यह है असली आस्था

यह है असली आस्था

धर्म के प्रति आस्थाओं में भी भेद है। एक तरफ वे लोग हैं जो धर्म के नाम पर पैसा बनाने, लोगों को उल्लू बनाने, पद और प्रतिष्ठा पाने के लिए लगे हुए हैं और दूसरी तरफ वे असली श्रद्धालु हैं जिन्हें न पैसा चाहिए, न प्रतिष्ठा, उन्हें तो बस भगवान चाहिएं, और वो भी न मिल पाएं तो भगवान की प्रसन्नता की अनुभूति मात्र से भी खुश हो लेते हैं।

एक तरफ संसार को त्याग कर वैराग्य धारण कर चुके लोगों ने अपने अलग-अलग संसार बसा लिए हैं जहाँ वो हर आराम और भोग-विलास उपलब्ध है जो गृहस्थियों और सांसारिकों के पास भी नहीं है।

बेशकीमती जमीन, आलीशान आश्रमनुमा भवन, लक्जरी एसी गाड़ियां और एयरकण्डीशण्ड प्रासाद से लेकर वह सब कुछ है जो रिसोर्ट या बड़ी पंच सितारा होटलों में होता है।

तरह-तरह के नामों और उपनामों, पदवियों के भार के मारे दबे हुए महंत-महामण्डलेश्वर हैं, योगी-ध्यानयोगी हैं, कथावाचक और सत्संगी हैं, सिद्ध और संत से लेकर शंकराचार्यों तक की पूरी जमात है और इन सभी के साथ है चेले-चेलियों, अनुचरों की जबर्दस्त फौज है जो उन्हें ईश्वर की तरह सम्मान देती है।

इस भीड़ में वीआईपी और वीवीआईपी कहे जाने वाले महान, स्वयंभू, स्वनामधन्य और संप्रभु भी हैं, बड़े-बड़े कारोबारी और धंधेबाज हैं, इन्हीं के साथ फाइनेन्सर और दलालों की भारी भीड़ है। यही नहीं बाबाजी का पीआर करने वालों की भी कोई कमी नहीं है।

बाबाजी का संसार ही ऎसा है जिसमें भगवान के नाम पर सब कुछ होता है और पूरा का पूरा संसार इनके आश्रमों, मठों और मन्दिरों में हर वक्त जीवन्त दिखाई देता है। बाबाजी को साधना, भगवान और सिद्धि से कोई सरोकार नहीं है।

सामूहिक वशीकरण के दो-चार प्रयोग सीख लेने के बाद उनकी चवन्नियां चलने लगी हैं। फिर इनके लिए कर्मकाण्डियों की जमात हमेशा तैयार रहती है आम भक्तों और जरूरतमन्दों में महिमामण्डन के लिए।

सबका अपना-अपना हिस्सा हमेशा तैयार रहता है और अपने आप मिलता रहता है। संसार को त्याग कर भगवान को पाने के लिए निकले लोगों ने अपने-अपने विराट संसार बसा लिए हैं और भगवान व धरम के नाम पर जो कुछ किया जा रहा है उससे कलियुगी मानव आकर्षित होने लगा है।

अपनी वंश, कुल व गौत्र परम्परा की साधना, उपासना और परंपराओं को भुलाकर लोग केवल अपने कामों और स्वार्थों के लक्ष्यों को सामने रखकर ही नए-नए डेरे तलाशने लगे हैं।

गुरुओं और बाबाओं के नाम पर इस देश में जो कुछ हो रहा है वह अपने आप में किसी महान चमत्कार से कम नहीं। जो लोग गरीबों और जरूरतमन्दों को एक धेला देने में मर जाते हैं, अपने माँ-बाप और भाई-भगिनियों की उपेक्षा करने को ही जिन्दगी मान बैठे हैं, अपने क्षेत्र तथा देश की जरूरतों के प्रति बेपरवाह हैं, वे सारे के सारे लोग भगवान और धर्म के नाम पर बाबाओं, भौंपाओं, तांत्रिकों और नीम-हकीमों, ओझाओं पर पैसे लुटा रहे हैं और मूरख बन रहे हैं।

