समय बड़ा बलवान है

संसार दो तरह के लोगों में विभक्त है। एक वे हैं जो कहते हैं कि मरने तक की फुर्सत नहीं है, दूसरे लोगों से पूछो तो कहेंगे टाईमपास कर रहे हैं।  दोनों किस्मों को आदर्श नहीं माना जा सकता क्योंकि ये सारे लोग टाईम मैनेजमेंट में विफल हैं। टाईम पास करने वाले भी, और टाईम का मर्डर करने वाले भी।

मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन, व्यवहार और कर्म में संतुलन बना हुआ होने पर ही वह समय प्रबन्धन कर खुद को ढाल लेता है और आनंद के साथ जीवन जीता है। जो लोग यह संतुलन नहीं बना पाते, उनकी जिन्दगी असंतुलित हो जाती है। ऎसे में वे खुद तो तनावग्रस्त रहते ही हैं अपने आस-पास के लोगों को तनाव देने में भी पीछे नहीं रहते।

ऎसे लोगों के लिए जीवन के किसी भी क्षण का कोई मोल नहीं होता बल्कि वे अपने कामों को भार समझ कर करते हैं और दिन-रात कुढ़ते रहते हैं। कई लोगों के लिए उनका दफ्तर और बिजनेस स्थल ही प्रधान हो जाता है और इनका अधिकांश वक्त इन्हीं में गुजरने लगता है।

ऎसे लोग भले ही अपने आपको वफादार कर्मयोगी मानें लेकिन असल में ये असंतुलित मस्तिष्क वाले सनकी लोग ही होते हैं जिन्हें घर -परिवार और कर्मक्षेत्र के बीच संतुलन बिठा पाने का हुनर नहीं आता। यह जरूरी नहीं कि इस श्रेणी में वे काले अंग्रेज और हमारे कर्णधार कहे जाने वाले बड़े लोग ही आते हों जो दिन भर फाईलों के ढेर में धँसे रहने वाले हों या कम्प्यूटर की स्क्रीन के आगे घण्टों जमे रहकर वर्क ब्यूटी निखारने वाले या फिर निन्यानवे के फेर में पोथी-बहियों में उलझने वाले।

ये लोग जीवन में हर समय किसी न किसी तनाव और कमी से जूझते रहते हैं। जीवन में असंतुलन की वजह से इन्हें न घर का कहा जा सकता है न घाट का। भले ही ये घाट-घाट का पानी पीने की डीेंगे क्यों न हाँकें। फिर ऎसे लोगों के जीवन में बद्दुआएं भी कोई कम नहीं होती और इनका सीधा घातक असर उनके आभा मण्डल पर पड़ता है जो बद्दुआओं से बार-बार छिंदता रहता है।

इन लोगों के लिए न तीज-त्योहार और पर्व-उत्सवों का अर्थ है और न ही किसी छुट्टी का। ‘भूतों के डेरे पीपल में’ की तर्ज पर ये सीधे भाग लेते हैं अपने कर्मस्थलों पर और फाईलों के सागर में गोते लगाते रहते हैं। ऎसे लोगों को भी दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है।  कुछ तो माल बनाने को ही जीवन का एकमेव मकसद समझते हैं। ऎसे घोड़े अगर फिरेंगे नहीं, इधर-उधर मुँह मारेंगे नहीं तो चरेंगे क्या। इनके लिया क्या छुट्टी या क्या कोई तीज-त्योहार। मैदान बहुत बड़ा है चरने के लिए, और ऎसे में क्यों न उपयोग करें हरी-हरी घास खूब जो पसरी है चारों तरफ।

दूसरे किस्म के ‘छुट्टिया दफ्तरी’ लोगों के लिए अजीब सी सनक उन्हें जिन्दगी भर घेरे रहती है। उनका न घर में मन लगता है, न और कहीं। सीधे अपने डेरों में घुस जाते हैं। उन्हें वहीं सुकून मिलता है। इन दोनों ही प्रजातियों के लोगों के बारे में जानना हो तो इनके मातहतों से एक बार पूछ जरूर लें। बस इनकी लोकप्रियता और आदर्श व्यक्तित्व के बारे में सारी पुराण सुनकर हर कोई मजे से मुस्कुरा उठे बिना नहीं रह सकता।

कई लोग अपने नम्बर बढ़वाने के लिए छुट्टियों का कबाड़ा कर देते हैं जैसे कि छुट्टियों के दिनों में मातहतों को तंग करने का इन्होंने जिन्दगी भर का ठेका ही ले रखा हो। ऎसे लोग बद्दुआओं के भार से इतने दबे रहते हैं कि खोखली लोकप्रियता के सिवा इनके पास कुछ नहीं हुआ करता।

यह निश्चित मानना चाहिए कि जो सनकी लोग अपने ऎसे-ऎसे कर्म और व्यवहार से लोगों को तंग कर बद्दुआएं लेने के आदी होते हैं उनके परिवार में कलह हमेशा बना रहता है और दाम्पत्य जीवन कलुुषित होने के साथ ही दुर्घटना या अकालमृत्यु  की आशंका बनी रहती है।

हम सभी लोग अपने आस-पास जमा ऎसे सनकियों पर नज़र घुमायें तो इससे  अपने आप अंदाज लग जाएगा। ऎसे लोगों के भीतर से संरक्षकत्व का भाव कहीं खो जाता है और उसका स्थान ले लेता है शोषक व्यक्तित्व। पर इन सभी किस्मों के लोगों को समय प्रबन्धन में विफल मानना चाहिए क्योंकि समय प्रबन्धन की कला में कहीं भी गुस्सा, निराशा और बद्दुआओं का कोई स्थान नहीं होता।

समय प्रबन्धन में माहिर लोगों से कोई प्रताड़ित या दुःखी नहीं होता, अवकाशों का मजा ये भी आनंद से लेते हैं और दूसरों को भी मुक्त मन से लेने देते हैं। आखिर अवकाश हैं ही किसलिये? इसे ये लोग अच्छी तरह जानते हैं। वे बिरले लोग ही होते हैं जिन्हें दूसरों के प्रति मानवीय संवेदना का बोध होता है और वे मर्यादा के साथ चलते हैं। यही वजह है कि ईश्वर की अनुकम्पा से उन्हें ऎसी कोई सनक नहीं होती जो उन्हें बद्दुआओं का केन्द्र बना दे। तभी तो इनके जीवन में आनंद होता है जैसा दूसरों के लिए अत्यन्त दुर्लभ ही है।

जीवन की हर घटना समय सापेक्ष होती है। कहा जाता है कि सभी का अपना अच्छा समय भी आता है और बुरा समय भी। और दोनों से कोई भी इन्सान कभी बच नहीं सकता।  जो लोग समय को पहचानने की कला को जान जाते हैं और जो अच्छा समय मिला है उसके एक-एक पल का सदुपयोग कर लिया करते हैं उनके लिए अपना बुरा समय भी उतना बुरा नहीं होता जितना समय की उपेक्षा करने वालों का होने लगता है। असली इंसान और कर्मयोगी वही है जो कि समय की कीमत को पहचानता है।

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