भूत-प्रेत बनते हैं कल पर टालने वाले

भूत-प्रेत बनते हैं कल पर टालने वाले

हमारे जीवन की समस्याओं, अभावों और दुःखों के लिए न भगवान दोषी है, न अपने पुरखे, और न ही दूसरे लोग या भाग्य।

अपनी सारी समस्याओं के लिए केवल और केवल हम ही दोषी हैं और इस दोष का निवारण किए बगैर हम मौत आने तक सुख और आनंद का अनुभव नहीं कर सकते।

पर हमारी समस्या यह है कि हम इतने अधिक आरामतलबी, आलसी, प्रमादी,  निकम्मे और कामचलाऊ हो गए हैं कि कुछ करना हम नहीं चाहते। टाईमपास करते हुए दिन-महीने और साल गुजार देने के आदी हो गए हैं और दोष दूसरों को देते रहते हैं। हम सारे लोग अपनी कमजोरियाें और असफलताओं के लिए न कभी आत्म चिन्तन करते हैं, न अपने दोष को सच्चे मन से स्वीकारने का साहस है।

हममें से अधिकांश लोग अपने ढिलाई भरे कर्म और आदतों से दुःखी, शोक संतप्त और अवसादग्रस्त रहते हैं। हमारे रोजमर्रा के नित्यकर्म की तरह ही अपने काम-धंधों और नौकरी से जुड़े हरेक कार्य को उसी दिन कर लेना और लम्बित कार्यों से मुक्ति का अहसास पाकर घर आना अपने आप में परम संतोष का अनुभव कराता है।

वास्तव में यही जीवन्मुक्ति है कि हमारे संस्थानों, दफ्तरों और प्रतिष्ठानों आदि कार्यस्थलों पर ड्यूटी पूरी करने के बाद जब घर लौटें तो कोई सा कार्य ऎसा बचा नहीं रहे जिसके न हो पाने की हमें बार-बार याद आए। दिन भर में सारे के सारे काम निपटा कर जो लोग घर आते हैं वे ही आगे चलकर सफलता का वरण करते हैं।

पर अब बहुत सारे लोग ऎसे हो गए हैं कि जो अपने निर्धारित दायित्वों से जुड़े कामों को भी आज की बजाय कल पर टालते रहते हैं। और वह कल या तो कभी नहीं आता अथवा पता नहीं कब आए। इस मामले में दो तरफा इंसान देखे जाते हैं।

एक वे हैं जो तभी कुछ काम करते हैं जब बंधी-बंधायी तनख्वाह के अलावा अतिरिक्त आमदनी या उपहार अथवा मनवांछित कुछ न कुछ मिलने की उम्मीद हो या मिलता रहता हो। दूसरे वे हैं जो खुदगर्ज, अव्वल दर्जे के दरिद्री, आलसी, प्रमादी और आरामतलबी हों और उनके लिए टाईमपास करना ही सबसे बड़ी समस्या हो।

ये लोग अपने कर्तव्य कर्म करते हुए टाईमपास करने की बजाय देर से आने और जल्दी भाग जाने तथा बातूनी विधवाओं और आवारा विधुरों की तरह गप्पे हाँकने और फालतू की बकवास करने के आदी होते हैं। इनसे काम नहीं होता, बातें जी भर कर करा लो, षड़यंत्र और विध्वंसकारी काम चाहे जितने करा लो, दुनिया भर के तमाम हथकण्डों और इघर-उधर करने में इनका कोई जवाब नहीं।  इन दोनों ही किस्मों के लोग जीवन भर सुखी नहीं रह सकते।

क्योंकि इनके जिम्मे के जो-जो काम होते हैं उनका बोझ निरन्तर बढ़ता जाता है। हालांकि फाईलों का यह बोझ इनकी टेबल और अल्मारियों में भरा होता है किन्तु इन कामों के पूरा न होने का तनाव इनके मस्तिष्क में हमेशा भरा रहता है और दिन-ब-दिन यह बोझ बढ़ता चला जाता है। इस बोझ के होते हुए कोई भी इंसान जीवन का आनंद नहीं ले पाता।

एक बार जब अपूर्ण विचारों और कामों का बोझ दिमाग में कबाड़ के रूप में जमा होने लगता है तब इसका सीधा और घातक असर न केवल दिमाग बल्कि मन और शरीर के सभी अंग-प्रत्यंगों पर पड़ता है और इनकी कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है और तब आदमी अपने आपको असहाय, बीमार और विवश महसूस करने लगता है।

