कच्चा चबा जाएगी ये भूख

दुनिया में आने वाला हर इंसान संसार को कुछ न कुछ देने के लिए आता है। इस दृष्टि से हर  मनुष्य का फर्ज है कि वह ऎसा कुछ करे कि जो जमाने के काम आए, समाज और मातृभूमि की सेवा में नया इतिहास रचे और जब ऊपर जाए तो कुछ उपलब्धियां लेकर जाए।

यह तो रही सिद्धान्त की बात। हर इंसान को इस मामले में गंभीर रहना ही चाहिए। यों भी हर इंसान यह चाहता है कि वह दूसरे लोगों के मुकाबले ऎसा कुछ करे कि जिससे समाज में उसकी मान-प्रतिष्ठा बढ़े, लोकप्रियता के शिखरों का स्पर्श करे और कीर्ति प्राप्त करे।

इसके लिए आत्मप्रचार का रास्ता सबसे सरल माना जाता है। आजकल इस मामले में हम सभी लोग खूब सक्रिय हैं। यों कहें कि अतिसक्रिय हैं तो  अधिक उपयुक्त होगा।

हमारे कर्म समाज और देश के लिए उपयोगी बनें, उनसे जगत को लाभ प्राप्त हो तथा आने वाली पीढ़ियाँ भी उन्हें याद रखें।

इस दृष्टि से आत्मप्रचार अपने आप में उपयोगी है। लेकिन जो आत्मप्रचार अपने ही अपने लिए हो, समाज और राष्ट्र को इसका कोई फायदा न हो, जगत के लिए किसी भी प्रकार का उपयोग न हो, उस आत्मप्रचार का कोई उपयोग नहीं है सिवाय अपने स्वार्थ पूरे करने के।

जिस किसी विचार के प्रसार में केवल वाणी का प्रभाव होता है, वह ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ पाता बल्कि कुछ समय ही इसका असर बना रहता है। जबकि वास्तविकता यह है कि जो लोग अच्छे काम करते हैं उनके कर्म की सुगंध ही अपने आप इतना प्रसार पा जाती है कि जिससे उन्हें अपने बारे में जगत को जनाने के लिए कुछ भी नहीं करना पड़ता।

जब एक बार किसी इंसान के श्रेष्ठ कर्मों की सुगंध पसर जाती है तब लोग उसका अपने आप अनुसरण करने लग जाते हैं। यह अनुसरण श्रद्धा और भक्ति के साथ होता है न कि ऊपरी तौर पर।

फिर आचरणों का अनुकरण हमेशा स्थायी प्रभाव छोड़ता है और वह इतना असरकारक होता है कि न सिर्फ कुछ वर्ष तक, बल्कि सदियों तक प्रभावशील रहता है। इसलिए श्रेष्ठ आचरण से बढ़कर दुनिया में ऎसा कुछ भी नहीं है जो पीढ़ियों तक के लिए कीर्ति प्रदान कर सके।

आत्मप्रचार करने वालों का वजूद ज्यादा समय तक नहीं रहता क्योंकि लोग जल्दी ही सत्य को भाँप जाते हैं। झूठ हो या सत्य कभी भी ढंका हुआ नहीं रह सकता। एक समय आने के बाद अपने आप इनका पूर्ण प्रकटीकरण हो ही जाता है।

इसलिए जो कुछ करें वह ऎसा करें कि जगत के लिए हो, श्रेष्ठ आचरणों वाला हो, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए अनुकरण कर आनंददायी प्रेरणा प्राप्त कर सकें।

1 thought on “कच्चा चबा जाएगी ये भूख

  1. यह भी है अजीब तरह की भूख..
    कुंभकर्ण को भी इतनी भूख नहीं थी जितनी आजकल के हम लोगों में आकार ले चुकी है। जिधर देखो उधर सभी मरणधर्माओं को नाम और शोहरत की पड़ी है, पब्लिसिटी पाने के पीछे पागल हुए जा रहे हैं लोग।
    इन्हें नहीं पता कि कालजयी अमरत्व के लिए अनुकरणीय व्यवहार, निष्ठावान कर्मयोग और कल्याणकारी जीवनदृष्टि का होना जरूरी है, न कि नामपिपासु और फोटोछपासु। सस्ती पब्लिसिटी की प्रचुर और खर्चीली संभावनाओं भरे संकरे रास्ते में इतनी भीड़ बढ़ चली है कि लोग समा नहीं पा रहे हैं। ये बेचारे क्या जानें कि भगदड़ वाली यह भेड़ रेवडिया भीड़ कोई मायने नहीं रखती।
    ऎसे में कोई तो हो जो भीड़ से अपना अलग अस्तित्व और पहचान रखकर जीवन्त उदाहरण सामने लाए। सांसारिक प्रपंचों की ऎषणाओं के जंगल में कोई जीवन ऎसा नज़र नहीं आता, जो इन सबसे अलग हो। कुछ बेचारे जरूर हैं पर वे इतने दूरस्थ सीमावर्ती हाशिये पर हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता। वे अपने आत्म आनंद में मग्न होकर पगलाई भीड़ से ही अपना मुफतिया मनोरंजन करने में मस्त हैं।

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