यह है मोक्ष प्रयाण भोज ….

मृत्यु भोज के नाम पर जो खर्च हो रहा है उस पर रोक जरूरी है लेकिन दिवंगत आत्मा के निमित्त 10-11 श्रेष्ठ जनों को भोजन कराना ही चाहिए।

इसे मृत्यु भोज नाम नहीं देकर मोक्ष प्रयाण भोज का नाम दिया जाना चाहिए।

जो भी अनुष्ठान, यज्ञ और संस्कार होते हैं उन सभी के अन्त में भोज का विधान है और इसके बाद ही अनुष्ठान, यज्ञ अथवा किसी भी संस्कार में परिपूर्णता आती है।

इसलिए मेरी दृष्टि में मृतात्मा के निमित्त भोज होना ही चाहिए।

मृत्यु भोज को हमारे यहां कुप्रथा मानी गई है उसके पीछे दोषी हम ही हैं क्योंकि हमने इसे सीमित और मर्यादित नहीं रखकर सामूहिक भोज के मुफतिया आनन्द का पर्याय मान लिया है और इसलिए जब भी मृतात्मा के निमित्त इस प्रकार का भोज किया जाता है उसमें बहुत बड़ी संख्या में लोगों का जीमण होने लगा है। यही कारण है कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों का भोज होने के कारण मृत्यु भोज कर्ज और आर्थिक संकट का कारण बन जाता है।  और यह ठीक भी नहीं है।

मृत्यु उपरान्त मृतक के निमित्त अंतिम दिन भोज जिसे कहीं काट्टा कहा जाता है और आम तौर पर मृत्यु भोज। इसमें विधान यह है कि मृतात्मा को उच्चतम लोकों तक जाने के लिए फ्यूल या ऊण्ध्र्वगामी ऊर्जा की आवश्यकता होती है।  अभी हम सभी लोग पृथ्वी पर है यानि की भू लोक पर हैं।

इसके बाद हमें यानि की हमारी आत्मा को ऊध्र्वगमन करते हुए मृत्यु के उपरान्त ऊपर के लोकों क्रमशः भुव, स्वः, मह, जन, तप और सत्यम् लोकों तक की लम्बी यात्रा करनी पड़ती है।

संसार में बहुत थोड़े ही लोग होते हैं जो कि इतनी ऊर्जा अपने जीवनकाल में संचित कर पाते हैं कि तीव्र गति से संचरण करते हुए एक के बाद एक लोक में पहुँच जाएं।

इसके लिए यह जरूरी है कि अपने परिवार के दिवंगत जीवों के मोक्ष या उत्तम गति के लिए हम अपनी ओर से कुछ न कुछ संचित ऊर्जा उन्हें भेंट करें, ताकि उनकी ऊघ्र्वगामी यात्रा को सम्बल प्राप्त हो सके। उत्तर क्रिया के सारे अनुष्ठानों की पूर्णाहुति के उपरान्त भोज भी इसीलिए किया जाता है कि हम दिवंगत आत्माओं को उनके निर्धारित प्रयाण-विहार या मोक्ष के लिए अपनी ऊर्जा का कुछ हिस्सा भेंट करें।

आज जिसे मृत्यु भोज कहा जा रहा है वह यही भोज है लेकिन संख्या की दृष्टि से विस्फोटक हो जाने के कारण इसे कुप्रथा का स्वरूप दे दिया गया है।

यह कहा गया है कि जो लोग दिवंगत आत्मा के निमित्त भोजन करते हैं उन सभी के संचित पुण्य में से एक-एक लाख गायत्री जप का पुण्य मृतात्मा के खाते में चला जाता है। इसलिए यदि 10-20 लोग भी भोजन करेंगे तो उनसे एक-एक लाख गायत्री जप की संचित ऊर्जा दिवंगत आत्मा को प्राप्त होगी, जो उनके लिए ईन्धन का काम करेगी।  सैटेलाईट या रॉकेट लांचिंग होती है तब उसे अन्तरिक्ष में पहुंचाने के लिए बहुत ज्यादा मात्रा में फ्यूल की आवश्यकता होती है और तभी वह आसमान के दूसरे ग्रहों में पहुंच सकता है।

यही स्थिति जीवात्मा की है। मृत्यु के उपरान्त भी आत्मा समाप्त नहीं होती, शरीर नष्ट होता है। इस आत्मा को गति-मुक्ति या मोक्ष आदि के लिए अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता होती है। बहुत से लोग स्वयं सच्चे और अच्छे साधक होते हैं, उनके पास तो इतनी संचित ऊर्जा होती ही है कि वे अपने अर्जित पुण्य के बल पर ऊध्र्वगमन तीव्रता से कर लिया करते हैं और उच्चतम स्थिति को प्राप्त कर लिया करते हैं।  इन साधकों के लिए भगवान के पार्षद स्वयं विमान और दूसरी सारी व्यवस्थाएं कर लिया करते हैं।

लेकिन आम इन्सान के लिए यह संभव नहीं है। फिर आजकल कलियुग है और ऎसे में इंसान के पास पापों का भार अधिक होता है, पुण्य का सारा प्रभाव वह जीवात्मा अपनी तुच्छ कामनाओं की पूर्ति में लगा देता है इसलिए उसके पास  आत्मा के साथ ऊपर ले जाने लायक संचित कुछ होता ही नहीं।

इसलिए उनके लिए वंशजों और परिचितों का कर्तव्य है कि वे अपनी ताकत दें, ताकि जीवात्मा को सहारा प्राप्त हो सके।  इसलिए मृत्युभोज के नाम पर सारे सगे-संबंधियों, पूरी की पूरी जाति-बिरादरी और समाज तथा क्षेत्रवासियों एवं परिचितों की भारी भीड़ जमा करना अनुचित है क्योंकि इनके जीमने से जीवात्मा को कोई फायदा नहीं होता क्योंकि इस भीड़ में ऎसे लोग अंगुलियों पर गिनने लायक ही मिल पाते हैं जिनके पास दैवीय ऊर्जा या पुण्य संचित हों और उसमें से किसी को दे पाएं।

