे हैं। हम जो पा रहे हैं वह हमारे परिश्रम का मूल्य है या फिर टाईमपास का।

कुछ फीसदी लोगों की आत्मा ही स्वीकार कर पाएगी कि हम ईमानदारी से अपने कर्तव्य कर्म का निर्वाह कर रहे हैं अन्यथा अधिकांश की आत्मा धिक्कारने के सिवा कुछ नहीं करेगी क्योंकि हम अपना कोई सा कर्म ईमानदारी, सेवा भावना और निष्काम भाव से नहीं कर रहे हैं बल्कि हम केवल टाईमपास कर रहे हैं।

और वह टाईम भी अपने निर्धारित बाड़ों और गलियारों में नहीं देकर फालतू के कामों, चाय-पानी और नाश्ते की होटलों तथा अपनी ही तरह के फालतू के लफ्फाज बातुनियों के साथ ही अनर्गल, असामयिक और सारहीन चर्चाओं में ही खर्च कर रहे हैं। हम अपना सब कुछ संरक्षित और सुरक्षित रखते हुए जीवन का पूरा का पूरा खर्च भी दूसरों के पैसों से चलाना चाहते हैं।

सबसे बड़ा प्रश्न हमारा अपने आप से यह है कि हम कितने उपयोगी हैं अपने संस्थानों, क्षेत्र, परिवेश, समाज और देश के लिए। आज जो लोग टाईमपास और हरामखोरी करते हुए पैसे बना रहे हैं, बंधी-बंधायी लेकर खुश हो रहे हैं उन सभी को समझना चाहिए कि बाड़ों से रवानगी के बाद गली के कुत्ते भी नहीं पूछने वाले।

अपने को प्राप्त शक्तियों और अधिकारों का दुरुपयोग करने वाले, अन्याय, अत्याचार और शोषण ढाने वाले तथा सज्जनों को प्रताड़ित करने वालों को भी तभी तक चैन है जब तक टाईमपास बाड़ों में बने हुए हैं, बाहर निकलने के बाद लोग थू-थू भी करेंगे और यह नज़ीर पेश करते रहेंगे कि ये ही लोग हैं जो अहंकारों में इतने डूबे रहे कि जी भर कर विध्वंस का इतिहास रचते रहे, अच्छे और सच्चे लोगों को तनाव देते रहे और आज एकाकी एवं उपेक्षित जिन्दगी जीने को विवश हैं जहाँ इनकी मौत भी आएगी तो सड़-सड़ कर ।

फिर यह भी शाश्वत सत्य है कि नौकरी और काम-धंधों में रहकर जितनी अधिक मक्कारी और धींगामस्ती की होती है, जितना टाईमपास किया होगा, जितना पैसा बिना काम का लिया होगा या कि भ्रष्टाचार, कमीशनबाजी, रिश्वत आदि से धन पाया होगा, जितना लोगों का मुफ्त का खान-पान किया होगा, वह सारा का सारा मरने से पहले अपने शरीर से किसी न किसी रूप में बाहर निकलेगा ही निकलेगा।

चाहे वह खून, मवाद, माँस, अस्थि आदि के रूप में निकले या फिर शरीर के चलाने वाले अंग-प्रत्यंगों को नाकारा कर दे। और इस अवस्था में जितना धन बिना मेहनत का होगा वह दवाइयों, जाँचों, आईसीयू और चिकित्सा यंत्रों आदि के नाम पर निकलेगा ही निकलेगा।

परिश्रमहीन धन की एक-एक पाई के बाहर निकलने तक न तो आसानी से मृत्यु हो पाती है और न ही जीवन के उत्तराद्र्ध का आनंद पाया जा सकता। इसे हम अभी समझ लें तो शेष जिन्दगी की मौज और मस्ती बनी रहेगी अन्यथा अस्पतालों, दुर्घटनाओं, आपदाओं के द्वार हमारे स्वागत के लिए सदैव समुत्सुक बने ही हुए हैं। फिर चोर-डकैतों की भी नज़र हम पर बनी हुई है।

इसके साथ ही असंख्य बददुआओं का जो खजाना हमने जमा किया है वो आखिर कब हमारे काम आएगा। प्रतीक्षा कीजिएं, अपना नम्बर भी आएगा ही, कोई बच नहीं पाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*