अभिजात्यों का अपना अलग ही धर्म है। अपनी मेहनत का एक पैसा खर्च किए बगैर भारी-भरकम आतिथ्य, मुफ्त का खाना-पीना और आवास भी चाहते हैं और धार्मिक यात्रा, धर्म-कर्म सब कुछ परायों के भरोसे करते हुए धर्म लाभ पाने को उतावले एवं अधीर रहा करते हैं।

भगवान के दर पर गरीब-अमीर, बच्चा-बूढ़ा, बड़ा-छोटा सब बराबर हैं लेकिन बड़े-बड़े मन्दिरों में पैसे लेकर या रुतबा दिखाकर वीआईपी दर्शन का पिछला दरवाजा ऎसा खुल गया है कि इसने आस्थाओं की ऎसी-तैसी कर दी है।

भला भगवान के सामने वीआईपी कौन हो सकता है? पर हो रहा है। पहले के बुजुर्ग भगवान के दर्शनों को जाते थे तब पगड़ी उतार दिया करते थे। यह इस बात का प्रतीक था कि जो कुछ है वह भगवान का ही है, और उसे ही समर्पित, हमारा कुछ नहीं। न पद, पैसा न प्रतिष्ठा।

आज हमारे वीआईपी और वीवीआईपी दर्शनों के लिए जाते हैं तो साथ में खुद के परिवार के साथ जाने कितने परिवार होते हैं, सुरक्षाकर्मी, छायाकार और ढेर सारे लोगों के समूह के साथ जाकर भगवान के दर्शन करते हैं और यह जताते हैं कि हम भी भगवान से कम नहीं।

और बेचारे दूसरे श्रद्धालु देखते रह जाते हैं इनकी माया और काया। एक तरफ यह मंजर है और दूसरी तरफ सच्चे आस्थावान लोगों का सैलाब उमड़ता दिखाई देता है। सच्ची श्रद्धा और आस्था तो उन लोगाें की है जो कि देश के विभिन्न तीर्थों में गर्मी, सर्दी और बरसात के बावजूद सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर तीर्र्थो में पहुंचते हैं। चाहे वह रामदेवरा तीर्थ हो या फिर कोई सा और देवधाम।

न खाने का ठिकाना, न पीने का, न सोने का ठिकाना और न ही दूसरे आराम। बावजूद इसके तमाम तरह के अभावों और समस्याओं के बावजूद जो लोग पैदल यात्री के रूप में पहुंचते हैं, उन्हें ही कहा जा सकता है सच्चा श्रद्धालु।

इन्हें न वीआईपी दर्शनों की चाह है, न सर्किट हाउस-रेस्ट हाउस की, न आलीशान वाहनों की चाह है, न सब जगह वीआईपी और वीवीआईपी ट्रीटमेंट या राज्य अतिथि बनने की। सच कहा जाए तो भगवान की कृपा इन्हीं निष्ठावान भक्तों पर रहती है। खुद के पैसों, स्वयं के शरीर और मन-वचन तथा कर्म से की जाने वाली भक्ति ही सार्थक होती है बाकी सब तो लोक दिखावा है और इसका कोई पुण्य भी प्राप्त नहीं होता।

परमात्मा की सेवा-पूजा, तीर्थाटन, धार्मिक यात्राओं आदि का लाभ तभी है जब हम सामान्य इंसान के रूप में हिस्सेदार बनें। ईश्वर के दर पर जो वीआईपी बनकर जाते हैं वे अगले जनम में वैभव खो चुके दरिद्री बनते हैं अथवा पराये पैसों और संसाधनों पर मौज उड़ाने के पापों के कारण भिखारी के रूप में पैदा होते हैं और इन्हीं देवतीर्थों के आस-पास भीख मांगते फिरते हैं।

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