काम न आएगी ये धन-दौलत

धन-दौलत स्थायी रूप से न किसी की रही है, न रहने वाली है। इसे जो पूरी तरह अपनी ही मानकर चलता है वह कभी उसके पास नहीं रहती। बल्कि उसी के पास ज्यादा समय तक बनी रहती है जो इसे अपनी नहीं मानकर सिर्फ ट्रस्टी के रूप में उपयोग और उपभोग करते हैं।

धन-दौलत का उपयोग और उपभोग करना बुरा नहीं है बल्कि संपत्ति को उपयोग में नहीं लाकर भविष्य की आशंकाओं और असुरक्षा भावना से बेवजह अपने पास संग्रहित कर रखना बुरा है। ?

धन-दौलत के पीछे उल्लुओं की तरह भाग रहे लोगों में दो तरह के लोग होते हैं। एक किस्म के लोग दिन-रात अंधाधुंध वैध-अवैध काम करते हुए, गधों की तरह हर कहीं मालवाहक बने हुए अपने जीवन को पूरी तरह अनाप-शनाप चल-अचल सम्पत्ति जमा कर देने में होम देते हैं।

ये लोग सम्पत्तिशाली तो कहे जाते हैं लेकिन इनकी सम्पत्ति का ये न अपने लिए उपयोग कर पाते हैं, न अपने परिजनों के लिए और न अपने क्षेत्र के लोगों या इलाके के लिए। और खुद भी जिन्दगी भर भिखारियों जैसा जीवन जीते हुए नंगे-भूखे ही भगवान को प्यारे हो जाते हैं।

इस प्रजाति के कबाड़ी और भण्डारी लोगों की दुनिया में कोई कमी नहीं है जो धनाढ्य कहे तो जाते हैं मगर मात्र जमाकत्र्ता के रूप में। इन लोगों की पूरी जिन्दगी जमीन-जायदाद जमा करते रहने और  इनकी सुरक्षा में ही समर्पित होती है।

इस चक्कर में न ये सुख से जी पाते हैं न इनके जीवन में कभी चैन की नींद आ पाती है। असल में ये लोग बैंक की भूमिका में होते हैं। फिर इस प्रकार की जमा की हुई सम्पत्ति पड़े-पड़े कुलबुलाती रहती है और भण्डारों से बाहर निकलने के लिए छटपटाती है और रास्ते तलाशने शुरू कर देती है। चाहे वह गंभीर बीमारी के रूप में हो, चोरी-डकैती और लूट या फिर और किसी भी प्रकार की आपदा। अपने से संबंधित या संतति की चिंताओं के घेरे।

यह तय मानकर चलना चाहिए कि धन-दौलत कहीं भी स्थिर नहीं रह सकते, इनका समय पर उचित उपयोग एवं उपभोग नितान्त जरूरी है क्योंकि दुनिया में यह सम्पत्ति एक श्रृंखला के रूप में सभी लोगों की आजीविका के निर्वाह के लिए हुआ करती है और ऎसे में किसी न किसी रूप में यह सभी के हाथोें में पहुंचती रहनी जरूरी है ताकि श्रृंखला टूटे नहीं।

जब यह क्रम टूट जाता है तब सम्पत्ति किसी न किसी रूप में जड़ता को तोड़कर उन हाथों में पहुंच जाती है जहाँ से उसका अनवरत हस्तान्तरण और परिचालन शुरू हो जाता है। यही कारण है कि सम्पत्ति चाहे किसी भी रूप में हो, इसका परिचालन कभी नहीं रुकता।

जहाँ इसे अपने स्वार्थ और संग्रहण के लिए रोक लिया जाता है वहाँ से यह किसी न किसी बहाने बाहर निकल कर फिर से ट्रैक पर आ जाती है। इसलिए इस भ्रम को बिल्कुल त्याग देना चाहिए कि धन-दौलत हमेशा अपने ही पास कैद होकर रहेगी।

जो लोग इसे कैद रखने की कोशिश करते हैं उन्हें जीवन भर दुर्भाग्य का श्राप देकर यह लक्ष्मी किसी न किसी रास्ते वहाँ से पलायन कर ही जाती है। इसके बाद भी यदि यह बची रह जाती है तो इनके जाने के बाद इन मूर्खों की कमायी हुई दौलत पर ऎसे लोग ऎश करते हैं जिनका परिश्रम या प्रतिभा से कोई सरोकार नहीं रहता।

इनके लिए यह स्थिति ठीक वैसी ही होती है कि भगवान देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है। लेकिन बिना परिश्रम की कमायी यह सम्पत्ति इन ऎश करने वाले हरामखोरों को भी कोई सुख प्रदान नहीं करती। ये लोग इस सम्पत्ति के स्वामी भले ही कहे जाएं, मगर इसका आनंद के साथ उपभोग करने की स्थिति में कभी नहीं होते क्योंकि यह धनार्जन उनके पुरुषार्थ से कोई वास्ता नहीं रखता।