बस यहीं से आरंभ हो जाती हैं उसकी अंतिम यात्रा की तैयारियाँ किश्तों-किश्तों में। इसके साथ ही एक बात और भी यह है कि अपने कर्म से संबंधित जो-जो लोग होते हैं वे अपने काम नहीं हो पाने के कारण हमें रोजाना कई-कई बार याद करते रहते हैं, बददुआएं देते रहते हैं और इस वजह से हमारा और उनका सूक्ष्म तरंगों से अदृश्य संबंध कायम हो जाता है।

बार-बार इस संबंध के कायम होने से अपने से संबंधितों की नकारात्मक ऊर्जाओं और संहारकारी वैचारिक तरंगों का प्रवाह हमारी ओर होने लगता है। आरंभिक चरण में यह हमारे आभामण्डल को भेदता है और उसके बाद शरीर को नुकसान पहुंचाना आरंभ कर देता है, हमारे दिमाग और दिल दोनों में घबराहट की स्थिति पैदा कर देता है और एक समय बाद हम अपने आपको वाकई नाकारा और नाकाबिल महसूस करने को विवश हो जाते हैं।

जीवन के शेष रहे कर्मों और विचारों को उसी समय मूर्त रूप देना जरूरी है जब इनका आरंभ होता है अन्यथा विचारों की संख्या भी रोजाना बढ़ती चली जाती है और कामों को बोझ भी। इस वजह से नाकारा, कामचलाऊ, कामटालू और अटकाऊ लोगों के दिल और दिमाग भर जाते हैं और उन्हें हमेशा इस बात का मलाल रहता है कि काम पूरे नहीं हो पा रहे हैं, नहीं हो पाए हैं।

आज के दौर में किसी भी इंसान का कोई भरोसा नहीं। कब काल आ धमके और किसी न किसी बहाने उठा ले जाए। हमारी मौत के समय अपने सारे लंबित काम, इनसे जुड़े लोग और बददुआओं का सारा कबाड़ तथा वासनाओं का जखीरा रील की तरह चलने लगता है।

ऎसे में अतृप्त वासनाओं और शेष रह गए कामों और विचारों का पूरा संसार हमें अंतिम समय में उद्विग्न कर देता है और इसी बीच देह निष्प्राण हो जाती है। ऎसे लोगों की गति-मुक्ति तब तक नहीं हो पाती जब तक कि उनके सोचे हुए काम और उनके जिम्मे के लंबित काम पूरे न हो जाएं।

इस अवस्था में ये सारे के सारे आलसी और निकम्मे लोग भूत-प्रेत बनते हैं और लम्बे समय तक पर््रेत योनि में पड़े रहते हैं। फिर इनके लंबित विचारों और कामों को पूरा करने के लिए किसी न किसी माध्यम की तलाश करने लगते हैं।

इन्हीं के सहकर्मी व्यक्तियों को परेशान करते हैं और जो-जो लोग इनसे संबंधित होते हैं वे सारे इन भूत-प्रेतों से दुःखी रहा करते हैं। ये भूत-प्रेत काफी समय तक अपने संस्थानों और बाड़ों में रहते और परिभ्रमण करते रहते हैं और इनमें भी नकारात्मक प्रभाव दिखाते रहते हैं। और भूत-प्रेत नहीं बन पाएं तो साँप के रूप में इन बाड़ों में परिभ्रमण करते रहते हैं।

आजकल सब तरफ इन्हीं किस्मों के भूत-प्रेतों का जमावड़ा है और वर्तमान में भी बहुत से लोग इनकी तरह बनने की प्रतीक्षा सूची में बने हुए हैं। जो काम नहीं करेगा वह भूत-प्रेत बनेगा ही बनेगा।

2 comments

  1. Dhirendra panchal

    बहुत ही बढ़िया,, वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आपका लेख काफी सटीक चोट करता हें, हकीकत से रूबरू करता है।
    वैज्ञानिक युग का आध्यात्मिक सच बयान करता हें।

  2. सुषमा भाणावत मेहता

    सटीक।यह लेख तो जो भी नोकरी जॉइन करता हैं उसे जोइनिंग के साथ देना चाहिए।जिससे अगर सरकारी नोकरी मे मौज मस्ती के लिये आया हो तो बदल जाये।कुछ खास बातें इस लेख की बड़े बडे अक्षरों में हर कार्यालय में अवश्य लिखी जानी चाहिए।