अच्छा यही है कि भीड़ की बजाय केवल उन 10-11 संध्यापात्री और गायत्री जप की दृष्टि से समृद्ध शुचितापूर्ण एवं गैर व्यवसायिक व उदारमना ब्राह्मणों या साधकों को जिमाया जाए ताकि दिवंगत आत्मा को अपनी उच्च यात्रा के लिए पुण्य की ऊर्जा प्राप्त हो सके।

आजकल रक्त समूह वाले लोग भी इस भोज से परहेज करते हैं। यह एक तरह से मृतात्मा के साथ गद्दारी ही कही जा सकती है। कई लोग अपने दिवंगत परिजनों के साथ ही घनिष्ट मित्रों और गुरुओं तक के लिए कुछ करना नहीं चाहते।

खूब सारे तथाकथित प्रगतिशील बुद्धिजीवी और सामाजिक-धार्मिक संस्थाओं के पदाधिकारी आजकल बहुतायत में मिल जाते हैं जो हर किसी परिचित की पगड़ी रस्म में अपनी प्रशस्ति और वाहवाही के लिए मृतात्मा के लिए लच्छेदार और कारुणिक भाषा में शोक संदेश पढ़ने में आनंद का अनुभव करते हैं, लेकिन जब भोजन की बात आती है तब यह कहकर छूट पड़ते हैं कि हमारे नहीं चलता।

दुर्भाग्य और शर्म की बात यह है कि पगड़ी रस्म में ऎसा कहने वाले लोगों में से अधिकांश लोग मृतात्मा के निमित्त दिए जाने वाले शैयादान, वस्त्र, आभूषण, स्टील के बर्तन और दूसरी सभी प्रकार की भेंट को सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं और इस दौरान इनकी भूमिका भिखारियों से भी बदतर होती है। किसी सगे-संबंधी को न मिल पाए तो बखेड़ा खड़ा कर देते हैं। दोहरी भूमिका वाले ये लोग भोज से कतराते हैं। इन्हें पूछा जाए कि भोज की बजाय मृतात्मा के नाम पर उपहार लेना, गोदान पाना कहां तक उचित है।

शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है –

परान्ने दश गायत्री, श्राद्धे शतगुणा प्रोक्ता। सीमन्ते च अयुतं, एकलक्षं प्रेत भोजने।

अर्थात मृतात्मा के निमित्त भोजन करने वाला अपने एक लाख गायत्री जप( या और कोई सा मंत्र हो) का पुण्य मृतात्मा की गति-मुक्ति के लिए प्रदान करता है।  यह अपने आप में पुण्य है कि किसी की सद्गति के लिए हम अपना कुछ अंशदान करें।

आजकल सभी लोग साधन सम्पन्न तो हैं लेकिन साधनाहीन हो गए हैं, संध्या-गायत्री और जप आता ही नहीं, ऎसे में जो भोज में शरीक होते हैं उनका कोई लाभ दिवंगत आत्मा को प्राप्त नहीं होता।

यही कारण है कि  लाखों दिवंगत आत्माएं भू लोक के ऊपर ही चक्कर काट रही हैं, उनका न तो मोक्ष हो पाया है, न सद्गति। और इनमें भी जो पैदा हो रही हैं वे अपने ही परिवारों में वापास आकर।

यहीं से शुरू होता है अपना पितृ दोष का क्रम।  जीवित माता-पिता और बंधुओं को हम कष्ट पहुंचाते हैं और उनकी मृत्यु के उपराप्त उत्तर क्रियाएं तक ढंग से नहीं करवाकर मात्र औपचारिकताएं ही पूरी कर रहे हैं। इस कारण से हम और हमारी संतति समस्याओं, अभावों और संत्रासों से ग्रस्त हैं।

यहाँ मृत्यु भोज का समर्थन नहीं किया जा रहा है लेकिन इसे मृत्यु भोज नहीं मानकर मोक्ष भोज की संज्ञा दी जानी चाहिए और भोजन करने वालों की संख्या 10-11 से अधिक नहीं होनी चाहिए। होना यह भी चाहिए कि विपन्न होने की स्थिति में समृद्ध सगे-संबंधी उदारतापूर्वक योगदान करें।

हम बर्थ डे पार्टी, पिकनिक पार्टी, नशे, तम्बाकू-गुटकों-दारू आदि के साथ ही औरों के वहां भोज का मौज उड़ाने आदि के नाम पर खूब सारा खर्च कर डालते हैं, वहां हमें कुछ भी फिजूलखर्ची नहीं लगती। और अपने परिवार के दिवंगत व्यक्ति के मोक्ष के लिए किए जाते रहने वाले परंपरागत संस्कारों को हम कुचलते जा रहे हैं।

हमें याद रखना होगा कि हमने यदि अपने पूर्वजों के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को ढंग से नहीं निभाया तो हमारी भी स्थिति वैसी ही होने वाली है जो हमारे पितरों की हो रही है।

इसलिए कुछ बातें स्पष्ट होनी जरूरी हैं कि मृत्यु भोज के नाम पर बहुत बड़ी संख्या में लोगों का जीमण होने की बजाय 10-11 जनों को जिमाया जाए जो कि सात्विक हों, साधक हों।  जो विपन्न हैं वे 2-4 को ही जिमाएं। लेकिन दिवंगत के निमित्त भोज जरूर होना चाहिए। हर संस्कार की परिपूर्णता भोज से ही होती है।

 

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