ऎसे गैर पुरुषार्थी और हराम की कमायी पर जिन्दा रहने वाले लोग या तो संततिहीन होते हैं अथवा इनकी संतति ऎसी होती है जो न अपने काम की होती है, न औरों के काम की, नाम मात्र की ही होकर रह जाती है। बहुधा तो यही होता है कि परायी सम्पत्ति हड़पने वालों के लिए संतान सुख कल्पना ही होता है क्योंकि परायी सम्पत्ति से बना शरीर गोत्र तक की शुचिता को दूषित कर देता है।

किसी दैववशात् ऎसे लोगों की संतानें हो भी जाती हैं तो निकम्मी, व्यभिचारी, भ्रष्ट-बेईमान और आसुरी वृत्तियों से भरी-पूरी, क्योंकि आखिर यह निकम्मी, नुगरी और नाकारा संतति ही तो वह सशक्त माध्यम होती है जिसके जिम्मे पराये हड़पे धन को ठिकाने लगाने का एक सूत्री मौलिक दायित्व होता है। ऎसे ढेरों उदाहरण आज भी हम हमारे इलाके में और हमारे आस-पास देख ही रहे हैं।

इसके अलावा इस किस्म के लोग जिन्दगी भर बीमार रहते हैं, दवाइयों के नाम पर हमेशा खर्च बना रहता है, घर में सुख-शांति की कल्पना तक व्यर्थ होती है और आए दिन कलह का माहौल बना रहता है।

जब तक इनके घर में हराम का एक पैसा भी रहेगा तब तक यही हालत बनी रहेगी, फिर चाहे ऎसे लोग अपने आपको कितना ही बड़ा भक्त, दानी और बड़ा आदमी होने का भ्रम क्यों न पाले रहें।

सम्पत्ति वही अपने पास टिकती है जो पुरुषार्थ से कमायी हुई होती है और जीवन में यही असली आनंद देती है। लक्ष्मी जहां होती है वहाँ ऎश्वर्य, भीतरी प्रसन्नता, आनंद और आत्मसंतुष्टि की अलग ही मस्ती छायी होती है जो हृदय से लेकर चेहरे तक मुदिता के भावों का ज्वार उमड़ाती रहती है।

इसके विपरीत हराम की कमायी या दूसरों की हड़पी हुई जमीन-जायदाद अपने हृदय को भी मलीनताओं से भर देती है और चेहरे से मुस्कान गायब कर देती है। ऎसे लोग जब बहुत मेहनत करके हँसने की कोशिश भी करते हैं तब लगता है अपने जीवन का बहुत बड़ा स्वाँग रच रहे हैं।

जहाँ भी पराया या हराम का पैसा रहता है वहाँ व्यक्ति से लेकर घर-परिवार का पूरा आभामण्डल व परिवेश हल्की-हल्की कालिख से इतना भरा होता है कि ऎसे लोगों के सम्पर्क में आने अथवा इनके घरों पर जाने से ऎसा आभास होता है कि अजीब सा अंधेरा पसरा हुआ है और माहौल बिना किसी कारण के शोक से भरा लगता है जहाँ प्रसन्नता का कोई कतरा दूर-दूर तक नज़र नहीं आता।

ऎसे लोगों घरों में अजीब सी गंध भी आती है और प्रवेश करते ही लगता है जैसे किसी अंधेरी गुफा में अनचाहे घुसना पड़ रहा हो। ये सारी स्थितियाँ उन नकारात्मक स्थितियों का संकेत करती हैं जिनसे पता चलता है कि कहीं न कहीं गड़बड़ जरूर है। फिर ऎसे लोगों के वहाँ जो पानी पीता है, खाना खाता है या कुछ घण्टे रह जाता है उसका आभामण्डल भी दूषित हो जाता है तथा वह अपने साथ कई प्रकार के प्रदूषण भी ले जाता है जो उसके लिए कभी भी घातक स्तर पा सकते हैं।

दूसरी किस्म के लोग हालांकि बहुत कम होते हैं लेकिन अपनी कमायी हुई सम्पत्ति पर ये अपना पूरा अधिकार नहीं रखते बल्कि इसका कुछ हिस्सा समाज, क्षेत्र और जरूरतमन्दों पर खर्च करने के साथ ही उत्सवी आनंद पर खर्च करने का माद्दा रखते हैं और इनकी इन्हीं भावनाओं की खातिर इन्हें आत्मीय संतोष तथा आनंद प्राप्त होता है।

ऎसे में और लोग भी इनकी दीर्घायु और उत्तरोत्तर खुशहाली के लिए दुआएँ करते रहते हैं जो इनके जीवन के लिए सकारात्मक ऊर्जाओं का काम करती हैं तथा बरकत देती हैं। ऎसे लोगों के हृदय में प्रसन्नता के भावों का दरिया उमड़ता रहता है औ चेहरे पर हमेशा तैरती रहती है उल्लास से परिपूर्ण निश्छल मुस्कान।

इसलिए धन-दौलत के मामले में शुचिता रखें और इसका समुचित उपयोग करें अन्यथा धन की जो गति और अपनी दुर्गति होने वाली है उसके बारे में ज्यादा कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है।

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